बायोम और उसके मुख्य प्रकार और विवरण

जैवक्षेत्र (biome) या जैवक्षेत्र धरती या समुद्र के किसी ऐसे बड़े क्षेत्र को बोलते हैं जिसके सभी भागों में मौसम, भूगोल और निवासी जीवों (विशेषकर पौधों और प्राणी) की समानता हो। किसी बायोम में एक ही तरह का परितंत्र (ईकोसिस्टम) होता है, जिसके पौधे एक ही प्रकार की परिस्थितियों में पनपने के लिए एक जैसे तरीक़े अपनाते हैं। जैवक्षेत्र के अन्तर्गत प्रायः स्थलीय भाग के समग्र वनस्पति और जन्तु समुदायों को ही सम्मिलित करते हैं क्योंकि सागरीय जैवक्षेत्र का निर्धारण कठिन होता है। हालांकि इस दिशा में शोधकर्ताओं द्वारा प्रयास किये गये हैं। यद्यपि जैवक्षेत्र में वनस्पति तथा जन्तु दोनों को सम्मिलित करते हैं, तथापि हरे पौधों का ही प्रभुत्व होता है क्योंकि इनका कुल जीवभार जन्तुओं की तुलना में बहुत अधिक होता है।

बायोम के प्रकार

  1. रेगिस्तानी बायोम
    किसी रेगिस्तानी बायोम में पौधों में अक्सर मोटे पत्ते होते हैं (ताकि उनका जल अन्दर ही बंद रहे) और उनके ऊपर कांटे होते हैं (ताकि जानवर उन्हें आसानी से खा न पाएँ)। उनकी जड़ें भी रेत में उगने और पानी बटोरने के लिए विस्तृत होती हैं। बहुत से रेगिस्तानी पौधे धरती में ऐसे रसायन छोड़ते हैं जिनसे नए पौधे उनके समीप जड़ नहीं पकड़ पाते। इस से उस पूरे क्षेत्र में पड़ने वाला हल्का पानी या पिघलती बर्फ़ उन्ही को मिलती है और यह एक वजह है कि रेगिस्तान में झाड़-पौधे एक-दूसरे से दूर-दूर उगते दिखाई देते हैं। यह सभी लक्षण रेगिस्तानी पौधे में एक-समान होने से जीव-वैज्ञानिक इस परितंत्र को एक ‘बायोम’ का ख़िताब देते हैं।

2.उष्णकटिबंधीय सदाबहार वर्षावन बायोम
सदाबहार वर्षावन बायोम जीवन की उत्पत्ति तथा विकास के लिए अनुकूलतम दशायें प्रदान करता है, क्योंकि इसमें वर्ष भर उच्च वर्षा तथा तापमान बना रहता है। इसी कारण इसे अनुकूलतम बायोम कहते हैं, जिसका जीवभार सर्वाधिक होता है। इस बायोम का विस्तार सामान्यतः 10° उत्तर तथा 10° दक्षिण अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। इसका सर्वाधिक विकास तथा विस्तार अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, तथा इण्डोनेशियाई क्षेत्रों ख़ासकर बोर्नियो तथा सुमात्रा आदि में हुआ है।

  1. सवाना बायोम (घास का मैदान)
    सवाना बायोम से आशय उस वनस्पति समुदाय से है जिसमें धरातल पर आंशिक रूप से शु्ष्कानुकूलित शाकीय पौधों (partially xeromorphic herbaceous plants) का (मुख्यतः घासें) प्राधान्य होता है, साथ ही विरल से लेकर सघन वृक्षों का ऊपरी आवरण होता तथा मध्य स्तर में झाड़ियाँ होती हैं। इस बायोम का विस्तार भूमध्यरेखा के दोनों ओर 10° से 20° अक्षांशों के मध्य (कोलम्बिया तथा वेनेजुएला के लानोज, दक्षिण मध्य ब्राजील, गयाना, परागुवे, अफ्रीका में विषुवतरेखीय जलवायु प्रदेश के उत्तर तथा दक्षिण मुख्य रूप से मध्य तथा पूर्वी अफ्रीका- सर्वाधिक विस्तार सूडान में, मध्य अमेरिका के पहाड़ी क्षेत्रों, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और भारत में) पाया जाता है। सवाना की उत्पति तथा विकास के संबंध में अधिकांश मतों के अनुसार इसका प्रादुर्भाव प्राकृतिक पर्यावरण में मानव द्वारा अत्यधिक हस्तक्षेप के फलस्वरूप हुआ है। भारत में पर्णपाती वनों के चतुर्दिक तथा उनके बीच में विस्तृत सवाना क्षेत्र का विकास हुआ है, परन्तु भारतीय सवाना में घासों की अपेक्षा झाड़ियों का प्राधान्य अधिक है।

4.सागरीय बायोम
सागरीय बायोम अन्य बायोम से इस दृष्टि से विशिष्ट है कि इसकी परिस्थितियाँ (जो प्रायः स्थलीय बायोम में नहीं होती हैं) पादप और जन्तु दोनों समुदायों को समान रूप से प्रभावित करती हैं। महासागरीय जल का तापमान प्रायः 0° से 30° सेण्टीग्रेट के बीच रहता है, जिसमें घुले लवण तत्वों की अधिकता होती है। इस बायोम में जीवन और आहार श्रृंखला का चक्र सूर्य का प्रकाश, जल, कार्बन डाई ऑक्साइड, ऑक्सीजन की सुलभता पर आधारित होता है। ये समस्त कारक मुख्य रूप से सागर की ऊपरी सतह में ही आदर्श अवस्था में सुलभ होते हैं, क्योंकि प्रकाश नीचे जाने पर कम होता जाता है तथा 200 मीटर से अधिक गहरायी तक जाने पर पूर्णतया समाप्त हो जाता है। ऊपरी प्रकाशित मण्डल सतह में ही प्राथमिक उत्पादक पौधे (हरे पौधे, पादप प्लवक (फाइटोप्लैंकटन) प्रकाश संश्लेषण द्वारा आहार उत्पन्न करते हैं) तथा प्राथमिक उपभोक्ता -जन्तुप्लवक (जूप्लैंकटन)- भी इसी मण्डल में रहते हैं तथा पादप प्लवक का सेवन करते हैं।

  1. टुण्ड्रा बायोम
    भौतिक भूगोल में, टुण्ड्रा एक बायोम है जहां वृक्षों की वृद्धि कम तापमान और बढ़ने के अपेक्षाकृत छोटे मौसम के कारण प्रभावित होती है। टुंड्रा शब्द फिनिश भाषा से आया है जिसका अर्थ “ऊँची भूमि”, “वृक्षविहीन पर्वतीय रास्ता” होता है। टुंड्रा प्रदेशों के तीन प्रकार हैं: आर्कटिक टुंड्रा, अल्पाइन टुंड्रा और अंटार्कटिक टुंड्रा। टुंड्रा प्रदेशों की वनस्पति मुख्यत: बौनी झाड़ियां, दलदली पौधे, घास, काई और लाइकेन से मिलकर बनती है। कुछ टुंड्रा प्रदेशों में छितरे हुये वृक्ष उगते हैं। किसी टुंड्रा प्रदेश और जंगल के बीच की पारिस्थितिक सीमा वृक्ष रेखा कहलाती है।
    विवरण
    कनाडा तथा यूरेशिया के उत्तर में स्थित यह ध्रुवीय शीतमरुस्थल ऊँचे अक्षांशों में न्यून तापमान के कारण हिमाच्छादित रहता है। जाड़े में इसका ताप -13.90 सें. से -45.6 सें. तक रहता है। जाड़े में यहाँ बर्फीली आँधियां चलती हैं। उत्तरी ध्रुव से आनेवाली ये ठंडी हवाएँ “पुर्गा” कहलाती हैं। शीत ऋतु आठ मास और ग्रीष्म ऋतु चार मास की होती है। ग्रीष्म में यहाँ का तापमान 10 डिग्री सें. रहता है। यहाँ की वार्षिक औसत वर्षा 24 सेंमी. से 30 सेंमी. तक है।

यहाँ काई, लाइकेन (Lichen), विलो (Willow), भुर्ज (Birch) तथा झरवेरी आदि वनस्पतियाँ प्राप्त होती हैं। रेनडीयर, कैरिबो, ध्रुवीय भालू, लोमड़ी, मस्क (Musk) बैल तथा खरगोश ये स्थलीय जीव तथा सील, ह्वेल, वालरस आदि जलचर यहाँ पाए जाते हैं। ग्रीष्म ऋतु में अनेक प्रकार के पक्षी भी पाए जाते हैं। यहाँ के निवासी लैप, सैमोयेद तथा एस्किमो भोजन में मछली के अतिरिक्त रेनडीयर के मांस तथा दूध का उपयोग करते हैं और रेनडीयर की खाल पहनते हैं। ठंडी हवा से बचने के लिए ये लोग बिना खिड़की के छोटे दरवाजेवाले मकान बनाते हैं। सील की चर्बी जलाकर ये लोग घर को गरम रखते हैं। रेनडीयर स्लेज गाड़ी खीचने के काम में आता है तथा उसकी हड्डियों और सींगों से हथियार बनाए जाते हैं। समूर और खाल के बदले में ये लोग श्वेत जातियों से चाय तथा तंबाकू प्राप्त करते हैं। रेनडीयर तथा मस्क बैल के मांस का निर्यात होता है, जो गोमांस से प्राय: तिगुने मूल्य पर बिकता है। उत्तरी अमरीका के टुंड्रा निवासियों को एस्किमो तथा यूरेशिया के टुंड्रा निवासियों को लैप्स, फिन या याकूत कहते हैं।

यहाँ के निवासी बड़े गरीब हैं। केवल यूकन में सोना, स्पिट्सबर्जेन में कोयला तथा मेकैंजी घाटी में तेल पाया गया है। अलास्का में 300 मील लंबी तेल पट्टी है। टुंड्रा प्रदेश का मानव जीवन- टुंड्रा प्रदेश के लोगों का जीवन जानवरों पर ही निर्भर करता है पिघले हुए समुद्र में वालरस नाम के भीमकाय जानवरों की गुर्राहट सुनाई देने लगती है वालरस के बड़े-बड़े झुंड समुद्र में तैरते मिलते हैं सील व्हेल मछली आदि भी समुद्र में खूब दिखने लगती है चुकी लोग समुद्र के इन जानवरों का शिकार करते हैं यह जानवर उनके जीवन का आधार है| टुंड्रा प्रदेश में चलने वाली ठंडी हवाएं पुर्गा तथा ब्लीजार्ड कहलाती हैं

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