केन्द्रीय उद्भेदन वाले ज्वालामुखी

इस उद्गार में लावा के साथ अधिक मात्रा में गैस (प्रायः एक संकरी नली या छिद्र के सहारे) बाहर निकलती है और लावा का जमाव शंकु की तरह तथा कभी-कभी गुम्बद या टीले के रूप में होता है।
अर्थात वे ज्वालामुखी जिनके विवर या मुख का व्यास कुछ 100 फीट से अधिक नहीं होता है और इसका आकार गोल या करीब-करीब गोल होता है, तथा जिनसे गैस लावा तथा विखण्डित पदार्थ अधिक मात्रा में विस्फोटक उद्भेदन के साथ आकार में काफी ऊँचाई तक प्रकट होते हैं, केन्द्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी कहलाते हैं। ये अत्यधिक विनाशकारी होते हैं। उद्गार से भयंकर भूकम्प आते हैं।
इन्हें विस्फोट की तीव्रता के आधार पर पुनः कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है
1 हवायन या हवाई तुल्य
2 स्ट्राम्बोलियन या स्ट्राम्बोली तुल्य
भूपदार्थ तीव्रता से बाहर आता है।
इसमें तरल लावा के साथ विखण्डित पदार्थ जैसे ज्वालामुखी बम उद्गार के समय निकलते हैं, जो अधिक ऊँचाई पर जाकर पुनः ज्वालामुखी क्रेटर में गिर पड़ते हैं। जैसे-भूमध्य सागर में सिसली द्वीप के उत्तर में स्थित लिपारी द्वीप के पास स्ट्रोम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है।
3 वल्कैनियन या वलकैनैनो तुल्य ज्वालामुखी
इस प्रकार के ज्वालामुखी प्रायः विस्फोट, भयंकर उद्गार के साथ होता है।
इससे विस्तृत लावा इतना चिपचिपा एवं लसदार होता है कि दो उद्गारों के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर उसे ढक लेता है। इस तरह गैसों के मार्ग में अवरोध हो जाता है।
इसके बाद जब गैसें अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती है तो ये गैंसे तीव्रता से इस अवरोधक को हटा देती है।
इससे ज्वालामुखी मेघी काफी दूरी तक छा जाते हैं और आकार फूलगोभी जैसा हो जाता है। जैसे-लिपारी द्वीप पर वलकैनो ज्वालामुखी
4 विसुवियन
5 प्लिनियन
6 पीलियन या पीली तुल्य ज्वालामुखी
इस प्रकार के ज्वालामुखी सबसे अधिक विनाशकारी होते है तथा इनका उद्गार सर्वाधिक विस्फोटक तथा भयंकर होता है।
इससे निकला लावा सर्वाधिक चिपचिपा एवं लसदार होता है।
उद्गार के समय ज्वालामुखी नली में लावा की कठोर पट्टी जमा हो जाती है। जब अगला उद्गार होता है तब भयंकर गैसे इन्हें तीव्रता से तोड़कर आवाज करती हुई धरातल पर प्रकट होती है।
इसमें निस्तृत लावा एवं विखण्डित पदार्थ सर्वाधक होते हैं तथा प्रज्वलित गैसों के कारण ज्वालामुखी मेघ प्रकाशमान हो जाते है। जैसे-8 मई 1902 को मार्टिनिक द्वीप (द. अमेरिका) पर पीली ज्वालामुखी का भयंकर उद्भेदन हुआ था। इसलिए इसे पीलियन तुल्य ज्वालामुखी कहते है।
जावा एवं सुमात्रा के मध्य सुण्डा जलडमरू मध्य में 1883 में क्राकाटोआ में-इसमें पुराने शंकु का एक तिहाई भाग हवा में उड गया। भयंकर गैस एवं वाष्प के कारण 17 मील तक ऊंचाई तक बादल घिर गये थे। इसके विस्फोट के बाद (यानि 1 दिन बाद ही) ज्वालामुखी धूल एवं राख तथा वाष्प के बादल 50 मील (80 किमी) की ऊंचाई तक आकाश में पहुंच गया। और क्राक्राटोआ द्वीप की दो तिहाई भाग सागर में निमज्जित हो गया। और उद्गार की आवाज 3000 किमी दूर पूर्वी आस्ट्रेलिया तक सुनाई दी गई। और भूकम्प से 120 फीट ऊंचाई लहर उठी जिससे जावा एवं सुमात्रा के तटीय भागों में 36000 व्यक्ति मारे गये। इसी प्रकार 1911 में फिलीपाइन द्वीप में हिवक-हिवक का भयंकर उद्भेदन हुआ था।
7 कैटामाइयन
दरारी उद्भेदन वाले ज्वालामुखी
इस प्रकार के उद्भेदन में लावा के साथ गैस की मात्रा कम होती है जिससे लावा दरारों में होकर ध्ररातल पर जमने लगता है। कभी-कभी अधिक मात्रा में लावा के जमा होने से मोटी परत बन जाती है जिसके फलस्वरूप लावा मैदान या लावा पठार बनते है। जैसे-1783 में आइसलैण्ड में एक 17 मील लम्बे दरार से होकर लावा का उदगार हुआ है। जिसका विस्तार 218 मील तक था। इसे आइसलैण्ड की जनसंख्या का 5वां भाग नष्ट हो गया। इस तरह के उदगार क्रिटैशियस युग में बड़े पैमाने पर हुए थे।
भारत में दक्कन का पठारी हिस्सा क्रीटेशस युग के एक दरारी उद्भेदन द्वारा निर्मित है और इस पर बेसाल्ट की चट्टानों के अपक्षय से काली रेगुर मिट्टी का निर्माण हुआ है।

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