अनावृतबीजी भाग – 3

कोनिफेरोफाइटा

कॉर्डाइटेलीज
कोनीफेरोफाइटा का प्रथम गण कॉर्डाइटेलीज (cordaiteles) हैं, जो साइकाडोफाइटा के पौधों से कहीं बड़े और विशाल वृक्ष हुआ करते थे। पृथ्वी पर प्रथम वृक्षोंवाले जंगल इन्हीं कारडाइटीज के ही थे, जो टेरिडोस्पर्म की तरह, 25 करोड़ वर्ष से पूर्व, इस धरती पर राज्य करते थे। इनकी ऊँचाई कभी कभी 100 फुट से भी अधिक होती थी। इन्हें तीन कुलों में विभाजित किया गया है :
(1) पिटिई (Pityeae), (2) कारडाइटी (Cordaiteae) और (3) पोरोज़ाइलीई (Poroxyleae)।
पिटिई मुख्यत: तने की अंदरूनी बनावट पर स्थापित किया गया है। इस कुल के पौधों में कैसी पत्ती या फूल थे, इसका ज्ञान अभी तक ठीक से नहीं हो पाया है। एक वंश कैलिजाइलान (Callixylon) का, अमरीका से प्राप्त कर, अच्छी तरह अध्ययन किया गया है, यह एक विशाल वृक्ष रहा होगा, जिसकी शाखा की चौड़ाई लगभग 17-18 फुट की थी।
कॉर्डाइटी का मुख्य वंश कॉर्डांइटिज़ (Cordaites) है। इसकी लकड़ी को कॉर्डियोज़ालाइन (Cordioxylon) डैडोज़ाइलान (Dadoxylon), जड़ को एमिलान (Amyelon), पुष्पगुच्छ को कॉर्डाऐंथस (Cordaianthus) और बज को कॉर्डाइकार्पस (Cordaicarpus) और समारॉप्सिस (Samaropsis) कहते हैं। पत्ती भी लगभग 3-4 फुट लंबी और 1 फुट चौड़ी होती थी। पत्ती के अंदर के ऊतकों की बनावट से ज्ञात है कि ये सूखे स्थानों पर उगते होंगे। कॉर्डाइटीज़ के तने के मध्य का पिथ या मज्जा विशेष रूप से विवाभ (discoid) लगता है। कॉर्डाइटीज़ के फूल एकलिंगी होते थे, जो अधिकतर अलग अलग वृक्ष पर, या कभी कभी एक ही वृक्ष की अलग शाखा पर, लगे होते थे। कॉर्डाइऐंथस पेजोनी के पुंकेसर (stamen), एक शाखा से 3-4 की संख्या में, सीधे ऊपर निकलते हैं। परागकण में दो परतें होती हैं। मादा कोन एक कड़े स्तंभ पर ऊपर की ओर लगा होता है।
पोरोज़ाइली कुल में सिर्फ एक ही प्रजाति पोरोज़ाइकलन है, जिसके तने में भीतर बृहत् मज्जा होती है।

गिंगोएलीज़
कोनीफेरोफाइटा का दूसरा गण हैं, गिंगोएलीज़ (Ginkgoales)। यह मेसोज़ोइक युग से, अर्थात् लगभग 5-7 करोड़ वर्ष पूर्व से, इस पृथ्वी पर पाया जा रहा है। उस समय में तो इसके कई वंश थे, पर आज कल सिर्फ एक ही जाति जीवित मिलती है। यह गिंगो बाइलोबा (Ginkgo biloba) एक अत्यंत सुंदर वृक्ष चीन देश में पाया जाता है। इसके कुछ इने गिने पौधे भारत में भी लगाए गए हैं। इसकी सुंदरता के कारण इसे ‘मेडेन हेयर ट्री’ (Maiden-hair tree) भी कहा जाता है।
फॉसिल जिंकगोएजीज़ में जिंकगोआइटीज (Ginkgoites) और बइरा (Baiera) अधिक अध्ययन किए गए हैं। इनके अतिरिक्त ट्राइकोपिटिस (Trichopitys) सबसे पुराना सदस्य है। जिंकगो को वैज्ञानिकों ने शुरु में आवृतबीज का पौधा समझा था, फिर इसे विबृतबीज कोनिफरेल् समझा गया, परंतु अधिक विस्तार से अध्ययन करने पर इसका सही आकार समझ में आया और इसे एक स्वतंत्र गण, गिंगोएलीज़ का स्तर दिया गया। यह वृक्ष छोटी अवस्था में काफी विस्तृत और चौड़े गोले आकार का होता है, जैसे आम के वृक्ष होते हैं, परंतु आय बढ़ने से वह नुकीले पतले आकार का, कुछ चीड़ के वृक्ष या पिरामिड की शक्ल का हो जाता है। इसके तने, दो प्रकार के होते हैं : लंबे तने, जो बनावट में कोनीफेरोफाइटा की तरह होते हैं और बौने प्ररोह (dwarf shoots), जो साइकेडोफाइटा जैसे अंदर के आकार के होते हैं। इनकी पत्ती बहुत ही सुंदर होती है, जो दो भागों में विभाजित होती है। पत्ती में नसें भी जगह जगह दो में विभाजित होती रहती हैं। नर और मादा कोन अलग अलग निकलते हैं। बीजांड के नीचे एक ‘कॉलर’ जैसा भाग होता है।
ऐसा अनुमान है कि इस गण के पौधे कॉर्डाइटी वर्ग से ही उत्पन्न हुए होंगे। इसमें नरयुग्मक तैरनेवाले होते हैं, जिससे यह साइकड से भी मिलता जुलता है। कुछ वैज्ञानिकों के विचार हैं कि ये पौधे सीधे टेरीडोफाइटा (Pteridophyta) से ही उत्पन्न हुए होंगे।
कोनीफरेलीज़
कोनीफरेलीज़ गण, न केवल कोनिफेरोफाइटाका ही बल्कि पूरे विवृत बीज का, सबसे बड़ा और आज कल विस्तृत रूप से पाया जानेवाला गण है। इसमें लगभग 50 प्रजातियाँ और 500 से अधिक जातियाँ पाई जाती हैं। इनमें अधिकांश पौधे ठंडे स्थान में उगते हैं। छोटी झाड़ी से लेकर संसार के सबसे बड़े और लंबी आयुवाले पौधे इस गण में रखे गए हैं। कैलिफॉर्निया के लाल लकड़ीवाले वृक्ष (red wood tree), जिन्हें वनस्पति जगत् में सिकोया (sequoia) कहते हैं, लगभग 350 फुट गगनचुंबी होते हैं और इनके तने 30-35 फुट चौड़े होते हैं। यह संसार का सबसे विशालकाय वृक्ष होता है। इसकी आयु 3,000-4,000 वर्ष तक की होती है।
कोनीफरेलीज़ गण को मुख्य दो कुल पाइनेसी और टैक्सेसी में विभाजित किया गया है। इनमें फिर कई उपकुल हैं परंतु बहुत से विद्वानों ने सभी उपकुलों को कुल का ही स्तर दे दिया है।
पाइनेसी कुल के अंतर्गत चार उपकुल हैं :
(1) एबिटिनी (Abietineae), (2) टैक्सोडिनी, (Taxodineae), (3) क्यूप्रेसिनी (Cupressineae) और (4) अराकेरिनी (Araucarineae)
टैक्सेसी के अंतर्गत दो उपकुल हैं-
(1) पोडोकारपिनी (Podocarpineae) और (2) टैक्सिनी (taxineae)
कई वनस्पति शास्त्रियों ने टेक्सिनी को कुल का नहीं, गण (टैक्सेल्स) का स्तर दे रखा है।

पाइनेसी
(1) एबिटिनी में बीजांड पत्र (oruliferous bract) एक विशेष प्रकार का होता है और परागकण में दोनों तरफ हवा में तैरने के लिए हवा भरे गुब्बारे जैसे आकार होते हैं। इस उपकुल के मुख्य उदाहरण हैं : पाइनस या चीड़, सीड्रस या देवदार, लैरिक्स (Larix), पीसिया (Picea) इत्यादि।
(2) टैक्सोडिनी में बीजांड पत्र और अन्य पत्र आपस में सटे होते हैं और परागकण में पंख जैसे आकार नहीं होते। इनके मुख्य उदाहरण हैं : सियाडोपिटिस (Sciadopitys), सिकोया (Sequoia), क्रिप्टोमीरिया (Cryptomeria), कनिंघेमिया (Cuninghamia) इत्यादि।
क्यूप्रेसिनी के मुख्य पौधे कैलिट्रिस (Callitirs), थूजा (Thuja), जिसे मोरपंखी भी कहते हैं, क्यूप्रेसस (Cupressus), जूनिपेरस (Juniperus) इत्यादि हैं।
अरोकेरिनी के अंतर्गत वाटिकाओं में लगाए जानेवाले सुंदर पौधे अरोकेरिया (Araucaria) और एगैथिस (Agathis) हैं।
पाइनेसी कुल के पौधों में एक मध्य स्तंभ जैसा लंबा, सीधा तना होता है, जिससे नीचे की ओर बड़ी और ऊपर छोटी शाखाएँ निकलती हैं। फलस्वरूप पौधे का आकार एक कोन या पिरामिड का रूप धारण करता है। तने के शरीर (anatomy) का काफी अध्ययन किया गया है। वैस्कुलर ऊतक बहुत बृहत् होता है। वल्कुट (cortex) तथा मज्जा दोनों ही पतले होते हैं। वल्कुट के बाहर कार्क (cork) पाए जाते हैं। जड़ की रचना एक द्विबीजी संवृतबीज से मिलती जुलती है।
इस कुल में अन्य कोनीफरेलीज की तरह दो प्रकार की पत्तियाँ पाई जाती हैं। एक पत्ती के रूप की और दूसरी छोटे पतले कागज के टुकड़े जैसे शल्क पत्र (scale leaf) सी होती है। पाइनस में यह अलग प्रकार की पत्तियाँ अलग शाखा पर निकलती हैं, परंतु ऐबीस (Abies) के पौधे में, दोनों पत्र हर डाल पर भी पाए जा सकते हैं। पत्तियों की आयु काफी लंबी होती है और कोई कोई 10-22 वर्ष तक नहीं झड़तीं। इनका आकार एक सूखे स्थान में उगनेवाले पौधों की पत्ती जैसा होता है। बाह्यचर्म के कोश लंबे होते हैं, जिनके बाहर के भाग पर मोम जैसा क्यूटिन (cutin) पदार्थ जमा रहता है। र्घ्रां अंदर की ओर घुसा होता है। मीज़ोफिल (mesophyll) भाग के कोश पटूटे की भाँति अंदर को लिपटे (infolded) से रहते हैं। एक प्रकार के कोश द्वारा वैस्कुलर ऊतक घिरे रहते हैं, जिसे छाद (sheath) कहते हैं।
प्रजनन मुख्यत: बीज द्वारा होता है। यह एक विशेष प्रकार के अंग में, जिसे कोन (cone) या शंकु कहते हैं, बनता है। कोन दो प्रकार के होते हैं, नर और मादा। नर कोन में पराग बनते हैं, जो हवा द्वारा उड़कर मादा कोन के बीजांड तक पहुंचते है, जहाँ गर्भाधान होता है। दोनों लिंगी कोन अलग अलग पौधों में पाए जाते हैं, जैसे पाइनस में, या एक ही पौधे में जैसे ऐबिस या कभी कभी क्यूप्रसेसी उफ्कुल के पौधों में। लघुबीजाणुधानी (microsporangium) के निकलने का स्थान स्थिर नहीं रहता। किसी में यह डंठल के सिरे पर और किसी में पत्ती के कोण से निकलती है। पाइनस में तो बौने प्ररोह (dwarf shoot) पर ही यह प्रजनन अंग निकलते हैं। लघुबीजाणुधानी जिस पत्र में लगी रहती है, उसे लघुबीजाणु पर्ण (Microsporophyll) कहते हैं। लघुबीजाणुधानी के बाह्यचर्म से नीचे अधस्त्वचा (hypodermis) के कुछ कोश बढ़ते तथा जीव द्रव से भरे रहते हैं और विभाजित होकर, बीजाणुजन ऊतक बनाते हैं और फिर इन्हीं कोशों के कई बार विभाजन होने पर परागकण और अन्य ऊतक बनते हैं।
बीजांड पैदा करनेवाले अंगों को गुरुबीजाणुपर्ण (megasporophyll) कहते हैं। इनके एक स्थान पर झुंड में होने से एक कोन या मादा शंकु बनता है। बीजांड एक प्रकार के शल्क बीजांडघर शल्क पर, नीचे की ओर लगे होते हैं। योनिका भ्रूणपोष (endosperm) से नीचे की ओर से घिरा रहता है और दो आवरण होते हैं। ऊपर की ओर से घिरा रहता है और दो आवरण होते हैं। ऊपर की ओर एक अंडद्वार होता है जिससे होकर परागकण योनिका के पास पहुंच जाते हैं। यहाँ ये कण जमते हैं और पराग नलिका बनता है, जिसमें नलिका केंद्रक (tube nucleus) नर युग्मक पाए जाते हैं। नर युग्मक और मादा युग्मक के संयोग से अंडबीजाणु बनते हैं, जो फिर विभाजन द्वारा बीज को जन्म देते हैं।
ऐसा अनुमान है कि पाइनेसी कुल का जन्म पृथ्वी के प्रथम बड़े वृक्षवाले गण कारडाईटेलीज़ (Cordaitales) द्वारा ही हुआ है।

टैक्सेसी
दूसरा कोनीफरेलीज़ का कुल है टैक्सेसी। इसके दो उपकुल हैं – पोडोकारपिनी और टैक्सिनी। पोडोकारपिनी में भी परागकण में हवा भरे पक्ष (wings) पाए जाते हैं। इसके उदाहरण हैं, पोडोकारपस तथा डैक्रीडियम। टैक्सिनी के परागकण में पक्ष (wing) नहीं होता। टैक्सस, टोरेया और सिफैलोटेक्सस इसके मुख्य उदाहरण हैं। इनमें भी पाइनस जैसे वैस्कुलर ऊतक होते हैं, परंतु कुछ विशेष उंतर भी होता है।
पत्तियाँ कई प्रकार की पाई जाती हैं। कुछ में छोटे नुकीले (जैसे टैक्सस) या चौड़े पत्ते (पोडौकारपस में) होते हैं, या नहीं भी होते हैं, जैसे फाइलोक्लैडस में। प्रजनन हेतु लघुबीजाणुधानी तथा गुरुबीजाणुधानी नर तथा मादा शंकु में लगी होती हैं। इन शंकुओं में शल्क (scales) के अध्ययन काफी किए गए हैं। प्रत्येक बीजाणुपर्ण (sporophyll) में बीजाणुधानी (sporangium) की संख्या भिन्न भिन्न प्रजातियों में भिन्न होती है, जैसे टैक्सस में चार से सात, टोरेया (torreya) में शुरू में सात, परंतु बीजाणुधानी पकने तक 1 या 2 ही रह जाती हैं। मादा शंकु इस कुल में (अन्य कोनीफर से) बहुत छोटे रूप का होता है। अधिकतर यह शंकु पत्तीवाले तने के सिरे पर उगता है। बीजांड की संख्या एक या दो होती है। इनमें अध्ययन गण और बीजांडकाय की परतें अलग रहती हैं। पराग दो केंद्रक की दशा में, हवा में झड़कर, मादा शंकु तक पहुंचते हैं और बीजाणु पर पहुँचकर जमते हैं। वहाँ ये बढ़कर एक नलिका बनाते हैं और संसेचन का कार्य संपन्न करते हैं।
इस कुल का संबंध अन्य कुल या गण से कई प्रकार से रखा गया है। ऐसा विचार भी है कि इस कुल के पौधे जीवित कोनीफर में सबसे जमाने से चले आ रहे हैं। इनका संबंध विंकगो या अराकेरिया या कारडाइटीज़ से हो सकता है। ऐसा भी कई वैज्ञानिकों का विचार है कि यह स्वतंत्र रूप से (अन्य कोनीफर से नहीं) उत्पन्न हुए होंगे।
कोनीफरलीज़ गण काफी गूढ़ और विस्तृत है, जिसमें बहुत से आर्थिक दृष्टि से अच्छे पौधे पाए जाते हैं, जैसे चीड़, चिलगोज़ा, देवदार, सिकोया तथा अन्य, जो अच्छी लकड़ी या तारपीन का तेल देनेवाले हैं।
नीटेलीज़
कोनीफेरोफाइटा का सबसे उन्नत गण है, नीटेलीज़। इस गण में तीन जीवित पौधे हैं : नीटम (Gnetum), एफिड्रा (Ephedra) और वेलविट्शिया (Welwetschia) आज के कई वैज्ञानिकों ने इन तीनों प्रजातियों की रूपरेखा तथा पाए जानेवाले स्थान की भिन्नता के कारण अलग अलग आर्डर का स्तर दे रखा है। फिर भी कुछ गुण ऐसे हैं जैसे वाहिका (Vessel) का होना, संयुक्त शंकु (compound cone), अत्यंत लंबी माइक्रोपाइल, पत्तियों का आमने सामने (opposite) होना इत्यादि, जो तीनों प्रजातियों में मिलते हैं। इस गण के पौधों को कोनीफेरफ्रोाइटा से इसीलिए हटाकर एक नए ग्रुप क्लेमाइढोस्पर्मोफाइटा में रखा जाने लगा है।
एफिड्रा, जिससे एफिड्रीन जैसी ताकत की औषधि निकलती है, एक झाड़ी के आकार का पौधा है। इसकी लगभग चालीस जातियाँ पृथ्वी के अनेक भागों में पाई जाती हैं। पश्चिम में मेक्सिको, ऐंडीज़ परगुए, फ्रांस, तथा पूर्व में भारत, चीन इत्यादि, में यह उगता है। भूमध्य रेखा के दक्षिण में यह नहीं पाया जाता। इसकी मूसली जड़ (tap root) मजबूत और बड़ी होती है। इसके तने पतले हरे रंग के होते हैं, जिनपर पत्तियाँ नहीं के बराबर होती हैं। ये पत्तियाँ इतनी छोटी होती हैं कि आहार बनाने का कार्य तने द्वारा ही होता है। इनके तन में गौण ऊतक में वाहिनियाँ पाई जाती हैं। मज्जारश्मि (medullary ray) चौड़ी और लंबी होती है। संवहन (vascular) नलिका एंडार्क साइफोनोस्टील (endarch siphonostele) होता है। इनमें एक प्रकार का रासायनिक पदार्थ टैनिन पाया जाता है। वल्कुट में क्लोरोफिल पाए जाते हैं। इनके बाहर रध्रं होते हैं, जो गैसों के आदान प्रदान तथा भाप के बाहर निकलने के लिए मार्ग प्रदान करते हैं।
एफिड्रा में नर और मादा शंकु अलग अलग पौधे पर निकलता है। केवल एफिड्रा की एक जाति, ए. फोलिपेटा, में ही एक पौधे पर दोनों प्रकार के शंकु पाए जाते हैं। नर शंकु से दो, तीन अथवा चार चक्र में लघुबीजाणुधानियाँ (microsporangiums) निकलती हैं। जहाँ से ये निकलती हैं, वहाँ चार-पाँच से आठ जोड़े तक शुल्क होते हैं, जिसमें दो जोड़े बाँझ होते हैं। बीजाणुधानी की संख्या 4-5 या 6 तक होती है। मादा शंकु काफी लंबा तथा 2-3 या 4 चक्र में हरे रंग का होता है। सहपत्रों (bracts) की संख्या भी नर से अधिक होती है। अंडकोशिका (egg cell) के चारों ओर कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) भरा होता है। परागकण चिपचिपे द्रव के बूंद में फंस जाता है और लंबे बीजांडद्वार द्वारा खिंचकर अंड तक पहुँचता है। तीन या चार भ्रूण तक एक बीजांड में देखे गए हैं।

वेल्विशिया (Welwitschia) दक्षिण अफ्रीका के पश्चिम तट पर ही उगता है और कहीं भी नहीं पाया जाता। यह तट के कुछ मील के भीतर ही सीमित है। प्रथम इसे टमबोआ मिरैविलिस कहा गया था, परंतु बाद में इसके आविष्कारक डॉ॰ वेल्विश के नाम पर इसे वेल्विश या मिरैविसि कहा गया। यह अत्यंत मरुद्भिदी (xerophytic), अर्थात् सूखे स्थान पर उगनेवाले पौधों जैसा, होता है। जहाँ यह उगता है वहाँ वर्ष भर की पूरी वर्षा लगभग एक इंच ही होती है। शक्ल सूरत तो गाजर जैसी होती है, पर इससे बहुत बड़ा, लगभग 3-4 फुट चौड़ा, होता है। पौधे के ऊपर एक मोदा आवरण बाह्यवल्क (periderm) होता है। मुख्यत: दो ही पत्तियाँ होती हैं, जो बहुत मोटे चमड़े के पट्टे की तरह होती हैं। मध्य भाग में लैंगिक जनन के अंग, जो पकने पर झड़कर गिर जाते हैं, निकलते हैं और वे निकलने के स्थान पर एक क्षतचिन्ह छोड़ देते हैं। पौधे की प्रथम दो पत्तियाँ ही, संपूर्ण जीवन भर बिना झड़े, लगभग 60-70 या 100 वर्ष तक, लगी रहती हैं। तेज हवा के झोंके से पत्तियाँ लंबाई में, शिराओं की सीधी लाइन में, फट जाती हैं। शिखा से पत्ती सूखती चलती है और नीचे से बढ़ती चलती है। जड़ तो बहुत गहराई तक जाती है।
वेल्विशिया के पौधे के काटने से पता चलता है कि तने तथा जड़ में कैल्शियम ऑक्सैलेट की बहुमुखी सूई के आकार की कंटिका (spicule) की तरह की कोशिकाएँ होती हैं। संवहन ऊतक (vascular tissue) भी कई प्रकार के पाए जाते हैं। नर शंकु और मादा शंकु अलग अलग बनते हैं। बीजांड प्रारंभ में हरे होते हैं, पर पकने पर चमकीले लाल हो जाते हैं। प्रत्येक शंकु में 60–70 बीजांड होते हैं। उत्पत्ति और अन्य रूप से भी यह पौधा अपना साथी नहीं रखता और ऐसा लगता है कि इसने पौधे की किसी अन्य जाति को भी उत्पन्न नहीं किया है। यह एक जीवित फॉसिल है।
नीटेलीज़ (Gnetales) गण का मुख्य वंश नीटम (Gnetum) है। यह द्विबीजी है तथा आवृतबीज से बहुत मिलता जुलता है। यह लता तथा वृक्ष के रूप में उगता है। यह देश भूमध्य सागरीय नम स्थानों में ही पाया जाता है और इसकी लगभग 30 जातियाँ मिलती हैं। विवृतबीज में यह वंश सबसे अधिक विकसित माना जाता है। माहेश्वरी और वाणिल ने अपनी पुस्तक ‘नीटम’ में लिखा है कि भारत में नीटम निमोन (G. gnemon) आसाम में, नी. उलवा (G. ulva) पश्चिम तथा पूर्वी तट पर, नी. आबलांगम बंगाल में, नीटम कंट्रैक्टम केरल में, नी. लैटिफोलियम अंडमान, निकोबार में तथा नीटम ऊला अन्य भागों में पाया जाता है।
नीटम के तने की बनावट काफी जटिल होती है। बाह्य त्वचा के बाहर का भाग मोटी दीवार से बना होता है। रध्रं गहरे गड्ढे में बनता है, वल्कुट की कोशिकाएँ पतली होती हैं और उनमें क्लोरोफिल कभी कभी पाया जाता है। मज्जा पतली कोशिका की दीवार होती है। नीटम नीमोन में गौण वृद्धि साधारण ढंग की होती है, परंतु लतरवाली जातियों में ऐसी वृद्धि एक विशेष प्रकार की होती है, जिसमें वल्कुट ही एधा सक्रियता (ambial activity) उत्पन्न करता है। संवहन ऊतक 2–3 चक्र में बन जाते हैं, जैसे नीटम ऊला में। संवाहिनी (vessel) के छोर की दीवार एक ही छिद्र से मिली रहती है। ट्रकीड (trachied) के किनारे की दीवारों पर गर्त (pit) होती हैं। मज्जका रश्मि (medullary ray) काफी चौड़ी और ऊँची होती है।
पत्ती बड़े अंडे के आकार की होती है, जिसमें शिराएँ द्विबीज शल्क पत्ती की भाँति जाल बनाती हैं। ये छोटे तने पर अधिक निकलती हैं। ऐसा समझा जाता था कि इनके रध्रं आवृतबीज जैसे सिनडिटोकीलिक होते हैं, पर हाल ही में माहेश्वरी और वासिल (1961) ने इसे अन्य विवृतबीज जैसा ही, हैप्लोकीलिक, पाया हैं, जिसमें गौण कोशिका की उत्पत्ति द्वारकोशिका (guard cell) से स्वतंत्र होती है।
सभी जातियों में नर तथा मादा प्रजनन अंग अलग अलग पौधे पर उगते हैं। नर फूल, जिनकी संख्या 3 स 6 या 7 तक होती है, एक गोलाई में निकलते हैं। परागकोश की संख्या प्रति पुष्प 1, 2, या चार होती है। मादा शंकु में भी ‘कॉलर’ (स्कंध मूल संधि) जैसा भाग होता है, जिसके ऊपर 4 से 10 तक बीजांड लगे होते हैं। ये भी एक गोलाई में निकलते हैं। नीटम का संवृतबीजों का पूर्वज भी कहा गया है।

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