गन्ने का वानस्पतिक वर्गीकरण

गन्ना (Sugarcane ; वानस्पतिक नाम – Saccharum officinarum) विश्व की एक प्रमुख नकदी फसल है, जिससे चीनी, गुड़, शराब आदि का निर्माण होता हैं। गन्ने का उत्पादन सबसे ज्यादा ब्राज़ील में होता है और भारत का गन्ने की उत्पादकता में संपूर्ण विश्व में दूसरा स्थान हैI गन्ने की खेती बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देती है और विदेशी मुद्रा प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

वानस्पतिक वर्गीकरण

सैकेरम वंश की पाँच महत्वपूर्ण जातियाँ हैं जो निम्नलिखित हैं:
सैकेरम साइनेन्स
इसे चीनी गन्ना के रूप में जाना जाता है। इसका उदभव स्थान मध्य एवं दक्षिण पूर्व चीन है।
यह लंबी पोरियों से युक्त पतला वृंत और लंबी एवं संकुचित पत्तियों से युक्त गन्ना है।
इसमें सुक्रोस अंश एवं शुध्दता कम होती है और रेशा एवं स्टार्च अधिक होता है।
गुणसूत्र संख्या 2x = 111 से 120 है। इस जाति के अन्तर्गत एक उल्लेखनीय प्रजाति ऊबा है जिसकी खेती कई देशों में की जाती है।
इस समय इस जाति को व्यापारिक खेती के लिए अनुपर्युक्त माना जाता है।
सैकेरम बार्बेरी
यह जाति उपोष्ण कटिबंधीय भारत का मूल गन्ना है।
इसे ‘भारतीय जाति’ माना जाता है।
उपोष्ण कटिबंधीय भारत में गुड़ एवं खाड़सारी चीनी का निर्माण करने के लिए इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है।
यह अधिक मजबूत एवं रोग प्रतिरोधी जाति है और इसके गन्नों में अधिक शर्करा एवं रेशा अंश होता है। वे पतले वृंत वाले होते हैं।
इस जाति के क्लोन उच्च एवं निम्न तापमानों, समस्या ग्रस्त मृदाओं और जलाक्रांत दशाओं के लिए अधिक सहिष्णु है।
सैकेरम रोबस्टम
यह जाति न्यू गिनी द्वीप समूह में खोजी गई थी। इस जाति के गन्नों के वृंत लंबे, मोटे एवं बढ़ने में ओजपूर्ण होते हैं।
यह रेशा से भरपूर है और अपर्याप्त शर्करा अंश रखती है। गुणसूत्र संख्या 2x = 60 एवं 80 है।
यह जंगली जाति है और कृषि उत्पादन के लिए अनुपयुक्त है।
सैकेरम स्पान्टेनियम
इसे भी ‘जंगली गन्ने’ के रूप में जाना जाता है। इसकी प्रजातियाँ गुणसूत्रों की परिवर्तनशील संख्या (2x = 40 से 128) रखती है। इस जाति की आकारिकी में पर्याप्त परिवर्तनशीलता देखी गई है।
सामान्यत: इसका वृंत पतला एवं छोटा होता है। और पत्तियाँ संकुचित (तंग) एवं कठोर होती हैं।
पौधा अधिक मजबूत और अधिकांष रोगों का प्रतिरोधी होता है।
यह जाति शर्करा (चीनी) उत्पादन के लिए उपयोगी नहीं है क्योंकि शर्करा अंश बहुत कम होता है।
यह जाति विशेष रूप से रोग एवं प्रतिबल प्रतिरोधी प्ररूप प्राप्त करने के लिए संकर प्रजातियाँ विकसित करने के लिए उपयोगी है।

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