प्रतिजैविक श्रेणियां

आमतौर पर प्रतिजैविक दवाओं का वर्गीकरण उनकी कार्रवाई के तंत्र, रासायनिक संरचना या गतिविधि के स्पेक्ट्रम के आधार पर होता है। अधिकांश प्रतिजैविक बैक्टीरिया के कार्य या उनकी विकास प्रक्रिया पर निशाना साधते हैं। प्रतिजैविक दवाएं, जो बैक्टीरिया की कोशिका दीवार (पेनसिलिन्स, सेफ़्लोस्पोरिन्स) या कोशिका झिल्ली (polymixins), या आवश्यक जीवाणु एंजाइम (quinolones, sulfonamides) पर लक्ष्य केंद्रित करती हैं, सामान्यत: जीवाणुनाशक प्रकृति की होती हैं। वे, जो प्रोटीन सिंथेसिस, जैसे अमीनोग्लाइकोसाइडस, माइक्रोलाइडस और टेट्रासाइक्लिन्स पर निशाना साधते हैं, आमतौर पर बैक्टीरियोस्टैटिक होते हैं इसके अलावा अपने लक्ष्य की खासियत पर आधारित वर्गीकरण भी होता है: जैसे “संकुचित स्पेक्ट्रम प्रतिजैविक” विशेष प्रकार के जीवाणुओं, जैसे ग्रैम निगेटिव, या ग्रैम पॉजिटिव जीवाणु पर लक्ष्य साधते हैं, जबकि व्यापक स्पेक्ट्रम प्रतिजैविक जीवाणुओं की एक विस्तृत श्रृंखला को प्रभावित करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रतिजैविक दवाओं के तीन नए वर्ग निदान के लिए इस्तेमाल किये जा रहे हैं। इस तरह प्रतिजैविक यौगिकों के नए वर्गों की खोज में 40 सालों का समय लगा है। इन नई प्रतिजैविक दवाओं के निम्नलिखित तीन वर्ग हैं: साइक्लिक लिपोपेपटाइडस (डेप्टोमाइसिन), ग्लीसाइलसीक्लाइंस (टीगेसाइक्लिन), और ओक्साजोलाइडिनोंस (लाइनेजोलिड). टीगेसाइक्लिन एक व्यापक स्पेक्ट्रम प्रतिजैविक है, जबकि दो अन्य का उपयोग ग्रैम-पॉजिटिव संक्रमण के इलाज के लिए होता है। इन घटनाओं को वर्तमान प्रतिजैविक दवाओं की बैक्टीरिया प्रतिरोधक प्रतिक्रिया मापने के साधन की उम्मीद के रूप में देखा जा सकता है।

उत्पादन
1939 में पहली बार फ्लोरे और चैन के अहम प्रयासों के बाद से चिकित्सा में प्रतिजैविक दवाओं के महत्व के कारण इनकी खोज और उत्पादन के लिए शोध की प्रेरणा मिली है। उत्पादन की प्रक्रिया में सामान्यतः सूक्ष्मजीवों की व्यापक श्रेणियों का निरीक्षण और उनका परीक्षण तथा संशोधन शामिल होता है। उत्पादन किण्वन (फर्मेंटेशन) के जरिये, आमतौर पर मजबूत एरोबिक तरीके से किया जाता है।

प्रशासन
मौखिक प्रतिजैविक को निगलकर लिया जाता है, जबकि नसों के जरिये दिये जाने वाले प्रतिजैविक और ज्यादा गंभीर मामलों, जैसे गहराई तक फैले प्रणालीगत संक्रमणों में इस्तेमाल किये जाते हैं। प्रतिजैविक का प्रयोग कभी-कभी बाहर से भी किया जाता है, जैसे आंख में डाली जाने वाली दवाएं या मरहम.

दुष्प्रभाव
हालांकि आमतौर पर प्रतिजैविक दवाओं को सुरक्षित और अच्छी तरह सहन करने योग्य माना जाता है, पर ये व्यापक रूप से प्रतिकूल प्रभाव से भी जुड़ी हुई हैं।[ दुष्प्रभाव कई तरह के, विविध रूपों वाले और पूरी तरह प्रतिजैविक के उपयोग और लक्ष्यित किये जाने वाले सूक्ष्मजीवों पर निर्भर होते हैं। नई दवाओं से उपचार के सुरक्षा प्रोफाइल कई वर्षों से उपयोग की जा रही दवाओं जितने स्थापित नहीं है। प्रतिकूल प्रभाव बुखार और मिचली से लेकर फोटोडर्माटाइटिस और एनाफिलिक्स जैसे बड़े एलर्जी तक के रूप में दिख सकते हैं। आम रूप से दिखने वाले दुष्प्रभावों में से एकदस्त है, जो कभी-कभी एनेरोबिक बैक्टीरियम क्लोस्ट्रिडियम डिफिसाइल के कारण होते हैं और यह प्रतिजैविक द्वारा आंत के फ्लोरा के सामान्य संतुलन को अस्तव्यस्त करने से होता है। रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया की इस तरह अतिवृद्धि को प्रतिजैविक लेने के दौरान प्रो-बायोटिक की खुराक लेने खत्म किया जा सकता है। प्रतिजैविक के कारण उन जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ सकती है जो सामान्य रूप से योनि के फ्लोरा के घटक के रूप में उपस्थित होते हैं और इससे वोल्वों-योनि क्षेत्र में जीनस कैंडीडा खमीर की प्रजातियों का जरूरत से ज्यादा विकास हो सकता है। दूसरी दवाओं के साथ अंतरक्रियाशीलता से दूसरे पार्श्व कुप्रभावों भी दिख सकते हैं, जैसे प्रणालीगत कोर्टीकोस्टेरायड के साथ एक क्विनोलोन प्रतिजैविक लेने से कण्डरा (मांशपेशी को हडडी से जोड़ने वाली नस) की क्षति का जोखिम बढ़ जाता है।

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