एशिया के प्रमुख रेगिस्तान

एशिया के प्रमुख रेगिस्तान

गोबी मरुस्थल

गोबी मरुस्थल, चीन और मंगोलिया में स्थित है। यह विश्व के सबसे बड़े मरुस्थलों में से एक है। गोबी दुनिया के ठंडे रेगिस्तानों में एक है, जहां तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे तक चला जाता है। गोबी मरुस्थल एशिया महाद्वीप में मंगोलिया के अधिकांश भाग पर फैला हुआ है। यह मरुस्थल संसार के सबसे मरुस्थलों में से एक है। ‘गोबी’ एक मंगोलियन शब्द है, जिसका अर्थ होता है- ‘जलरहित स्थान’। आजकल गोबी मरूस्थल एक रेगिस्तान है, लेकिन प्राचीनकाल में यह ऐसा नहीं था। इस क्षेत्र के बीच-बीच में समृद्धशाली भारतीय बस्तियाँ बसी हुई थीं। गोबी मरुस्थल पश्चिम में पामीर की पूर्वी पहाड़ियों से लेकर पूर्व में खिंगन पर्वतमालाओं तक तथा उत्तर में अल्ताई, खंगाई तथा याब्लोनोई पर्वतमालाओं से लेकर दक्षिण में अल्ताइन तथा नानशान पहाड़ियों तक फैला है। इस मरुस्थल का पश्चिमी भाग तारिम बेसिन का ही एक हिस्सा है।

यह संसार का पांचवां बड़ा और एशिया का सबसे विशाल रेगिस्तान है। सहारा रेगिस्तान की भांति ही इस रेगिस्तान को भी तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- 1. ताकला माकन रेगिस्तान 2. अलशान रेगिस्तान 3. मुअस या ओर्डिस रेगिस्तान

गोबी रेगिस्तान, मंगोलिया

गोबी रेगिस्तान का अधिकतर भाग रेतीला न होकर चट्टानी है। यहाँ रेगिस्तान की जलवायु में तेजी से बदलाव होता है। यहाँ न केवल सालभर तापमान बहुत जल्दी-जल्दी बदलता है, बल्कि 24 घंटों में ही तापमान में व्यापक परिवर्तन भी आ जाता है। गोबी रेगिस्तान में वर्षा की औसत मात्रा 50 से 100 मि.मी. है। यहाँ अधिकतर वर्षा गर्मी के मौसम में ही होती है। रेगिस्तान में अधिकतर नदियाँ बारिश के मौसम में ही बहती हैं। अत: केवल वर्षा ऋतु में ही नदी में पानी रहता है। निकटवर्ती पर्वतों से जल धाराएँ रेगिस्तान की शुष्क भूमि में समा जाती हैं। यहाँ काष्ठीय व सूखा प्रतिरोधी गुणों वाले सैकसोल नामक पौधे बहुतायत में मिलते हैं। लगभग पत्ति विहीन यह पौधा ऐसे क्षेत्रों में भी उग आता है, जहाँ की रेत अस्थिर होती है। अपने इस विशेष गुण के कारण यह पौधा भू-क्षरण को रोकने में सहायक होता है। गोबी रेगिस्तान ‘बेकिटरियन ऊंट’, जिनके दो कूबड होते हैं, का आवास स्थल माना जाता है। कछु जगंली किस्म के गधे भी यहाँ पाये जाते हैं। संसार के रेगिस्तान के विशेष भालू इसी रेगिस्तान में पाए जाते हैं। इन भालूओं की प्रजाति ‘मज़ालाई’ अथवा ‘गोबी’ अब लुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी है। इसके अतिरिक्त यहाँ जंगली घोड़े, गिलहरी व छोटे कद के बारहसिंगे भी पाये जात हैं। विस्तार संसार के बड़े मरुस्थलों में से एक गोबी का मरुस्थल, जिसका विस्तार उत्तर से दक्षिण में लगभग 600 मील तथा पूर्व से पश्चिम में लगभग 1000 मील है, तिब्बत तथा अल्ताई पर्वतमालाओं के बीच छिछले गर्त के रूप में विद्यमान है। इसकी प्राकृतिक भू-रचना ढालू मैदान के समान है, जिसके चारों तरफ़ पर्वतीय ऊँचाइयाँ हैं। कटाव तथा संक्षारण क्रियाओं के प्रबल होने से यह मरुस्थल अपनी विशिष्ट भूरचना के लिये प्रसिद्ध है। सूखी हुई नदियों की तलहटियाँ तथा झीलों के तटों पर ऊँचाई पर स्थित जल के निशान यहाँ की जलवायु में परिवर्तन के प्रमाण हैं। सभ्यता अवशेष प्राचीन कालीन विभिन्न सभ्यताओं के द्योतक भग्नावशेष भी इस मरुस्थल में पाए जाते हैं। यहाँ गर्मी बहुत ज़्यादा और तेज़ पड़ती है तथा गर्मी में औसत तापमान 45° से 65° सें. तथा जाड़े का ताप 15° सें. तक रहता है। यहाँ पर कभी-कभी बर्फ़ के तूफ़ान तथा उष्ण बालू मिश्रित तूफ़ान भी आते हैं। यहाँ कि वनस्पतियों में घास तथा काँटेदार झाड़ियाँ मुख्य रूप से पाई जाती हैं। जल का यहाँ प्राय: अभाव ही रहता है। कारवाँ मार्गों पर 10 मील से 40 मील की दूरी पर कुएँ पाए जाते हैं। जीव-जंतु इस मरुस्थल के पूर्वी भाग में जहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से कुछ वर्षा हो जाती है, वहाँ थोड़ी खेतीबाड़ी होती है, एवं भेड़, बकरियाँ तथा अन्य पशु पाले जाते हैं। उत्तरी- पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी भेड़ बकरियाँ पाली जाती हैं। सूदूर उत्तर में कुछ जंगल हैं। उत्तर में ओरखान तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में चीनी बस्तियाँ हैं। आबादी बहुत ही विरल है। मंगोल यहाँ की मुख्य जाति है। उत्तर तथा दक्षिण के घास के मैदानों में आदिवासी लोग हैं, जो खानाबदोशों का जीवन व्यतीत करते हैं। कारवाँ मार्ग अधिकांश पूर्व से पश्चिम दिशा में हैं, जिन पर चीनी व्यापारी कपड़े, जूते, चाय , तंबाकू , ऊन, चमड़े तथा समूर आदि का व्यापार करते हैं। भारतीय संस्कृति के अवशेष गोबी मरुस्थल में ‘सर औरेल स्टोन’ द्वारा पुरातात्त्विक खुदाई में बौद्ध स्तूपों , विहारों, बौद्ध एवं हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ, बहुत सी पांडुलिपियाँ तथा भारतीय भाषाओं एवं वर्णाक्षरों में बहुत से आलेखों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन अवशेषों के बीच घूमते हुए सर औरेल को यह अनुभव होने लगा था कि, वे पंजाब के किसी प्राचीन गाँव में घूम रहे हैं। 7वीं शताब्दी में सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग इसी गोबी मरूस्थल के रास्ते से ही भारत में आया और फिर चीन वापस गया। उसे इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति का प्राधान्य दिखाई दिया। ज्यों-ज्यों इस क्षेत्र में रेगिस्तान बढ़ता गया, त्यों- त्यों यहाँ पर भारतीय संस्कृति के केन्द्र विलुप्त होते गये।

कुल 1, 623 वर्ग किलोमीटर में फैला यह दुनिया का पांचवां बड़ा मरुस्थल है। यह उत्तर में अल्टेई पहाड़ और मंगोलिया के स्तेपी और चरागाह से घिरा है, इसके दक्षिण-पश्चिम में घंसू का गलियारा और तिब्बत के पठार तथा दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में चीन के उत्तरी क्षेत्र के मैदान हैं। यह कई तरह के जीवाश्मों और दुर्लभ जंतुओं के लिए भी जाना जाता है। गोबी मरुस्थल अतीत में महान मंगोल साम्राज्य का हिस्सा रहा है और सिल्क रोड से जुड़े कई महत्वपूर्ण शहरों का क्षेत्र रहा है। यह रेगिस्तान जलवायु और स्थलाकृति में आए कई तरह के विशिष्ट बदलाव के कारण पारिस्थितिकी और भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर बना है। गोबी रेगिस्तान हिमालय की दूसरी तरफ है, जिसके कारण हिंद महासागर से आनेवाली नम हवा रुक जाती है, नतीजतन इस क्षेत्र में वर्षा नहीं हो पाती।

गोबी के मरुस्थल से उठते धूल के गुबार से परेशान चीन ने राजधानी बीजिंग के बाहरी इलाकों से मंगोलिया के भीतर तक वृक्षारोपण के जरिये पेड़ों की दीवार बनाई है। इससे काफी हद तक ‘येलो ड्रैगन’ के नाम से मशहूर इस धूल भरी आंधी से चीन को छुटकारा मिला है। चीन की योजना इस रेगिस्तान को रोकने की है, क्योंकि उसे भय है कि इसके विस्तार से उसकी कृषि व्यवस्था के लिए संकट पैदा हो सकता है। भूजल स्तर के गिरने, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और पशुओं की चराई केकारण यह मरुस्थल फैलता ही जा रहा है।

टकलामकान

टकलामकान मरुस्थल मध्य एशिया में स्थित एक रेगिस्तान है। इसका अधिकाँश भाग चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रांत में पड़ता है। यह दक्षिण से कुनलुन पर्वत शृंखला, पश्चिम से पामीर पर्वतमाला और उत्तर से तियन शान की पहाड़ियों द्वारा घिरा हुआ है।

अंतरिक्ष से ली गई टकलामकान की एक तस्वीर

नाम की उत्पत्ति

भूवैज्ञानिकों में ‘टकलामकान’ के नाम के स्रोत को लेकर मतभेद है। कुछ कहते हैं कि यह अरबी भाषा के ‘तर्क’ (यानी ‘अलग करना’) और ‘मकान’ (यानी ‘जगह’) के मिश्रण से बना है। यह दोनों शब्द अरबी से उइग़ुर भाषा में भी आये हैं और हिंदी में भी। दुसरे विशेषज्ञों की राय है कि यह तुर्की भाषाओँ के ‘तक़लार माकान’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘खंडहरों की जगह’। यह अफ़वाह भी आम है कि ‘टकलामकान’ का मतलब ‘अन्दर जाओगे तो बाहर कभी नहीं निकलोगे’ या फिर ‘मौत का रेगिस्तान’ है, लेकिन यह महज़ ग़लत अवधारणाएं ही है।

टकलामकान रेगिस्तान का एक दृश्य

भूगोल

टकलामकान का कुल क्षेत्रफल 337000 वर्ग किमी है, जिसमें तारिम द्रोणी भी शामिल है। इसके उत्तरी और दक्षिणी छोरों से रेशम मार्ग की दो अलग शाखाएँ निकलती हैं, क्योंकि प्राचीन यात्री इस रेगिस्तान के बीच से निकलने से कतराते थे। इसमें 85% इलाक़ा हिलती हुए रेत के टीलों का है और यह दुनिया का दूसरा सब से बड़ा खिसकने वाले रेतीले टीलों का रेगिस्तान है। चीन ने 20वीं शताब्दी में इसके दक्षिणी भाग में स्थित ख़ोतान नगर से उत्तरी भाग में स्थित लुनताई शहर के बीच एक सड़क बना दी है जो बीच रेगिस्तान से गुज़रती है। पिछले कुछ सालों से कुछ उपजाऊ इलाक़े भी रेत की चपेट में आ गए हैं और टकलामकान थोड़ा सा फैल गया है।

मौसम

टकलामकान एक ठंडा रेगिस्तान है क्योंकि साइबेरिया से समीप होने से यहाँ सर्द हवाएँ आसानी से पहुँच जाती हैं। सर्दियों में यहाँ तापमान −20 °सेंटीग्रेड तक गिर जाता है, हालांकि शुष्क परिस्थितियों की वजह से यहाँ ज़्यादा बर्फ़ नहीं गिरती। फिर भी सन् 2008 में पूरे टकलामकान में बर्फ़ की एक पतली परत जम गई थी।

इतिहास और संस्कृति

टकलामकान के अंदरूनी भाग में पानी बहुत कम है और इसमें प्रवेश करना ख़तरनाक है। फिर भी इसके इर्द-गिर्द के कुछ शहरों में मरूद्यान (ओएसिस) थे जहाँ रेशम मार्ग पर चल रहे यात्री सस्ताने के लिए रुकते थे। इनमें से बहुत से नगर अब खँडहर बन चुके हैं और इतिहासकारों को यहाँ खोजने पर तुषारी, प्राचीन यूनानी, भारतीय और बौद्ध प्रभाव के चिह्न मिलते हैं।

काराकुम रेगिस्तान

काराकुम रेगिस्तान मध्य एशिया में स्थित एक रेगिस्तान है। तुर्कमेनिस्तान देश का 70% इलाक़ा इसी रेगिस्तान के क्षेत्र में आता है। ‘काराकुम’ शब्द का अर्थ ‘काली रेत’ होता है। यहाँ आबादी बहुत कम घनी है और औसतन हर 6.5 वर्ग किमी में एक व्यक्ति मिलता है। यहाँ बारिश औसत रूप से 10 वर्षों में एक दफ़ा गिरती है। यह विश्व के सब से बड़े रेतीले रेगिस्तानों में से एक है।

अंतरिक्ष से काराकुम रेगिस्तान – दाएँ में कैस्पियन सागर नज़र आ रहा है और चित्र के बाएँ ऊपर में आमू दरिया की रेखा

भूगोल

कुल मिलाकर काराकुम का क्षेत्रफल 350000 वर्ग किमी है। तुर्कमेनिस्तान के देश का अधिकतर क्षेत्र इसी रेगिस्तान में आता है। काराकुम कैस्पियन सागर से पूर्व में और अरल सागर के दक्षिण में स्थित है। उत्तर-पूर्व में आमू दरिया और किज़िल कुम रेगिस्तान हैं। आधुनिक युग में अरल सागर के सिकुड़ने से उस झील का बहुत सा हिस्सा इस रेगिस्तान की चपेट में आ गया है और कुछ लोग इस भाग को ‘अरल काराकुम’ कहने लगे हैं। यह लगभग 40000 वर्ग किमी (15440 वर्ग मील) पर विस्तृत है। अरल के सूखे हुए फर्श पर कृषि में इस्तेमाल होने वाले बहुत से कीटनाशक पदार्थ मिले हुए थे जो सिंचाई की नहरों से बहकर यहाँ आ गए थे। अब यह एक महीन धूल में मिले हुए हैं और हवा के साथ उड़कर हज़ारों मील दूर तक प्रदूषण ले जाते हैं। अरल काराकुम से उड़े कीटमार पदार्थ अन्टार्कटिका में पेंगुइनों के ख़ून में पाए जा चुके हैं। यहाँ की धूल ग्रीनलैंड की हिमानियों (ग्लेशियरों) में, नोरवे के वनों में और बेलारूस के खेतों में भी पाए जा चुकी है।

तुर्कमेनिस्तान में काराकुम का एक नज़ारा

मानवीय गतिविधियाँ

काराकुम इलाक़े के अन्दर बोल्शोई पर्वत शृंखला आती है जिसमें पाषाण युग (पत्थर युग) के मनुष्य बसेरों के अवशेष मिले हैं। आधुनिक युग में यहाँ दुनिया की दूसरी सब से लम्बी सिंचाई नहर, जिसे काराकुम नहर कहते हैं, बनाई गई थी। यह 13375 किमी लम्बी है लेकिन वक़्त के साथ-साथ इसमें से पानी जगह-जगह से चूने लगा है, जिस से कई छोटी झीलें बन गईं हैं। इनका पानी रेगिस्तान के नीचे के नमक को ऊपर ले आया है।

किज़िल कुम रेगिस्तान

किज़िल कुम या क़िज़िल क़ुम मध्य एशिया में स्थित एक रेगिस्तान है। इसका क्षेत्रफल 298000 वर्ग किमी (115000 वर्ग मील) है और यह दुनिया का 11वाँ सबसे बड़ा रेगिस्तान है। यह आमू दरिया और सिर दरिया के बीच के दोआब में स्थित है। इसका अधिकाँश हिस्सा कज़ाख़स्तान और उज़बेकिस्तान में आता है, हालांकि एक छोटा भाग तुर्कमेनिस्तान में भी पड़ता है। तुर्की भाषाओँ में ‘किज़िल कुम’ का मतलब ‘लाल रेत’ है और इस रेगिस्तान की रेतों में मिश्रित पदार्थ बहुत से स्थानों में इसे एक लालिमा देते हैं। इस से दक्षिण-पश्चिम में आमू दरिया के पार काराकुम रेगिस्तान पड़ता है जिसके नाम का अर्थ ‘काली रेत’ है।

किज़िल कुम में रेत का टीला

विवरण

किज़िल कुम का अधिकतर इलाक़ा लगभग 300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित मैदानी क्षेत्र है हालांकि कुछ जगहों पर ऊँचाईयाँ और द्रोणियाँ हैं। अधिकतर जगहों पर रेतीले टीले हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बरचान’ या ‘बरख़ान’ कहते हैं। पश्चिमोत्तर में सख़्त मिट्टी की मोती परतें हैं जिन्हें ‘ताकीर’ कहते हैं और जो कुछ-कुछ नमक के मैदान जैसी हैं। किज़िल कुम में आबादी नदियों और नख़्लिस्तानों (ओएसिस) के किनारे मिलती है। गर्मियों में तापमान बहुत ऊँचा जा सकता है और आमू दरिया के किनारे की केरकी नामक बस्ती में जुलाई 1983 में 51.7 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान देखा गया था।

अंतरिक्ष से किज़िल कुम – तस्वीर में मध्य में नीचे की तरफ – दाएँ में कैस्पियन सागर है और उस से ज़रा बाएँ में अधिकतर सूखा हुआ अरल सागर, किज़िल कुम दो नदियों की रेखाओं (आमू दरिया और सिर दरिया) के बीच का इलाक़ा है

अर्थव्यवस्था

किज़िल कुम में बहुत से खनिज हैं, जैसे कि सोना, युरेनियम, ताम्बा, अलूमिनियम, चांदी, प्राकृतिक गैस और पेट्रोल। यहाँ कि मुरुनताऊ सोने की खान मशहूर है जो 1970 के दशक में शुरू हुई थी। यहाँ का इलाक़ा बहुत विशाल और ख़ाली है और जगह-जगह पर झाड़ी और जंगली घासें हैं, इसलिए यहाँ के स्थानीय लोग मवेशी पालन में भी जुटे हुए हैं। नवोई, ज़रफ़शान शहर और उचकुदुक शहर उद्योग के मुख्य केंद्र हैं।

चोलिस्तान

चोलिस्तान, जिसे स्थानीय भाषा में रोही भी कहते हैं, पाकिस्तानी पंजाब और भारत व सिंध के कुछ पड़ोसी भागों में फैला हुआ एक रेगिस्तान व अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र है। यह थर रेगिस्तान से जुड़ा हुआ है। यहाँ हकरा नदी का सुखा हुआ प्राचीन मार्ग है जिसके किनारे सिन्धु घाटी सभ्यता के बहुत से खंडहर मिलते हैं। 9वीं सदी में राय जज्जा भट्टी द्वारा बनाया गया देरावड़ क़िला भी चोलिस्तान के बहावलपुर क्षेत्र में खड़ा है।

चोलिस्तान का देरावड़ क़िला

नामोत्पत्ति

‘चोल’ का अर्थ कई तुर्की भाषाओं में ‘मरुभुमि’ होता है।

थार मरुस्थल

थार मरुस्थल भारत के उत्तरपश्चिम में तथा पाकिस्तान के दक्षिणपूर्व में स्थितहै। यह अधिकांश तो राजस्थान में स्थित है परन्तु कुछ भाग हरियाणा, पंजाब,गुजरात और पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों में भी फैला है। अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे पर थार मरुस्थल स्थित है। यह मरुस्थल बालू के टिब्बों से ढँका हुआ एक तरंगित मैदान है।

थार मरुस्थल का दृष्य

जलवायु

थार मरुस्थल अद्भुत है। गर्मियों में यहां की रेत उबलती है। इस मरुभूमि में 52 डिग्री सेल्शियस तक तापमान रिकार्ड किया गया है। जबकि सर्दियों में तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। जिसका मुख्य कारण हैं यहाँ की बालू रेत जो जल्दी गर्म और जल्दी ठंडी हो जाती है। गरमियों में मरुस्थल की तेज गर्म हवाएं चलती है जिन्हें “लू” कहते हैं तथा रेत के टीलों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं और टीलों को नई आकृतियां प्रदान करती हैं। गर्मी ऋतु में यहां पर तेज आंधियां चलती है जो रेत के बड़े-बड़े टीलों को दूसरे स्थानों पर धकेल देती है जिससे यहां मरुस्थलीकरण की समस्या बढ़ती जाती है।

जन-जीवन

जन-जीवन के नाम पर मरुस्थल में मीलों दूर कोई-कोई गांव मिलता है। थार के मरुस्थल में अगर कोई शहर विकसित हुआ है तो वह शहर जोधपुर शहर है यहां हिंदू एवम मुसलमान धर्म के लोग ही निवास करते हैं प्रकृति की मार को सहन करते हुए भी यहां पर कुछ जातियां समृद्धि के चरम को छू रही है उदाहरण के लिए बिश्नोई समाज । इस समाज के लोगों ने यहां पर खूब तरक्की की है बिश्नोई समाज के लोग वन एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करते हुए पाए जाते हैं । थार के मरुस्थल में रहने वाले लोग वीर एवं साहसी होते हैं लोगों में देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी होती है पशुपालन यहां का मुख्य व्यवसाय है पशुओं में गाय बैल भैंस बकरी भेड़ घोड़े गधे इत्यादि जानवरों को पाला जाता है.

मरू समारोह

राजस्थान में मरू समारोह (फरवरी में) – फरवरी में पूर्णमासी के दिन पड़ने वाला एक मनोहर समारोह है। तीन दिन तक चलने वाले इस समारोह में प्रदेश की समृद्ध संस्कृति का प्रदर्शन किया जाता है।

प्रसिद्ध गैर व अग्नि नर्तक इस समारोह का मुख्य आकर्षण होते है। पगड़ी बांधने व मरू श्री की प्रतियोगिताएं समारोह के उत्साह को दुगना कर देती है। सम बालु के टीलों की यात्रा पर समापन होता है, वहां ऊंट की सवारी का आनंद उठा सकते हैं और पूर्णमासी की चांदनी रात में टीलों की सुरम्य पृष्ठभूमि में लोक कलाकारों का उत्कृष्ट कार्यक्रम होता है।

अरबी रेगिस्तान

अरबी रेगिस्तान पश्चिमी एशिया में स्थित एक विशाल रेगिस्तान है जो दक्षिण में यमन से लेकर उत्तर में फ़ारस की खाड़ी तक और पूर्व में ओमान से लेकर पश्चिम में जोर्डन और इराक़ तक फैला हुआ है। अरबी प्रायद्वीप का अधिकाँश भाग इस रेगिस्तान में आता है और इस मरुस्थल का कुल क्षेत्रफल 23.3 लाख किमी2 है, यानि पूरे भारत के क्षेत्रफल का लगभग 70%। इसके बीच में रुब अल-ख़ाली नाम का इलाक़ा है जो विश्व का सबसे विस्तृत रेतीला क्षेत्र है।

अरबी रेगिस्तान का वातावरण बहुत कठोर है। दिन में यहाँ अत्यंत गर्मी और सूरज का प्रकोप रहता है और रात में तापमान कभी-कभी शुन्य से भी नीचे गिर जाता है। इस वजह से यहाँ जीव विविधता काफ़ी कम है, हालांकि यहाँ ग़ज़ल और ओरिक्स जैसे हिरण, रेत बिल्ली और कांटेदार दुम वाली गिरगिट जैसे प्राणी रहते हैं। यहाँ कभी धारीदार लकड़बग्घा, सियार और बिज्जू भी मिलते थे लेकिन अनियंत्रित शिकार और अन्य मानवी गतिविधियों से वह यहाँ विलुप्त हो चुके हैं।

अंतरिक्ष से ली गई अरबी रेगिस्तान की तस्वीर

इस क्षेत्र की धरती के रूप विविध हैं। लाल रेत के टीले, लावा की विस्तृत चट्टानें, शुष्क पहाड़ी शृंखलाएँ, सूखी वादियाँ और ऐसे रेतीले क्षेत्र जिसमें चलने वाले दलदल की तरह अन्दर धंसकर डूब जाते हैं – सभी इस रेगिस्तान में मौजूद हैं।

कुछ विशेष भौगोलिक चीज़ें

अद-दहना नाम का एक तंग रेगिस्तानी क्षेत्र जो सउदी अरब के उत्तर में स्थित अन-नफ़ूद​ रेगिस्तान (65000 किमी2, यानि झारखंड से ज़रा छोटा) को दक्षिणपूर्व के रुब अल-ख़ाली से जोड़ता है
उत्तर-से-दक्षिण 800 किमी तक चलने वाला तुवइक़​ पहाड़ियों का सिलसिला, जो वास्तव में एक पठार का घाट है (इसकी पूर्वी तरफ़ ढलान है लेकिन पश्चिमी ओर अचानक गहरी खाईयाँ हैं)
अम्म अस-समीम के दलदल-जैसे अति-शुष्क रतीले क्षेत्र
ओमान के पूर्वी तट से लगा वहीबा का रेतीला क्षेत्र (जिसे कभी-कभी रेत का सागर कहते हैं)
रुब अल-ख़ाली का महान रेगिस्तानी इलाक़ा, जो इतना सूखा है कि यहाँ बहुत कम प्राणी और वनस्पति मिलते हैं, जिसकी वजह से इसका नाम ‘ख़ाली’ पड़ा है.

देश और निवासी

अरबी रेगिस्तान का अधिकतर हिस्सा सउदी अरब में आता है, हलाकि इसका कुछ अंश मिस्र के सीनाई प्रायद्वीप, दक्षिण इराक़ और दक्षिणी जोर्डन में भी फैला हुआ है। यहाँ के लोग मुख्य रूप से अरब जाति के हैं, जिसमें शहरों-बस्तियों में रहने वाले और ख़ानाबदोश बदुइन लोग दोनों शामिल हैं। धार्मिक दृष्टि से यहाँ के लगभग सभी लोग इस्लाम के अनुयायी हैं, हालांकि कुछ ईसाई भी बसते हैं। लगभग सभी स्थानीय लोग अरबी भाषा बोलते हैं।

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