बंगाल की खाड़ी भाग – 2

सागर विज्ञान
बंगाल की खाड़ी एक क्षारीय जल का सागर है। यह हिन्द महासागर का भाग है।
प्लेट टेक्टोनिक्स
पृथ्वी का स्थलमंडल कुछ भागों में टूटा हुआ है जिन्हें विवर्तनिक प्लेट्स कहते हैं। बंगाल की खाड़ी के नीचे जो प्लेट है उसे भारतीय प्लेट कहते हैं। यह प्लेट हिन्द-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट का भाग है और मंथर गति से पूर्वोत्तर दिशा में बढ़ रही है। यह प्लेट बर्मा लघु-प्लेट से सुंडा गर्त पर मिलती है। निकोबार द्वीपसमूह एवं अंडमान द्वीपसमूह इस बर्मा लघु-प्लेट का ही भाग हैं। भारतीय प्लेट सुंडा गर्त में बर्मा प्लेट के नीचे की ओर घुसती जा रही है। यहां दोनों प्लेट्स के एक दूसरे पर दबाव के परिणामस्वरूप तापमान एवं दबाव में ब्ढ़ोत्तरी होती है। यह बढ़ोत्तरी कई ज्वालामुखी उत्पन्न करती है जैसे म्यांमार के ज्वालामुखी और एक अन्य ज्वालामुखी चाप, सुंडा चाप। 2004 के सुमात्र-अंडमान भूकम्प एवं एशियाई सूनामी इसी क्षेत्र में उत्पन्न दबाव के कारण बने एक पनडुब्बी भूकम्प के फ़लस्वरूप चली विराट सूनामी का परिणाम थे।
सागरीय भूगर्भशास्त्र
सीलोन द्वीप से कोरोमंडल तटरेखा से लगी-लगी एक 50 मीटर चौड़ी पट्टी खाड़ी के शीर्ष से फ़िर दक्षिणावर्त्त अंडमान निकोबार द्वीपसमूह को घेरती जाती है। ये 100 सागर-थाह रेखाओं से घिरी है, लगभग 50 मी. गहरे। इसके परे फ़िर 500-सागर-थाह सीमा है। गंगा के मुहाने के सामने हालांकि इन थाहों के बीच बड़े अंतराल हैं। इसका कारण डेल्टा का प्रभाव है।
एक 14 कि.मी चौड़ा नो-ग्राउण्ड स्वैच बंगाल की खाड़ी के नीचे स्थित समुद्री घाटी है। इस घाटी के अधिकतम गहरे अंकित बिन्दुओं की गहरायी 1340 मी. है। पनडुब्बी घाटी बंगाल फ़ैन का ही एक भाग है। यह फ़ैन विश्व का सबसे बड़ा पनडुब्बी फ़ैन है।
सागरीय जीवविज्ञान, पशु एवं पादप
बंगाल की खाड़ी जैव-विविधता से परिपूर्ण है, जिसके कुछ अंश हैं प्रवाल भित्ति, ज्वारनदमुख, मछली के अंडेपालन एवं मछली पालन क्षेत्र एवं मैन्ग्रोव। बंगाल की खाड़ी विश्व के 64 सबसे बड़े सागरीय पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक है।
केरीलिया जेर्दोनियाई बंगाल की खाड़ी का एक समुद्री सांप होता है। एक शंख शेल (Conus bengalensis) जिसे ग्लोरी ऑफ़ बंगाल अर्थात बंगाल की शोभा कहा जाता है, इसको यहां के सागरतटों पर यत्र-तत्र देखा जा सकता है। इसकी सुंदरता देखते ही बनती है। ओलिव रिडले नामक समुद्री कछुआ विलुप्तप्राय प्रजातियों में आता है, इसको गहीरमाथा सागरीय उद्यान, गहीरमाथा तट, ओडिशा में पनपने लायक वातावरण उपलब्ध कराया गया है। इसके अलावा यहां मैर्लिन, बैराकुडा, स्किपजैक टूना, (Katsuwonus pelamis), यलोफ़िन टूना, हिन्द-प्रशांत हम्पबैक डॉल्फ़िन (Sousa chinensis), एवं ब्राइड्स व्हेल (Balaenoptera edeni) यहां के कुछ अन्य विशिष्ट जीवों में से हैं। बे ऑफ़ बंगाल हॉगफ़िश (Bodianus neilli) एक प्रकार की व्रास मीन है जो पंकिल लैगून राख या उथले तटीय राख में वास करती है। इनके अलावा यहाम कई प्रकार के डॉल्फ़िन झुण्ड भी दिखाई देते हैं, चाहे बॉटल नोज़ डॉल्फ़िन (Tursiops truncatus), पैनट्रॉपिकल धब्बेदार डॉल्फ़िन (Stenella attenuata) या स्पिनर डॉल्फ़िन (Stenella longirostris) हों। टूना एवं डॉल्फ़िन प्रायः एक ही जलक्षेत्र में मिलती हैं। तट के छिछले एवं उष्ण जल में, इरावती डॉल्फ़िन (Orcaella brevirostris) भी मिल सकती हैं। डब्ल्यूसीएस के शोधकर्ताओं के अनुसार बांग्लादेश के सुंदरबन इलाके और बंगाल की खाड़ी के लगे जल क्षेत्र में जहां कम खारा पानी है, वहां हत्यारी व्हेल मछलियों के नाम से कुख्यात अरकास प्रजाति से संबंधित करीब 6,000 इरावदी डॉल्फिनों को देखा गया था।
ग्रेट निकोबार बायोस्फ़ियर संरक्षित क्षेत्र में बहुत से जीवों को संरक्षण मिलता है जिनमें से कुछ विशेष हैं: खारे जल का मगर (Crocodylus porosus), जाइंट लेदरबैक समुद्री कछुआ (Dermochelys coriacea), एवं मलायन संदूक कछुआ (Cuora amboinensis kamaroma)।
एक अन्य विशिष्ट एवं विश्वप्रसिद्ध बाघ प्रजाति जो विलुप्तप्राय है, रॉयल बंगाल टाइगर, को सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षण मिला हुआ है। यह उद्यान गंगा-सागर-संगम मुहाने पर मैन्ग्रोव के घने जंगलों में स्थित है।
रासायनिक सागरीयशास्त्र
बंगाल की खाड़ी के तटीय क्षेत्र खनिजों से भरपूर हैं। श्रीलंका, सेरेन्डिब, या रत्न – द्वीप कहलाता है। वहां के रत्नों में से कुछ प्रमुख है: अमेथिस्ट, फीरोजा, माणिक, नीलम, पुखराज और रक्तमणि, आदि। इनके अलावा गार्नेट व अन्य रत्नों की भारत के ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश राज्यों में काफ़ी पैदाइश है।
भौतिक सागरविज्ञान – बंगाल की खाड़ी की जलवायु
जनवरी से अक्टूबर माह तक धारा उत्तर दिशा में दक्षिणावर्ती चलती हैं, जिन्हें पूर्व भारतीय धाराएं या ईस्ट इण्डियन करेंट्स कहा जाता है। बंगाल की खाड़ी में मॉनसून उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ती है और मई माह के अन्तर्राष्ट्रीय तक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह से टकराती है। इसके बाद भारत की मुख्य भूमि के उत्तर-पूर्वी तट पर जून माह के अन्तर्राष्ट्रीय तक पहुंचती है।
वर्ष के शेष भाग में, वामावर्ती धाराएं दक्षिण-पश्चिमी दिशा में चलती हैं, जिन्हें पूर्व भारतीय शीतकालीन जेट (ईस्ट इण्डियन विन्टर जेट) कहा जाता है। सितंबर एवं दिसम्बर में ऋतुएं काफ़ी सक्रिय हो जाती हैं और इसे वर्षाकाल (मॉनसून) कहा जाता है। इस ऋतु में खाड़ी में बहुत से चक्रवात बनते हैं जो पूर्वी भारत को प्रभावित करते हैं। इनसे चलने वाले आंधी-तूफ़ान से निबटने हेतु कई प्रयास किये जाते हैं।

उष्णकटिबंधीय तूफान और चक्रवात

बंगाल की खाड़ी के ऊपर ऐसा तूफ़ान जिसमें गोल घूमती हुई हवाएं 74 मील (119 कि.मी) प्रति घंटा की गति से चल रही हों, उसे चक्रवात कहा जाता है; और यदि ये अटलांटिक के ऊपर चल रहा हो तो उसे हरिकेन कहा जाता है। 1970 में आये भोला चक्रवात से 1-5 लाख बांग्लादेश निवासी मारे गये थे।
2013, चक्रवात महासेन
2012, चक्रवात नीलम
2011, बहुत गंभीर चक्रवाती तूफान ठाणे
2010, अति गंभीर चक्रवाती तूफान गिरि
2008, अति गंभीर चक्रवाती तूफान नरगिस
2007, अति गंभीर चक्रवाती तूफान साइड्र
2006, अति गंभीर चक्रवाती तूफान माला
1999, सुपर चक्रवाती तूफान 05बी
1996, कोणसीमा चक्रवात
1991, महाचक्रवाती तूफान 02B
1989, नवंबर टायफ़ून गे
1985, मई उष्णकटिबंधीय तूफान एक (1 बी)
1982, अप्रैल चक्रवात एक (1 बी)
1982, मई उष्णकटिबंधीय तूफान दो (2 बी)
1982, अक्टूबर उष्णकटिबंधीय तूफान तीन (3 बी)
1981, दिसम्बर चक्रवात तीन (3 बी)
1980, अक्टूबर उष्णकटिबंधीय तूफान एक (1 बी)
1980, दिसम्बर अज्ञात तूफान चार (4 बी)
1980, दिसम्बर उष्णकटिबंधीय तूफान पांच (5 ब)
1977, आंध्र प्रदेश के चक्रवात (6B)
1971, चक्रवात ओडिशा
1970, नवम्बर भोला चक्रवात
1864 कलकत्ता चक्रवात: 40 फ़ीट की तूफ़ानी सर्ज उत्पन्न की। इसमें दबाव अंकन बैरोमीटर के 28.025 इंच पहुंचा और परिणामस्वरूप 50,000 लोग मृत तथा 30,000 लोग बाद की महामारियों में मारे गये थे।
1876 बेकरगंज चक्रवात: 10 से 30-40 फ़ीट तूफ़ान सर्ज, 1 लाख मृत एवं अन्य 1 लाख बाद की महामारियों से मृत
1885 का फ़ॉल्स प्वाइंट चक्रवात: 22 फ़ीट तूफ़ान सर्ज; दबाव बैरोमीटर पर 27.135 इंच पारा।

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