बंगाल की खाड़ी भाग – 4

सीमापार के मुद्दे जो बंगाल की खाड़ी की सागरीय पारिस्थितिकी को प्रभावित करते हैं
सीमापार का मुद्दा वह पर्यावरण संबंधी समस्या होता है, जिसमें या तो समस्या का कारण या फ़िर उसका प्रभाव किसी राष्ट्रीय सीमा के पार तक पहुंच जाता है। या फ़िर इस समस्या का वैश्विक पर्यावरण में योगदान हो जाता है। ऐसी समस्या का क्षेत्रीय समाधान ढूंढना वैश्विक पर्यावरण लाभ माना जाता है। बंगाल की खाड़ी से संबंधित आठ राष्ट्रों द्व्रा तीन प्रधान सीमापार समस्याएं (या ध्यान देने योग्य क्षेत्र) गिने हैं जिनका प्रभाव खाड़ी क्षेत्र के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बंगाल की खाड़ी वृहत सागरीय प्रिस्थितिकी परियोजना (अर्थात बे ऑफ़ बंगाल लार्ज मैरीन ईकोसिस्टम प्रोजेक्ट/ BOBLME) के उद्योग से, इन आठ राष्ट्रों ने (2012) इन मुद्दों और उनके कारणों तथा निवारण पर प्रत्यिक्रियाएं एकत्रित की हैं, जिन पर आधारित भविष्य के योजना क्रियान्वयन कार्यक्रम बनेंगे तथा लागू किए जायेंगे।
मत्स्यपालन का अत्यधिक उपभोग
बंघाल की खाड़ी का मत्स्य उत्पादन 60 लाख टन प्रतिवर्ष है, जो विश्व के कुल उत्पादन के 7% से भी अधिक है। मत्स्यपालन एवं मछुआरों से संबंधित प्रधान सांझी सीमापार मुद्दों में आते हैं: समग्र मत्स्य उत्पादन में बढ़ती कमी; प्रजाति संरचनाओं में होते जा रहे परिवर्तन, पकड़ी जा रही मत्स्य मात्रा में छोटी मछलियों का बड़ा अनुपात (जिसके कारण युवा होने से पूर्व ही अच्छी प्रजाति की मत्स्य मारी जाती हैं) और सागरीय जैवविविधता में परिवर्तन, विशेषकर लुप्तप्राय एवं भेद्य प्रजातियों की हानि से। इन मुद्दों के सीमापार होने का कारण है: कई मत्स्य प्रजातियां BOBLME राष्ट्रों के जल में सांझी हैं, इसके अलावा मछलियों या उनके लार्वा के एक जल-सीमा से दूसरे में स्थानांतरगमन। मछुआरे राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्रों व सीमाओं का उल्लंघन करते ही रहते हैं, चाहे या अनचाहे, संवैधानिक या अवैध रूप से, जिनका प्रमुख कारण है एक क्षेत्र मेंमछुआरों की व खपत की अधिकता जो मछुआरों को अधिक मछली पकड़ने के लिये बाहरी व दूसरे निकटवर्ती क्षेत्र में जाने को मजबूर करती है। लगभग सभी राष्ट्रों में मछली पकड़ने के व्यवसाय की ये यह समस्या छोटे या बड़े रूप से आमने आती ही है। बंगाल की खाड़ी बड़े रूप से लुप्तप्राय व खतरे वाली प्रजातियों के लुप्त होने क्ली वैश्विक समस्या में बड़ा योगदान देती है।
इसके प्रमुख कारणों में आते हैं, मछली पकड़ने हेतु खुले क्षेत्र (सागर में पूरी सीमा चिह्नित करता संभव नहीं है), सरकार का अधिक मछली उत्पादन पर जोर, मछुआरों को मिलने वाली छूटों व सब्सिडियरीज़ में कमी और नावों व नाविकों द्वारा अधिक खपत के प्रयास, बढ़ती हुई मछली की खपत, अप्रभावी फ़िशरी प्रबंधन एवं अवैध एवं ध्वंसात्मक मत्स्य-उद्योग।
महत्त्वपूर्ण पर्यावासों का पतन
बंगाल की खाड़ी उच्च श्रेणी की जैवविविधता का क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में जीवों की खतरे वाली तथा लुप्तप्राय प्रजातियां बसती हैं। पर्यावासों से संबंधित सीमापार के प्रमुख मुद्दों में: मैन्ग्रोव पर्यावासों की क्षति एवं क्षय, कोरल रीफ़्स का पतन, सागरीय घासों की हानि एवं क्षति। इन मुद्दों के सीमापार होने के मुख्य कारण इस प्रकार से हैं: सभी BOBLME राष्ट्रों में सभी तीन महत्त्वपूर्ण पर्यावास क्षेत्र स्थित हैं। इसके अलावा इन सभी राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न कारणों से होने वाले भूमि एवं तटीय विकास समान होते हैं। इन पर्यावासों के उत्पादों के व्यापार सभी राष्ट्रों में समान हैं। इन सभी राष्ट्रों की जलवायु में बदलाव के प्रभाव सांझे होते हैं। इन मुद्दों के प्रमुख कारणों में: तटीय क्ष्त्रों में खाद्य सुरक्षा निम्न स्तर की है, तट विकास योजनाओं की भारी कमी, तटीय पर्यावासों से प्राप्त उत्पादों के व्यापार में तेज बढ़ोत्तरी, तटिय विकास एवं औद्योगिकरण, अप्रभावी सागरीय संरक्षित क्षेत्र एवं प्रवर्तन में कमी; जल-बहाव के आड़े आने वाले विकास, पर्यावासों के लिये हानिकारक कृषि अभ्यास एवं तेजी से बढ़ता पर्यटन उद्योग।
प्रदूषण एवं जल गुणवत्ता
प्रदूषण और जल गुणवत्ता संबंद्घी प्रधान सीमापार के मुद्दों में: मल-निकास (सीवर) जनित रोगजनक (पैथोजनक) एवं अन्य कार्बनिक मल-अवशेष; ठोस अपशिष्ट/समुद्री कूड़ा; तेल-प्रदूषण; निरंतर उपस्थित कार्बनिक प्रदूषक (POP) एवं उपस्थित विषाक्त पदार्थ (PTSs); अवसाद कण एवं भारी धातु अवशेष। इन मुद्दों की सीमापार होने के स्थिति है: बिना या आंशिक शुद्धिकृत किया सीवेज निर्वहन एक सभी की सांझी समस्या है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों द्वारा लाये गए कार्बनिक अपशिष्ट एवं अवशेष सीमाएं पार कर ही जाते हैं और बड़े स्तर पर हाईपॉक्सिया का कारण बनते हैं। प्लास्टिक एवं परित्यक्त मछली पकड़ने के गियर राष्त्रीय सीमाओं से परे जल के रास्ते पहुंच जाते हैं। नदियों द्वारा उच्च-पोषक एवं खनिज अपशिष्ट भी सीमाओं के बन्धन से परे रहते हैं। भिन्न राष्त्रों के कानूनों एवं नौवहन मल निर्वहन नियमों में भिन्नता और उसके प्रवर्तन में कमी के कारण भी अवशेष और अपशिष्ट सीमाएं पार कर जाते हैं। इसी कारण टारबॉल लम्बी दूरियाम तय कर जाते हैं।POPs/PTSs एवं पारा, साथ ही कार्बन-पारे के यौगिक भि लम्बी दूरियां तय कर जाते हैं। अवसादन के कारण और भारी धातुओं के संदूषण से सीमापार भी प्रदूषण फ़ैलता रहता है। इन मुद्दों के प्रमुख कारण है: बढ़ती तटीय जनसंख्या घनत्व और शहरीकरण; प्रति व्यक्ति उत्पन्न अधिक कचरे वृद्धि, जिसके परिणामस्वरूप उच्च खपत, अपशिष्ट प्रबंधन करने के लिए आवंटित अपर्याप्त धन, BOBLME देशों में उद्योग हेतु निकटवर्ती देशों से पलायन और छोटे उद्योगों के प्रसार।

इतिहास
उत्तरी सर्कार वंश ने बंगाल की खाड़ी के पश्चिमी तटीय इलाके पर अपना आधिपत्य जमाया और कालांतर में वही भारत की मद्रास स्टेट बना। राजराज चोल प्रथम कालीन चोल राजवंश (9वीं – 12वीं शताब्दी) ने 1014 ई. में बंगाल की खाड़ी की पश्चिमी तटरेखा पर अपना अधिकार किया और इसी कारण तत्कालीन बंगाल की खाडी चोल-सागर भी कहलायी। काकातिया राजवंश ने खाड़ी के गोदावरी और कृष्णा नदियों के बीच के तटीय दोआब क्षेत्र पर अधिकार किया था। प्रथम शताब्दी ईसवी के मध्य में कुशाणों ने उत्तर भारत पर आक्र्मण कर अपने राज्य का विस्तार बंगाल की खाड़ी तक किया। चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने राज्य का विस्तार उत्तर भारत में बंगाल की खाड़ी तक किया था। बंगाल में वर्तमान डायमंड हार्बर के निकटवर्ती हाजीपुर पर पुर्तगाली समुद्री लुटेरों का काफ़ी समय तक अधिकार रहा। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने बंगाल की खाड़ी के उत्तर में चिट्टागॉन्ग में अपनी व्यापारिक पोस्ट, पोर्तो ग्रान्दे और सातगांव में पोर्तो पेक्विनो की स्थापना की।
ब्रिटिश पेनल उपनिवेश
पोर्ट ब्लेयर में बनी सेलुलर जेल जो “काला पानी” के नाम से प्रसिद्ध थी, अंग्रेज़ों ने 1896 में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के कैदियों को आजीवन बंदी बनाने हेतु बनवायी थी। यह भी अंडमान द्वीपसमूह में स्थित है।
सागरीय पुरातात्त्विक समीक्षा
सागरीय पुरातत्त्वशास्त्र या मैरीन आर्क्योलॉजी प्राचीन लोगों के अवशेष पदारथों एवं वस्तुओं के अध्ययन को कहते हैं। इसकी एक विशेष शाखा डूबे जहाजों की पुरातात्त्विकी के अन्तर्गत्त टूटे एवं डूबे पुरातन जहाजों के अवशेषों का अध्ययनकिया जाता है। पाषाण व धात्विक लंगर, हाथी दांत, दरयाई घोड़े के दांत, चीनी मिट्टी के बर्तन, दुर्लभ काठ मस्तूल एवं सीसे के लट्ठे आदि कई वस्तुएं ऐसी होती हैं, जो काल के साथ खराब नहीं होती हैं और बाद में पुरातत्त्वशस्त्रियों के अध्ययन के लिये प्रेरणा बनती हैं, जिससे उनके बारे में ज्ञान लिया जा सके तथा उनसे उनके समय का ज्ञान किया जा सके। कोरल रीफ़्स, सूनामियों, चक्रवातों, मैन्ग्रोव की दलदलों, युद्धों एवं टेढ़े-मेढ़े समुद्री मार्गों का मिला-जुला योगदान उन जहाजों के टूटने या डूबने में रहा था।
प्रसिद्ध जहाज एवं टूट या डूब
1778 से 1783 अमरीकी क्रांति/स्वाधीनता युद्ध के परिणाम बंगाल की खाड़ी तक दृष्टिगोचर हुए।
1850 में अमरीकी क्लिपर ब्रिगेड- ईगल को बंगाल की खाड़ी में ही डूबा माना जाता है।
अमरीकी बापतिस्त एडोनिरैम जडसन, जू. की मृत्यु 12 अप्रैल, 1850 में हुई, जिसको बंगाल की खाडी में ही दफ़नाया गया था।
1855 में द बार्क “इन्क्रेडिबल” जहाज बंगाल की खाड़ी में एक जलमग्न चट्टान से टकराकर डूब गया था।
1865 में, एक समुद्री आंधी से स्टार ऑफ़ इण्डिया (यूटर्प) का मस्तूल टूट कर ध्वस्त हो गया, जब वह एक चक्रवात से निकल रहा था।
1875 वेलेडा नामक 76 मी. (250 फ़ीट) लम्बा और 15 मी. (50 फ़ीट) चौड़ा यान था, जो किसी बचाव दल का सदस्य था डूब गया।
1942 में द्वितीय अभियानी बेड़े के जापानी क्रूज़र यूरा ने मलायन सेना की ओर से बंगाल की खाड़ी के व्यापारी जहाजों पर हमला बोल दिया था।
3 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी नौसेना ने दावा किया था कि भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस राजपूत ने उनकी एक पनडुब्बी पीएनएस ग़ाज़ी को विशाखापट्टनम में डुबो दिया था।

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