कोहिनूर हीरा का प्रचलित इतिहास

दुनिया के सबसे दुर्लभ और बेशकीमती हीरे ‘कोहिनूर’ की ब्रिटेन की महारानी के मुकुट तक पहुँचने की दास्‍तान महाभारत के कुरुक्षेत्र से लेकर गोलकुण्‍डा के ग़रीब मजदूर की कुटिया तक फैली हुई है। ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा और दुनिया के अनेक बादशाहों के दिलों को ललचाने की क्षमता रखने वाला अनोखा कोहिनूर दुनिया में आखिर कहाँ से आया, इस बारे में ऐतिहासिक घटनाओं के अलावा बहुत सी कथाएँ और किंवदन्तियाँ भी प्रचलित हैं। यह हीरा अनेक युद्धों, साज़िशों, लालच, रक्तपात और जय-पराजयों का साक्षी रहा है।
दुनिया के सभी हीरों का राजा है कोहिनूर हीरा। इसकी कहानी भी परी कथाओं से कम रोमांचक नहीं है। कोहिनूर के जन्‍म की प्रमाणित जानकारी न‍हीं है पर कोहिनूर का पहला उल्‍लेख 3000 वर्ष पहले मिला था। इसका नाता श्री कृष्‍ण काल से बताया जाता है। पुराणों के अनुसार स्‍वयंतक मणि ही बाद में कोहिनूर कहलायी। ये मणि सूर्य से कर्ण को फिर अर्जुन और युधिष्ठिर को मिली। फिर अशोक, हर्ष और चन्‍द्रगुप्‍त के हाथ यह मणि लगी। सन् 1306 में यह मणि सबसे पहले मालवा के महाराजा रामदेव के पास देखी गयी। मालवा के महाराजा को पराजित करके सुल्‍तान अलाउदीन खिलजी ने मणि पर कब्‍जा कर लिया। बाबर से पीढी दर पीढी यह बेमिसाल हीरा अंतिम मुगल बादशाह औरंगजेब को मिला। ’ज्‍वेल्‍स ऑफ बिट्रेन’ का मानना है कि सन् 1655 के आसपास कोहिनूर का जन्‍म हिन्‍दुस्‍तान के गोलकुण्‍डा जिले की कोहिनूर खान से हुआ। तब हीरे का वजन था 787 कैरेट। इसे बतौर तोहफा खान मालिकों ने शाहजहां को दिया। सन्1739 तक हीरा शाहजहां के पास र‍हा। फिर इसे नादिर शाह के पास र‍हा। इसकी चकाचौधं चमक देखकर ही नादिर शाह ने इसे कोहिनूर नाम दिया। कोहिनूर को रखने वाले आखिरी हिन्‍दुस्‍तानी पंजाब का रणजीत सिंह था। सन् 1849 में पंजाब की सत्‍ता हथियाने के बाद कोहिनूर अंग्रेजों के हाथ लग गया। फिर सन् 1850 में ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी ने हीरा महारानी विक्‍टोरिया को भेंट किया। इंग्‍लैण्‍ड पंहुचते-पंहुचते कोहिनूर का वजन केवल 186 रह गया। महारानी विक्‍टोरिया के जौहरी प्रिंस एलवेट ने कोहिनूर की पुन: कटाई की और पॉलिश करवाई। सन् 1852 से आज तक कोहिनूर को वजन 105.6 ही रह गया है। सन् 1911 में कोहिनूर महारानी मैरी के सरताज में जड़ा गया। और आज भी उसी ताज में है। इसे लंदन स्थित ‘टावर ऑफ लंदन’ संग्राहलय में नुमाइश के लिये रखा गया है। जब ब्रिटिश शाही परिवार के हाथों में कोह-ए-नूर हीरा आया, तो इसका वजन 186 कैरेट (37 ग्राम) था।

कोहिनूर हीरा काटना

प्रिंस अल्बर्ट ने बहुत अच्छी प्रतिष्ठा के साथ एक डायमंड कटर की खोज की और नीदरलैंड का नेतृत्व किया जहां उन्होंने एक निश्चित श्री कैंटर को हीरे को काटने का मिशन दिया, जिसने इसे काटने का मुश्किल काम शुरू किया। श्री।
कैंटर ने हीरे पर 38 दिन काम किया।
हीरे को एक अंडाकार आकार में काटा गया था और वजन अपने वर्तमान स्वरूप में कम हो गया था और 108.93 कैरेट का वजन था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार प्रिंस अल्बर्ट कटिंग के काम से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि हीरा पहले जितना चमकता नहीं था।

कोहिनूर के दावों की राजनीति
इस हीरे की लबी कथा के बाद, कई देश इसपर अपना दावा जताते रहे हैं। 1976 में, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री ज़ुल्फीकार अली भुट्टो ने ब्रिटिश प्रधान मंत्री जिम कैलेघन को पाकिस्तान को वापस करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने एक नम्र “नहीं” में उत्तर दिया।. अन्य दावा भारत ने किया था। एवं अफ्गानिस्तान की तालीबान शासन ने, व ईरान ने।
भारत वापसी प्रयास
फिलहाल इसे भारत वापस लाने को कोशिशें जारी की गयी हैं। आजादी के फौरन बाद, भारत ने कई बार कोहिनूर पर अपना मालिकाना हक जताया है। महाराजा दिलीप सिंह की बेटी कैथरीन की सन् 1942 में मृत्‍यु हो गयी थी, जो कोहिनूर के भारतीय दावे के संबध में ठोस दलीलें दे सकती थी।
2007 तक कोहिनूर टॉवर ऑफ लंदन में ही रखा है।
गोलकुंडा के अन्य कुछ हीरे
भारत की गोलकुंडा की खानों से कोहिनूर के अलावा भी दुनिया के कई बेशकीमती हीरे निकले। ग्रेट मुगल, ओरलोव, आगरा डायमंड, अहमदाबाद डायमंड, ब्रोलिटी ऑफ इंडिया जैसे न जाने कितने ऐसे हीरे हैं, जो कोहिनूर जितने ही बेशकीमती हैं।

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