राजनयिक इतिहास भाग – 2

रोमन राजनयिक व्यवहार

रोमन लोग यूनानियों की तुलना में अधिक बर्बर थे। अतः वे अन्तराष्ट्रीय सम्बन्धों का विकास नहीं कर सके। यूनानियों ने सन्धि वार्ता पद्धति को विकसित किया था और राजनयिक प्रक्रिया के माध्यम से विरोधियों से सम्पर्क स्थापित करने में विश्वास व्यक्त किया था, किन्तु रोमन लोगों ने सैनिक शक्ति पर अधिक विश्वास किया। वे राजनयज्ञ की बजाय विजेता अधिक थे। रोमन लोगों ने राजनयिक तौर-तरीकों के स्थान पर सीधी कार्यवाही (Direct Action) पर अधिक विश्वास किया। उन्होंने अपनी सर्वोच्चता बनाये रखने के लिए यह तरीका अपनाया कि दो या अधिक राष्ट्रोंं के बीच संघर्ष के समय वे कमजोर का पक्ष लेते, क्येंकि उनका विश्वास था कि इस नीति से दोनों ही पक्ष रोम के राजनीतिक अनुग्रह के आँकाक्षी बने रहेंगे। कमजोर का पक्ष लेने से वह तो रोम के प्रभाव को मानेगा ही, किन्तु कमजोर का पक्ष लेकर जब शक्तिशाली को उखाड़ फैंका जायेगा तो वह शक्तिशाली पक्ष भी रोम का प्रभाव मानने के लिए मजबूर हो जायेगा। रोमन लोगों ने राजनय के क्षेत्र में युद्ध की वैधानिकता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार उनकी दृष्टि्र में वही युद्ध वैधानिक होता था जिसकी औपचारिक घोषणा की गई हो और जिसके लिए एक विशेष धर्म-गुरु द्वारा धार्मिक समारोह का आयोजन करा लिया गया हो।
रोमन लोग युद्ध और शांति दोनों ही कार्यों में विदेशी राजनीतिज्ञों का स्वागत करते रहे। वे राजदूत को सामान्यतया लैगेटस (Legates) कहते थे और कभी-कभी फेटिअल (Fetial) भी कह देते थे। यह शब्द अधिकांशः युद्ध अथवा शान्ति के लिए वार्ताकार के साथ लगाया जाता था। रोमन सीनेट नियमित रूप से विदेशों में अपने देश के राजदूत भेजती थी। रोमन कानून राजदूतों को अनतिक्रम्यता (Inviolabiality) को मान्यता देता था। विख्यात राजनीतिक विचारक सिसरो ने, जो रोम में दूत बन कर आया था, इस सम्बन्ध में लिखा है, “राजदूतों की अनतिक्रम्यता दैवीय तथा मानवीय दोनों ही कानूनों से है। वे पवित्र और आरदयीय हैं ताकि वे अनतिक्रम्य बने रहें। ये केवल मित्र राष्ट्रं में ही नहीं है अपितु शत्रु की सेना में धिरे होने पर भी हैं” रोमन कानून के अन्तर्गत राजदूत के सहयोगी भी अनतिक्रम्य थे। राजदूतों के पत्र-व्यवहार और उनके लिए अनिवार्य वस्तुओं को अनतिक्रम्य समझा जाता था। राजदूत जब किसी तीसरे राज्य में से गुजरता तो भी उसे अनतिक्रम्य का विशेषाधिकार प्राप्त था। राजदूत पर किया गया कोई भी हमला रोमन अन्तरजार्तीय कानून (Jus Gentium) का उल्लंघन माना जाता था। राजदूत पर क्षेत्रीय-ब्राह्यता का सिद्धान्त भी लागू होता था अर्थात् कोई समझौता तोड़े जाने पर राजदूत राज्य के न्यायालय में मुकदमा नहीं चलाया जाता था, वह स्थानीय कानूनों से उन्मुक्त था। रोमन सीनेट राजदूतों को राजकीय अतिथियों जैसा सम्मान देती थी।
रोमन लोगों ने राजनय के क्षेत्र में एक प्रशिक्षित ‘पुरालेखपाल’ (Archivist) की पद्धति प्रदान की। पुरालेखपाल राजनयिक दृष्टान्तों और प्रक्रियाओं में प्रवीण व्यक्ति होते थे। आज भी राजनय की एक महत्वपूर्ण शाखा पुराने लेखों, सिंन्धयों, अभिलेखों आदि की रक्षा करना और उन्हें व्यवस्थित रखना है। रोमन लोगों ने पुरालेखागारों अथवा लेखों से सम्बन्धित कार्य को ‘राजनयिक व्यवहार’ (Diplomatic Business) की संज्ञा दी है। इस प्रकार के लेखों को व्यवस्थित रखने की पद्धति रोमन लोगों की एक महत्वपूर्ण देन है।

रोमन लोगां ने राज्यों की समानता के सिद्धान्त का कभी आदर नहीं किया। इसका कारण यह था कि रोमनव लोगों को अपनी सर्वश्रेष्ठता में विश्वास था, वे अन्य किसी राज्य को अपने समकक्ष नहीं समझते थे। यही कारण है कि रोमन काल में समानता के आधार पर राजनयिक सम्बन्धों की स्थापना करने और सन्धि-वार्ता करने के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हो सका। रोमन लोगों ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना तो की लेकिन राजनयिक भाईचारे के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को विकसित नहीं किया। यूनानी सभ्यता के मूल तत्वों से रोमन लोग लगभग अप्रभावित थे।
डा0 शुक्रदेव प्रसाद दुबे ने राजनय के इतिहास में अपने अध्ययन में प्राचीन रोमन राजनयिक आचार पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि “रोमन विजयों ने जिस विश्व राज्य का निर्माण किया, उसमें पारर्थियन, हिन्दू और चीनी सभ्यताऐं ही ऐसी थी जो उसकी सीमा परिधि के बाहर थी। अतः इस राजनीतिक वातावरण में रोम को किसी विशेष कूटनीतिक विधान की आवश्यकता नहीं थी। उसका काम केवल अपनी राज्य सीमा को बर्बर आक्रमणों से सुरक्षित रखना था, फिर भी रोमन साम्राज्य के वैदेशिक मामले काफी दिलचस्प थे। प्राचीनकाल से ही रोम के युद्ध और शान्ति की परिस्थितियों पर जो भी कूटनीतिक वार्ता आवश्यक होती थी, वह एक विशिष्ट कूटनीतिक संस्था (Collegiuma Fetialious) अर्थात् कॉलेज ऑफ फैटियलस का सौंपी जाती थी। रोमन धारणा के अनुसार सभी युद्ध उचित थे। युद्ध के पूर्व फोटियलस कॉलेज का मुखिया जिसे पेटरस कहते थे सीनेट को सूचित करता था कि उसका शान्तिपूर्ण हल निकालने की सारी कूटनीतिक वार्ता निष्फल सिद्ध हो गई। युद्ध प्रारम्भ करने के निर्णय के उपरान्त वह एक खूनी भाला शुत्र के स्थल पर फैंकता था। यह अनुष्ठान जुपीटर आदि देवताओं के आह्वान के साथ शपथ लेकर किया जाता था। जब रोम के विस्तार के साथ ही फिटयलस का प्रतिनिधित्व राजदूत करने लगे तो भाला फैंकने की औपचारिक प्रणाली ने एक प्रतिकात्मक स्वरूप ले लिया और शत्रु के स्थल के स्थान पर अपना मीटिंयर्स प्राण अथवा बेलूना के मन्दिर क सामने फैंका जाने लगा। फिटीयलस को सन्धि स्थापना का भी कार्य दिया जाता था। विदेशी राजदूतों को सीनेट से फरवरी के महीने में कैपिटाल के निकट ग्रेकास्टि्रपेसस के अवसर पर प्रत्यक्ष वार्ता करने का भी अवसर मिलता था। साम्राज्यवादी युग आने के साथ यह कार्य सम्राट ने स्वयं अपने हाथों में ले लिया। रोम द्वारा की गई सभी सन्धियाँ असमान थी क्योंकि वे विजित प्रदेशों के शासकों पर सदैव के लिये थोप दी जाती थी। रोम का जसजेन्टि्रयम अर्थात् वह विधान जिसके अन्तर्गत उन कानूनी सिद्धान्तों का विकास हुआ था जो रोमन नागरिकों की विदेशी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाये गये थे, सही अर्थ में अन्तर्राष्ट्रीय विधान नहीं था यद्यपि यह उन सम्बन्धों का भी मार्गदर्शन करता था जो रोमन साग्राज्य अपने पडोसियों से स्थापित करता था।
ग्रीक संस्कृति के प्रति पूर्ण सम्मान और निष्ठा रखते हुए भी रोमन साग्राज्यवादियों ने ग्रीक-अन्तर्राष्ट्रीय संहिता का अनुकरण नहीं किया। इसका कारण स्पष्ट ही था। जहां ग्रीक अन्तर्राष्ट्रीय विधान उस संस्कृति के स्वतन्त्र राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों से उत्पन्न आवश्यकता की देन थी, वहाँ रोमन साग्राज्य दूसरे देशों के प्रति एक विस्तारवादी दृष्टि्रकोण अपना चुका था और शीघ्रातिशीघ्र विजित कर उनका विलय अपने साम्राज्य में करना चाहता था अर्थात् उनका विश्व साम्राज्य ग्रीक राज्य व्यवस्था के विघटन पर ही सम्भव था। रोमन साम्राज्य अनेक जातियों एवं राष्ट्रीयताओं का संकलन था और जहाँ केन्द्रीय सत्ता ने स्थानीय राष्ट्रीयताओं को कुछ भी स्थापन अधिकार देना उचित नहीं समझा था। अतः ग्रीक राज्यों की अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली रोमन कूटनीतिक परिस्थितियों के सर्वथा प्रतिकूल थी।” 395 ई0 में रोमन साम्राज्य का पतन हो गया।

बाइजेन्टाइन राजनीतिक व्यवहार

रोम साम्राज्य जिसका केन्द्र रोम था, छिन्न-भिन्न हो गया तब रोमनों ने कुस्तुन्तुनिया को केन्द्र मानकर वाइजेन्टाइन साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य के चारों ओर असभ्य एवं जंगली जातियां बसी थीं। अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए रोमन सैनिक शक्ति के स्थान पर युक्ति-शाक्ति पर विश्वास करने लगे। उन असभ्यों को नियन्त्रण में रखने के लिए उन्होंने तीन तरीके अपनाये –
(क) उन असभ्य जातियों में परस्पर भेदभाव की भावना अथवा फूट का बीज बोना जिससे वे संगठित न हो सकें और उनके साम्राज्य पर आक्रमण करने का विचार न रख सके।
(ख) जो जंगली जातियां साम्राज्य के अन्तर्गत बसी हुई थी उनको धन देकर खरीद लिया गया था जिससे साम्राज्य पर आक्रमण होने पर आक्रमणकारियों का साथ न दे सके तथा
(ग) जो जातियाँ इसाई धर्म को न मानती थी, उनमें इसाई धर्म का प्रचार कर उन्हें इसाई बनाना था जिससे वे गैर-इसाई जातियों से मिलकर साम्राज्य पर आक्रमण न करें बाइजेन्टाइन सम्राटों ने कभी अपने विरोधियों को संगठित न होने दिया। अपनी नीति की सफलता के लिए उन्होंने राजदूतों की व्यवस्था की। इनका काम था स्वागतकर्ता राज्य में वहां की आन्तरिक परिस्थितियों का अध्ययन, महत्वाकांक्षियों एवं दुर्बलताओं की जानकारी व उनकी सूचनायें सम्राट को पहुंचाना। इस प्रकार राजनयिक आचार में परिवर्तन किया गया। अब राजदूत का कार्य विदेश में भाषण देना ही न रहा बल्कि वह वहां की आन्तरिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करें और पड़ौसी राज्यों की दुर्बलताओं से अपने सम्राट को प्रतिवेदन द्वारा अवगत कराते रहें जिससे सम्राट अपनी कार्य-सिद्धि को सही रूप में निर्धारित कर सके। राजदूतों की नियुक्ति करते समय उनमें तीन गुणों का विशेष ध्यान रखा जाता था –
(1) गहरे अवलोकन की क्षमता
(2) लम्बा अनुभव तथा
(3) निष्पक्ष निर्णय देने की क्षमता।
निकलसन के अनुसार, “कुशल वक्ता के स्थान पर राजदूत उद्घोषक तथा प्रशिक्षित निरीक्षक रखे गये। (At the Byzantine court diplomacy as is well known, had become a fine art and the reception of foreign missions was attended by ceremonies of great pomp.) राजदूतों की संख्या काफी बढ़ गई। योग्य राजदूतों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई। उनको समय-समय पर आवश्यक परामर्श देने तथा उनके कार्यों की देखभाल करने के लिए एक विदेश विभाग का संगठन किया गया। संधि व्यवस्था में भी एक नया प्रयोग जारी हुआ। जब कोई विदेशी शासक राजदूतों के माध्यम से सधि करता था तो उस समय एक विशेष समारोह का आयोजन किया जाता था। के0एम0 पणिक्कर के शब्दों में,
यह सुविदित है कि बाइजेन्टाइन के राज दरबार में राजनय एक परिमार्जित कला बन गई और विदेशों से आने वाले राजदूत-मण्डलों के स्वागत के समय बड़ी धूमधाम से समारोह होता था।
इन उपायों से बाइजेण्टाइन सम्राटों ने सूडान, अरब तथा एनासियनों को अपने पक्ष में किया तथा कार्ल सागर एवं कोकेशियन जन-जातियों को नियन्ति्रत किया। अपनी नीतियों का सहारा लेकर दुर्बल सैनिक शक्ति रखते हुए भी रूसियों एवं मगयारों का सफल सामना किया। आक्रमणकारियों की दुर्बलता से लाभ उठाया और अपने शत्रुओं को कभी संगठित होने का अवसर न दिया।

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