संगम काल राजा और राजवंश

संगम काल में दक्षिण भारत पर तीन राजवंशों ने शासन किया- चेर, चोल तथा पाण्ड्य राजवंशपाण्ड्य। संगम काल के साहित्य से इन राज्यों के बारे में जानकारी मिलती है।
चेर
चेरों ने उस क्षेत्र पर शासन किया जो वर्तमान समय में केरल के मध्य और उत्तरी भाग तथा तमिलनाडु का कोंगु क्षेत्र है। उनकी राजधानी वांजि थी। पश्चिमी तट, मुसिरी और टोंडी के बंदरगाह उनके नियंत्रण में थे।
चेरों का प्रतीक चिह्न “धनुष-बाण” था। ईसा की पहली शताब्दी के पुगलुर शिलालेख से चेर शासकों की तीन पीढ़ियों की जानकारी मिलती है। चेर राजा रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार से लाभ प्राप्त करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने ऑगस्टस का एक मंदिर भी बनवाया गया था। चेरों के सबसे महान राजा शेनगुटटवन (सेंगुत्तुवन) थे जिन्हें ‘लाल चेर’ या ‘अच्छे चेर’ भी कहा जाता था। शेनगुटटवन ने चेर राज्य में पत्तिनी (पत्नी) पूजा प्रारम्भ की। इसे कण्णगी पूजा भी कहा गया। वह दक्षिण भारत से चीन में दूत भेजने वाले पहले भारतीय राजा थे।
चोल
चोलों के नियन्त्रण में वह क्षेत्र था जो वर्तमान तमिलनाडु का मध्य और उत्तरी भाग है। उनके शासन का मुख्य क्षेत्र कावेरी डेल्टा था जिसे बाद में ‘चोलमण्डलम’ के नाम से जाना जाता था। चोलों की राजधानी उरैयूर (तिरुचिरापल्ली के पास) थी। बाद में करिकाल ने कावेरीपत्तनम या पुहार नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया। इनका प्रतीक चिह्न बाघ था। चोलों के पास एक कुशल नौसेना भी थी।
करिकाल चोल राजाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक हुआ। पत्तिनप्पालै में उनके जीवन और सैन्य अधिग्रहण को दर्शाया गया है। संगम साहित्य की विभिन्न कविताओं में वेण्णि के युद्ध का उल्लेख मिलता है जिसमें करिकाल ने पाण्ड्य तथा चेर सहित ग्यारह राजाओं को पराजित किया था। करिकाल की सैन्य उपलब्धियों ने उन्हें पूरे तमिल क्षेत्र का अधिपति बना दिया। करिकाल ने अपने शासनकाल में व्यापार और वाणिज्य क्षेत्र को संपन्न बनाया। उसने पुहार या कावेरीपत्तनम शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी उरैपुर से कावेरीपत्तनम में स्थानांतरित की। इसके अतिरिक्त कावेरी नदी के किनारे 160 किमी. लम्बा बांध बनवाया।
पाण्ड्य
पाण्ड्यों ने मदुरै से शासन किया। उनका राज्य भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी भाग में था। कोरकई इनकी प्रारंभिक राजधानी थी जो बंगाल की खाड़ी के साथ थम्परपराणी के संगम के पास स्थित थी। पाण्ड्य वंश का प्रतीक चिह्न ‘मछली’ थी।
पाण्ड्योण ने तमिल संगमों का संरक्षण किया और संगम कविताओं के संकलन की सुविधा प्रदान की। शासकों ने एक नियमित सेना बनाए रखी। संगम साहित्य के अनुसार, पाण्ड्य राज्य धनी और समृद्ध था।
पाण्ड्यों का पहला उल्लेख मेगास्थनीज ने किया है। उसने इस राज्य को मोतियों के लिये प्रसिद्ध बताया था। समाज में विधवाओं के साथ बुरा व्यवहार किया जाता था। इस राज्य में ब्राह्मणों का काफी प्रभाव था तथा ईसा के शुरूआती शताब्दियों में पाण्ड्य राजा वैदिक यज्ञ करते थे। कलभ्रस नामक जनजाति के आक्रमण के साथ उनकी शक्ति का क्षय हुआ।
संगम युग का अन्त
तीसरी शताब्दी के अन्त तक संगमकालीन व्यवस्था धीरे-धीरे पतन की तरफ अग्रसर होती गयी। तीन सौ ईस्वी पूर्व से छह सौ ईस्वी पूर्व के बीच कालभ्रस ने तमिल देश पर कब्ज़ा कर लिया था। इस अवधि को पहले के इतिहासकारों ने ‘अंतरिम युग’ या ‘अंधकार युग’ कहा है। नल्लिवकोडन संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक था।

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