केंचुआ और केंचुआ खाद के उपयोग और उपयोग में सावधानियाँ

मिट्टी की दृष्टि से
केचुँए से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है।
भूमि का उपयुक्त तापक्रम बनाये रखने में सहायक।
भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा। अतः सिंचाई जल की बचत होगी। केचुँए नीचे की मिट्टी ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।
केचुँआ खाद में ह्यूमस भरपूर मात्रा में होने से नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाश एवं अन्य सूक्ष्म द्रव्य पौधों को भरपूर मात्रा में व जल्दी उपलब्ध होते हैं।
भूमि में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि होती है।
कृषकों की दृष्टि से
सिंचाई के अंतराल में वृद्धि होती है।
रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने के साथ काश्त-लागत में कमी आती है।
पर्यावरण की दृष्टि से
भूमि के जलस्तर में वृद्धि होती है।
मिट्टी खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है।
कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी होती है।
अन्य उपयोग
केचुँए से प्राप्त कीमती अमीनों ऐसिड्स एवं एनजाइमस् से दवाये तैयार की जाती है।
पक्षी, पालतू जानवर, मुर्गियां तथा मछिलयों के लिये केचुँए का उपयोग खाद्य सामग्री के रूप में किया जाता है।
आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने में इसका उपयोग होता है।
पाउडर, लिपिस्टिक, मलहम इस तरह के कीमती प्रसाधन तैयार करने हेतु केचुँए का उपयोग होता है।
केचुँए के सूखे पाउडर में 60 से 65 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जिसका उपयोग खाने में किया जाता है।

केंचुआ खाद का महत्व

यह भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।
वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।
पौधों तथा भूमि के बीच आयनों के आदान प्रदान में वृद्धि होती हैं।
वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-300% तक की वृद्धि हो सकती हैं।
मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं।
वर्मी कम्पोस्ट युक्त मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात 5:8:11 होता हैं अतः फसलों को पर्याप्त पोषक तत्व सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
केचुओं के मल में पेरीट्रापिक झिल्ली होती हैं, जो जमीन से धूल कणों को चिपकाकर जमीन का वाष्पीकरण होने से रोकती हैं।
केचुओं के शरीर का 85% भाग पानी से बना होता हैं इसलिए सूखे की स्थिति में भी ये अपने शरीर के पानी के कम होने के बावजूद जीवित रह सकते हैं तथा मरने के बाद भूमि को नाइट्रोजन प्रदान करते हैं।
वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता हैं तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता हैं।
इसका प्रयोग करने से भूमि उपजाऊ एवं भुरभुरी बनती हैं।
यह खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं।
इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती हैं।
मिट्टी में केचुओं की सक्रियता के कारण पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बना रहता हैं, जिससे उनका सही विकास होता हैं।
यह कचरा, गोबर तथा फसल अवशेषों से तैयार किया जाता हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता हैं।
इसके प्रयोग से सिंचाई की लागत में कमी आती हैं।
लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग से कम होती जा रही मिट्टी की उर्वरकता को इसके उपयोग से बढ़ाया जा सकता हैं।
इसके प्रयोग से फल, सब्जी, अनाज की गुणवत्ता में सुधार आता हैं, जिससे किसान को उपज का बेहतर मूल्य मिलता हैं।
केंचुए में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव मिट्टी का pH संतुलित करते हैं।
उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में इसके उपयोग से रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
यह बहुत कम समय में तैयार हो जाता हैं।
केंचुए नीचे की मिट्टी को ऊपर लाकर उसे उत्तम प्रकार की बनाते हैं।

केंचुआ खाद के उपयोग में सावधानियाँ

जमीन में केचुँआ खाद का उपयोग करने के बाद रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग न करें।
केचुँआ को नियमित अच्छी किस्म का सेन्द्रिय पदार्थ देते रहना चाहिये।
उचित मात्रा में भोजन एवं नमी मिलने से केचुँए क्रियाशील रहते है।

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