वायुमंडल में वाष्पन तथा संघनन

वायुमंडल में वाष्पन तथा संघनन का कारण है वायु की जलवाष्प ग्रहण करने की शक्ति में कमी बेशी, अर्थात्‌ आर्द्र वायु का गरम या शीतल होना। साधारणत: वायुमंडल में जलवाष्प-मात्रा संतृप्त मात्रा से कम होती है, विशेषकर भूतल के समीप जहाँ वायुमंडल का प्रभावकारी आतपन अधिकतम होता है।
वाष्पन
वायु में नमी का अधिक भाग, जो वायुमंडल में जलवाष्पचक्र को चलाता रहता है, वाष्पन से प्राप्त होता है। जैसे-जैसे जल वाष्पित होता है, तैसे तैसे वह वायुमंडल में विसरित होता रहता है। वायुमंडल में वाष्पन द्वारा होनेवाली मौसमी क्रियाएँ अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण नहीं होतीं। दृश्य भाप की उत्तपति भी वाष्पन द्वारा होनेवाली मौसमी क्रिया है। गरम जल की सतह से शीघ्रतापूर्वक वाष्पन होने के कारण बहुत ठंडी अथवा अपेक्षाकृत ठंडी आर्द्र वायु एकदम अति संतृप्त हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि दृश्य भाप के रूप में नमी का तुरंत संघनन हो जाता है जिसके कारण स्थिर हवा में घना कोहरा बन जाता है।
वायुमंडलीय संघनन
संघनन किसी खुली सतह पर उस समय होता है जब उस सतह का ताप आसपास की वायु के ओसांक (डयू पॉइंट) के ताप से कम होता है। इस प्रकार के संघनन के उदाहरण गरम मौसम में पाए जाते हैं। जैसे, यद्यपि वायु की आपेक्षिक आर्द्रता सौ प्रतिशत से पर्याप्त कम रहने पर भी बर्फ के पानी से भरे गिलास के बाहर वायु का वाष्प संघनित हो जाता है उसी प्रकार स्वच्छ प्रशांत रात्रि में ओस का संघनन उन भूतलस्थित वस्तुओं पर हो जाता है जो अपनी ऊष्मा के विकिरण के कारण आसपास की वायु के ओसांक से निम्न ताप तक ठंडी हो जाती हैं, पाला उन सतहों पर जमता है जो हिंमाक से भी अधिक ठंडी हो जाती हैं, चाहे मुक्त वायु का ताप हिमांक से काफी ऊँचा की क्यों न हो।
जब वायुमंडल के भीतर छोटे छोट जलबिंदुओं के रूप में संघनन होता है तो प्रश्न यह उठता है कि यह प्रक्रम किस प्रकार प्रारंभ होता है। प्रयोग से सिद्ध हुआ है कि पूर्णत: अशुद्धिहीन वायु में संघनन जलबिंदु के रूप में नहीं होता, चाहे उसमें वाष्पदाब संतृप्ति दाब से दस गुनी ही क्यों न हो। प्रतीत होता है कि जलवाष्प का संघनन प्रारंभ करने के लिए किसी प्रकार के कणों की आवश्यकता होती है जो शुद्ध वायु में उपस्थित नहीं होते। इस प्रकार के कण को संघनन नाभिक कहते हैं। परीक्षण से ज्ञात हुआ है कि वायु में जलाकर्षी पदार्थों के नन्हें कण, जैसे समुद्री नमक के कण, संघनन नाभिकों का कार्य करते हैं। जिन स्थानों में कारखानों का धुआँ वायुमंडल को दूषित कर देता है, वहाँ धुएँ के गंधक, फासफोरस आदि पदार्थो के आक्साइड के नन्हें कण संघनन नाभिक बन जाते हैं।
साधारणत: निचले क्षोभमंडल (ट्रॉपोस्फ़ियर) के कुहरे और बादलों में प्रति घन सेंटीमीटर सौ से दस हजार तक नन्हें जलबिंदु होते हैं। बादलों में वषबिंदु अथवा दूसरे वर्षणकण किस प्रकार निर्मित होते हैं, यह विषय अभी संशययुक्त है। कदाचित्‌ ये बहुत से छोटे-छोटे मेघकणों के संयोजन द्वारा बनते हैं। संयोजन वायु की धाराओं के मिलने और वायु के मथ उठने से होता होगा। बड़े बड़े बिंदुओंवाली तीव्र वर्षा के बारे में स्वीकृत सिद्धांत यह है कि ये बिंदु तब बनते हैं जब हिममणिभ बादलों के ऊपरी भागों में पहुँच जाते हैं जहाँ अति शीत (सूपरकूल्ड) जलकरण विद्यमान रहते हैं। इस सिद्धांत का प्रतिपादन टी वर्गरान ने किया था।

वायुमंडल का सामान्य संचार

मूलत: वायुमंडल का सामान्य संचार भूमध्यीय तथा ध्रवीय देशों के बीच क्षैतिज तापप्रवणता (ग्रेडियंट) के कारण उत्पन्न होता है। एक प्रकार के वायुमंडल का सामान्य संचार वायुमंडल की हलचल का तथा उसकी क्रियाओं का एक व्यापक विहंगम चित्र है। यदि दीर्घकाल के दैनिक मौसमी नक्शों का परीक्षण किया जाए तो यह ज्ञात होता है कि उनमें प्रवाह के रूप दो प्रकार के होते हैं :
(1) अल्पजीवी शीघ्रगामी प्रतिचक्रवात (ऐंटिसाइक्लोन) तथा अवदाब (डिप्रेशन)। इस प्रकार के भँवर प्रारंभ होने के बाद एक दिन से लेकर एक मास तक के काल में समाप्त होते हैं और फिर नक्शों से बिल्कुल अदृश्य हो जाते हैं। ये गौण संचार नाम से प्रसिद्ध हैं।
(2) दीर्घजीवी तथा धीरे-धीरे चलनेवाले भँवर। ये भी प्रतिचक्रवर्ती अथवा चक्रवाती प्रकार के होते हैं, परंतु दीर्घ काल तक लगभग निश्चल रहते हैं। ये प्राथमिक संचार कहलाते हैं। चित्र 1 और 2 में जनवरी और जुलाई के महीनों में पृथ्वी पर औसत समुद्रस्तरीय दाबरेखाएँ दी गई हैं। यह स्पष्ट है कि दोनों चित्रों में दक्षिणी गोलार्ध की कुछ बातें एक जैसी हैं।
(क) दोनों महीनों में पृथ्वी के समस्त भूमध्यरेखीय प्रदेश में एक अपेक्षाकृत अल्प, किंतु अत्यंत एकसमान, दाब का अखंड कटिबंध है। जनवरी मास में यह कटिबंध भूमध्यरेखा के कुछ उत्तर की ओर है, परंतु जुलाई मास में या तो ठीक उस रेखा पर है या थोड़ा दक्षिण की ओर। यह अल्प-दाब-कटिबंध प्रशांत तथा उष्ण मौसम का कटिबंध है जो समुद्र पर डोल्ड्रम के नाम से प्रसिद्ध है। इस पूरे कटिबंध को हम भूमध्यरेखीय अल्प-दाब-कटिबंध कह सकते हैं।
(ख) उपोष्ण (सब-ट्रॉपिकल) देशों में (लगभग 30° दक्षिण अक्षांश के निकट) एच चौड़ा अखंड अधिक दाब का कटिबंध जनवरी और जुलाई दोनों ही मासों में होता है, परंतु जनवरी मास में आस्ट्रेलिया तथा दक्षिण अफ्रीका के ऊपर यह छोटे छोटे अल्पदाब क्षेत्रों द्वारा थोड़ा विच्छिन्न हो जाता है। यह चौड़ा कटिबंध उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध कहलाता है जो दोनों गोलार्धो में सामान्य संचार का एक स्थायी स्वरूप है।
(ग) उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध के दक्षिण में वायुदाब दक्षिण की ओर बराबर गिरती जाती है और अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर न्यूनतम हो जाती है।
उत्तरी गोलार्ध में निम्नलिखित तीन प्राथमिक दाबक्षेत्रों का परिचय मिलता है:
(1) भूमध्यरेखीय अल्पदाब कटिंबध, जो दोनों गोलार्धों में समान रूप से विद्यमान रहता है।
(2) उपोष्णवलयिक अधि-दाब-कटिबंध इस गोलार्ध में पूर्णतया भिन्न प्रकार का है। जनवरी मास में यह समुद्रों पर लगभग 25°-35° उत्तर में रहता है। परंतु महाद्वीपों के ऊपर ऊँचे अक्षांशों में इसका संबंध बहुत अधिक दाब की प्रणालियों से रहता है। ये दाबप्रणालियाँ लक्षण में एकदम भिन्न होती हैं और इसलिए उपोष्णवलयिक अधि-दाब-कटिबंध को समुद्रों तक ही सीमित समझना उचित है।
(3) जनवरी मास के नक्शे पर उपोत्तरध्रुवीय (सब-आर्कटिक) अल्पदाब-कटिबंध स्पष्टतया दिखाई देता है। इस कटिबंध में दो बड़े अल्पदाब क्षेत्र आइसलैंड तथा अलूशियन द्वीपों पर हैं, जो क्रमानुसार उत्तरतम अटलांटिक महासागर पर तथा उत्तरतम पैसिफिक महासागर पर विस्तृत हैं। इन दोनों क्षेत्रों के बीच में ध्रुव पर अपेक्षतया अधिक दाब का एक क्षेत्र है। ग्रीष्म ऋतु में ये अल्पदाब बहुत क्षीण होते हैं। अलूशियन क्षेत्र तो गायब हो जाता है। ध्रुवों पर वायुदाब अपेक्षाकृत अधिक रहती है। उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध तथा उपध्रुवीय अल्पदाब कटिबंध की अखंडता में विच्छिन्नता नवीन तथा अज्ञात तत्वों के कारण होती है जिनका दक्षिणी गोलार्ध में अभाव है।

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