लोकतंत्र की आवश्यकता और शिक्षा का जनतंत्र

• बहुसंख्यक जनसमुदाय, जो गैर-अभिजनवर्ग का निर्मायक है, में अधिकांश भावशून्य, आलसी और उदासीन होते हैं, इसलिए एक ऐसा अल्पसंख्यक वर्ग का होना आवश्यक है जो नेतृत्व प्रदान करे।
• अभिजन सिद्धान्त के अनुसार आज के जटिल समाज में कार्यक्षमता के लिए विशेषज्ञता आवश्यक है और विशेषज्ञों की संख्या हमेशा कम ही होती है। अतः राजनैतिक नेतृत्व ऐसे चुनिंदा सक्षम लोगों के हाथ में होना आवश्यक है।
• लोकतंत्र मात्र एक ऐसी कार्यप्रणाली है जिसके द्वारा छोटे समूहों में से एक जनता के न्युनतकम अतिरिक्त समर्थन से शासन करता हैं अभिजनवादी सिद्धान्त यह भी मानता है कि अभिजन वर्गों- राजनीतिक दलों, नेताओं, बड़े व्यापारी घरानों के कार्यपालकों, स्वैच्छिक संगठनों के नेताओं और यहां तक कि श्रमिक संगठनों के बीच मतैक्य आवश्यक है ताकि लोकतंत्र की आधारभूत कार्यप्रणाली को गैर जिम्मदार नेताओं से बचाया जा सके।
• सहभागिता सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार लोकतंत्र वास्तविक अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की समान सहभागिता है, न कि मात्र सरकार को स्थायी बनाए रखना जैसा कि अभिजनवादी अथवा बहुलवादी सिद्धान्तकार मान लेते हैं। सच्चे लोकतंत्र का निर्माण तभी हो सकता है जब नागरिक राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हों और सामूहिक समस्याओं में निरंतर अभिरूचि लेते रहें। सक्रिय सहभागिता इस लिए आवश्यक है ताकि समाज की प्रमुख संस्थाओं के पर्याप्त विनिमय हों और राजनीतिक दलों में अधिक खुलापन और उत्तरदायित्व के भाव हों।
• सहभागी लोकतंत्र के सिद्धान्तकारों के अनुसार यदि नीतिगत निर्णय लेने का जिम्मा केवल अभिजन वर्ग तक सीमित रहता है तो उसके लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप बाधित होता है। इसलिए वे इसमें आम आदमी की सहभागिता की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि यदि लोकतांत्रिक अधिकार कागज के पन्नों अथवा संविधान के अनुच्छेदों तक ही सीमित रहे तो उन अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, अतः सामान्य लोगों द्वारा उन अधिकारों का वास्तविक उपभोग किया जाना आवश्यक है।
• लोकतंत्र राज्य का एक स्वरूप है और वर्ग-विभाजित समाज में सरकार अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक दोनों होती है। यह एक वर्ग के लिए लोकतंत्र है तो दूसरे के लिए अधिनायकवाद। बुर्जुआ वर्ग चुंकि अपने हित साधन में पूंजीवादी प्रणाली को नियंत्रित और संचालित करता है, इसलिए उसे सत्ता से बेदखलकर समाजवादी लोकतंत्र को स्थापित करना आवश्यक है।
जनतंत्र के लिए लिक्षा की आवश्यकता = शिक्षा के क्षेत्र में जनतंत्र के सिधान्तों तथा मूल्यों का समावेश अभी कुछ वर्ष पूर्व से ही हुआ है।इस महत्वपूर्ण परिवर्तन का श्रेय अमरीका के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी को है।उसने बताया है कि “ एक जनतंत्रीय समाज में ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिये जिससे प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक कार्यों तथा सम्बन्धों में निजी रूप में रूचि ले सके।इस शिक्षा को मनुष्य में प्रत्येक सामाजिक परिवर्तन के दृढ़तापूर्वक स्वीकार करने की सामर्थ उत्पन्न करनी चाहिये |“ डीवी के इस कथन से जनतंत्र के सिधान्तों तथा मूल्यों का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया जा जाने लगा।परिणामस्वरूप अब दिन-प्रतिदिन जनसाधारण की शिक्षा का आन्दोलन चारों कोर जोर पकड़ता जा रहा है।ठीक भी है शिक्षित होएं पर ही व्यक्ति अपने अधिकारों के सम्बन्ध में जागरूक हो सकता है तथा अपने कर्तव्यों में जनहित के लिए निभाने में तात्पर्य हो सकता है।अशिक्षित जनता अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों को नहीं समझ पाती।इससे देश में सत्ताधारियों का एक ऐसा वर्ग बन जाता है दो दूसरे व्यक्तियों के उपर अपनी इच्छाओं को थोपने लगता है।इससे जनतंत्र का मुख्य लक्ष्य-नष्ट हो जाता है।चूँकि जनतंत्रीय व्यवस्था में देश के सभी नागरिक शासन में भाग लेते हैं, इसलिए उन सब महत्व को समझते हुए अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों देश में सर्वसाधारण की अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जा रही है |

शिक्षा का जनतंत्र

जनतंत्रीय शिक्षा का अर्थ है – शिक्षा से जनतंत्र की विचारधारा का प्रभाव।शिक्षा में जनतंत्रीय विचारधारा का प्रभाव निम्नलिखित बातों पर पड़ा है –
(1) समान अवसर प्रदान करना तथा व्यक्तिगत विभिन्नता का आदर करना – जनतंत्र में प्रत्येक बालक समाज की एक पवित्र एवं अमूल्य निधि होता है।अत: प्रत्येक बालक को उसकी समस्त शक्तियों के विकास हेतु समाज में अवसर प्रदान किये जा रहे हैं।समान अवसरों के प्रदान करने का अर्थ सब बालकों को एक जैसे अवसर प्रदान करना नहीं है।कारण यह है कि जिन अवसरों से मन्द बुद्धि बाले बालकों को लाभ हो सकता है, उनसे सामान्य बुद्धि वाले बालकों को भी पर्याप्त लाभ होना आवश्यक नहीं है।ऐसी ही , प्रखर बुद्धि बाले बालकों के विकास में भी बाधा आ सकती है यदि उन्हें मन्द अथवा सामान्य बुद्धि वाले बालकों के साथ एक जैसे ही अवसर प्रदान किये जायें।अत: जब शिक्षा प्रदान करते समय व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धांत को दृष्टि रे रखते हुए प्रत्येक बालक की रुचियों, योग्यताओं तथा क्षमताओं को ध्यान में रखा जाता है |
(2) सार्वभौमिक तथा अनिवार्य शिक्षा – जनतंत्र में सरकार की बागडोर जनता के हाथ में होती है।इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को जहाँ एक ओर अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान होना चाहिये वहाँ दूसरी ओर उस पक्षपात तथा अज्ञान के अन्धकार से भी दूर रहना परम आवश्यक है।अत: अब प्रत्येक बालक को बिना किसी भेद-भाव के एक निश्चित स्तर तक अनिवार्य रूप से शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था की जा रही है जिससे वह अपने देश की उचित सरकार का निर्माण कर सके |
(3) निशुल्क शिक्षा – जनतंत्र सार्वभौमिक तथा अनिवार्य एवं समान अवसरों के प्रदान करने में विश्वास रखता है इसका अर्थ यह हुआ है कि शिक्षा में वर्ग-भेद अर्थात निर्धन एवं धनवान के अन्तर का कोई स्थान नहीं है।इसलिए अब शिक्षा सार्वभौमिक तथा अनिवार्य ही नहीं अपितु नि:शुल्क भी होती जा रही है।चूँकि जनतंत्र में शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्म-सिद्ध अधिकार है , इसलिए अमरीका, रूस, टर्की तथा फ़्रांस एवं जापान आदि सभी अनिवार्य कर दी है।साथ ही उक्त सभी राज्य अंधे, बहरे, गूंगे, लंगड़े, मन्द-बुद्धि तथा कुशाग्र बुद्धि एवं मानसिक न्यूनता ग्रस्त सभी प्रकार के बालकों की शिक्षा का उचित प्रबन्ध कर रहे हैं |
(4) प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था – जनतंत्रीय विचारधारा को दृष्टि में रखते हुए विभिन्न देशों में प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा तथा विकलांग व्यक्तियों की शिक्षा पर बल दिय जा रहा है।इस सम्बन्ध में विभिन्न राज्यों में रात्री स्कूलों, सन्डे-कोर्रसिज तथा प्रौढ़-साहित्य की व्यवस्था की जा रही है |
(5) बाल केन्द्रित शिक्षा – जनतंत्रीय विचारधारा के प्रभाव से अब बालक के व्यक्तितिव का निर्माण किया जाता है जिसमें रहते हुए बालक के व्यक्तितिव का सर्वांगीण विकास हो जाये।दूसरे शब्दों में , अब शिक्षा बाल-केन्द्रित होती जा रही है |
(6) शिक्षण पद्धतियाँ – अब बालकों को रुचियों एवं शक्तियों का दमन करने वाली रूढिगत, सामूहिक शिक्षण समाप्त होती जा रही है।परिणामस्वरूप अब बालकों के मस्तिष्क में ज्ञान को बलपूर्वक ठूंसने पर बल नहीं दिया जाता अपितु जनतंत्रीय विधियों का प्रयोग करते हुए ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाता है जिसमें रहते हुए प्रत्येक बालक ज्ञान की खोज स्वयं कर सकें |
(7) व्यक्तिगत अध्ययन का महत्त्व – जनतंत्रीय विचारधारा से प्रभावित होते हुए अब शिक्षक बालकों के व्यक्तिगत अध्ययन के महत्त्व को दृष्टि में रखते हुए उनकी पारिवारिक-परिस्थितियों, मनोवैज्ञानिक विशेषताओं सांस्कृतिक प्रष्टभूमि तथा अभिवृतियों को समझने का प्रयास कर रहे है |
(8) सामाजिक क्रियायें- अब स्कूल में केवल पुस्तकीय ज्ञान पर बल न देते हुए सामाजिक-क्रियायों तथा सामाजिक-तत्वों को मुख्य स्थान दिया जाता है जिससे प्रत्येक बालक सामाजिक अनुभव प्राप्त कर सके |
(9) छात्र परिषद् – जनतंत्रीय भावना से प्रेरित होते हुए अब स्कूलों में छात्र-संघ अथवा छात्र-परिषद् आदि को प्रोत्साहन दिया जाता है |
(10) शिक्षक के व्यक्तित्व का सम्मान – जनतंत्रीय व्यवस्था में शिक्षक के व्यक्तितिव को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।अत: जनतंत्रीय भावना से प्रेरित होते हुए अब शिक्षक से जहाँ एक ओर पाठ्यक्रम के निर्माण में सहयोग किया जा रहा है, वहाँ दूसरी ओर उसे शिक्षण कार्य के लिए भी आवशयकतानुसार शिक्षण-विधियों में परिवर्तन करने की स्वतंत्रता प्रदान की जा रही है।यही नहीं, अब शिक्षक को अपनी व्यवसायिक कुशलता को बढ़ाने के लिए भी अनके सुविधायें दी जा रही है |
(11) स्कूल प्रशासन – जनतंत्रीय भावना के प्रभाव से अब स्कूल के संगठन एवं प्रशासन कार्यों में बालकों को भाग लेने के अवसर दिये जा रहे हैं जिससे उनमें स्वशासन की भावना विकसित हो जाये |
(12) बुद्धि परीक्षायें- अब बालकों की मानसिक योग्यता का मुल्यांकन करने के लिए बुद्धि परीक्षाओं का प्रयोग किया जा रहा है |
(13) बालक का शारीरिक स्वास्थ्य – बालक को शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ रखने के लिए अब स्कूल में जहाँ एक ओर नाना प्रकार के खेलों का प्रबन्ध किया जा रहा है, वहाँ दूसरी ओर स्कूल के अस्पताल का डॉक्टर प्रत्येक बालक के शारीरिक स्वाथ्य का परीक्षा करके उसे पूर्ण स्वस्थ बनाने के लिए अपना निजी परमर्श भी देता है |
(14) स्कूल – जनतंत्रीय भावना के प्रभाव से अब स्कूल को ऐसा स्थान समझा जाता है जहाँ पर प्रत्येक बालक नागरिकता की शिक्षा के साथ-साथ विश्व-बंधुत्व की शिक्षा प्राप्त करते हुए मानवता के आदर्शों को विकसित कर सकता है।दूसरे शब्दों में, अब स्कूल को समाज का लघू रूप माना जाने लगा है |
(15) शिक्षा के समस्त साधनों में सहयोग – जनतंत्रीय समाज में शिक्षा के समस्त साधनों में परस्पर सहयोग होता है।अत: अब जनतंत्र के प्रभाव से परिवार, स्कूल, समुदाय तथा धर्म एवं राज्य आदि शिक्षा के समस्त साधनों में सहयोग स्थापित करने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं |

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