वायुमंडल की रचना तथा ऊर्ध्वाधर विभाजन

निचले वायुमंडल की सूखी वायु में अनेक गैसों का मिश्रण होता है जिनमें मुख्यत: नाइट्रोजन 78 प्रतिशत, आक्सिजन 21 प्रतिशत, आरगन 0.93 प्रतिशत और कार्बन डाइआक्साइड 0.03 प्रतिशत होती हैं। इन गैसों के अतिरिक्त कुछ अन्य गैसें भी होती हैं, जैसे हाइड्रोजन तथा ओज़ोन। पवनों द्वारा निचले वायुमंडल के लगातार मिश्रण से तथा ऊर्ध्वाधर संवहन (कनवेक्शन) से सूखी हवा का मिश्रण इतना अपरिवर्ती रहता है कि कम से कम 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक तो सूखी हवा का अणुभार 28.96 पर स्थिर रहता है; अर्थात्‌ वायु का घनत्व 1.276 (10)3 ग्राम प्रति घन सें. होता है, जब वायु दाब 1,000 मिलीबार हो और ताप 0° सेंटीग्रेड हो।
वायुमंडल में ओज़ोन की उपस्थिति फ़ाउलर तथा स्ट्रट ने वर्णक्रमदर्शी यंत्र (स्पेक्ट्रॉस्कोप) द्वारा प्रमाणित की थी। डॉबसन के प्रेक्षणों से भी यह बात सिद्ध हो गई है तथा यह ज्ञान भी प्राप्त हुआ है कि ओज़ोन भूतल से लगभग 30 से 40 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक सीमित स्तर में पाई जाती है। इन ऊँचाई पर ओज़ोन की उपस्थिति मौसमी परिस्थितियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण है। डॉबसन की खोज से पता लगा है कि 10 किलोमीटर ऊँचाई पर की वायुदाब में और ओज़ोन की मात्रा में घनिष्ठ संबंध है।
वायुमंडल में जलवाष्प
वायुमंडल में केवल जलवाष्प ही ऐसा अवयव है जिसकी भौतिक अवस्था का परिवर्तन सामान्य वायुमंडलीय परिस्थितियों में होता रहता है। अत: वायुमंडल में जलवाष्प की प्रतिशत आयतन मात्रा बहुत घटती बढ़ती रहती है। वायुमंडल में जलवाष्प का घटना बढ़ना ऋतुविज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जल का वाष्पीकरण तथा संघनन इसलिए महत्वपूर्ण है कि न केवल इनसे एक स्थान से दूसरे स्थान को जल का परिवहन होता है, वरन्‌ इसलिए भी कि जल के वाष्पीकरण के लिए गुप्त उष्मा के अवशोषण की आवश्यकता होती है। यह अंत में पुन: प्रकट होकर वायु को तब उष्ण करने के काम में आती है जब जलवाष्प का फिर से जलबिंदु तथा हिम में संघनन होता है।
यद्यपि नाइट्रोजन गैस अमोनिया, नाइट्रिक अम्ल तथा नाइट्रेटों का मुख्य अवयव है और ये पदार्थ बारूद आदि में बहुत महत्व रखते हैं, तथापि वायुमंडल में यह गैस बिलकुल निष्क्रिय रहती है। यह तो वायुमंडल के अधिक महत्वपूर्ण अवयव आक्सिजन गैस को, जो वायुमंडल का लगभग पाँचवाँ भाग होती है, केवल तनु कर देती है।
वायुमंडलीय दाब का ऊँचाई के साथ घटना-बढ़ना
किसी भी स्थान की वायुदाब वहाँ के ऊपर की वायु के भार से उत्पन्न होती है, इसलिए दो विभिन्न ऊँचाइयों की वायुदाबों का अंतर इन दोनों ऊँचाइयों के बीच की हवा के एकांक अनुप्रस्थ काट (क्रॉस सेक्शन) के भार के बराबर होता है। यदि यह दाब का अंतर बीच की हवा के भार से यथार्थ रूप में संतुलित न हो तो उस वायुस्तर को ऊपर की ओर या नीचे की ओर त्वरण (ऐक्सेलरेशन) प्राप्त होता है। जिस परिस्थिति में दाब का अंतर और वायु का भार संतुलित हो, अथवा यों कहिए कि गुरुत्वजनित त्वरण के अतिरिक्त कोई अन्य ऊर्ध्वाधर त्वरण विद्यमान न हो, वह द्रवस्थैतिक संतुलन (हाइड्रोस्टैटिक ईक्विलिब्रियम) की परिस्थिति कहलाती है। यह परिस्थिति किसी भी स्तर पर ऊँचाई के साथ दाबपरिवर्तन की दर का परिचय देती है। यदि दो दाबस्तरों के बीच का दाब अंतर (dp) हो और दोनों स्तरों के बीच ऊर्ध्वाधर दूरी (dz) हो, घनत्व (p) हो और गुरुत्वजनित त्वरण (g) हो, तो
dp/dz = -pMg/(RT)
इस समीकरण को द्रवस्थैतिक समीकरण कहते हैं।

Leave a Comment