जाति की विशेषताएँ

जाति की परिभाषा असंभव मानते हुए अनेक विद्वानों ने उसकी विशेषताओं का उल्लेख करना उत्तम समझा है। डॉ॰ जी. एस धुरिए के अनुसार जाति की दृष्टि से हिंदू समाज की छह विशेताएँ हैं –
(1) जातीय समूहों द्वारा समाज का खंडों में विभाजन,
(2) जातीय समूहों के बीच ऊँच नीच का प्राय: निश्चित तारतम्य,
(3) खानपान और सामाजिक व्यवहार संबंधी प्रतिबंध
(4) नागरिक जीवन तथा धर्म के विषय में विभिन्न समूहों की अनर्हताएँ तथा विशेषाधिकार,
(5) पेशे के चुनाव में पूर्ण स्वतंत्रता का अभाव और
(6) विवाह अपनी जाति के अंदर करने का नियम।

जाति एक स्वायत्त ईकाई
परंपरागत रूप में जातियाँ स्वायत्त सामाजिक इकाइयाँ हैं जिनके अपने आचार तथा नियम हैं और जो अनिवार्यत: बृहत्तर समाज की आचारसंहिता के अधीन नहीं हैं। इस रूप में सब जातियों की नैतिकता और सामाजिक जीवन न तो परस्पर एकरस है और न पूर्णत: समन्वित। फिर भी, भारतीय जातिपरक समाज का समन्वित तथा सुगठित सामुदायिक जीवन है, जिसमें विविधताओं तथा विभिन्नताओं को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा कुछ वैश्य जातियों को छोड़कर प्राय: प्रत्येक जाति की नियमित तथा आचारों का उल्लंघन करने पर उन्हें दंडित करती है। क्षत्रिय तथा ब्राह्मण जातियाँ भी जातीय जनमत के दबाव से और यदाकदा जातीय बंधुओं की तदर्थ पंचायत द्वारा उल्लंघनकर्ताओं को अनुशासित और दंडित करती हैं। उच्च जातीयों का यह अनुशासन राज्यतंत्र द्वारा भी होता रहा है।
जातियों में ऊँच-नीच का भेद
जातियाँ एक दूसरे की तुलना में ऊँची या नीची हैं। एक ओर क्षत्रिय के बाद दूसरी धार्मिक रूप से पवित्र मानी जानेवाली ब्राह्मण जातियाँ हैं और दूसरी ओर सबसे नीचे अंत्यज श्रेणी की ‘अपवित्र’ और ‘अछूत’ कही जानेवाली जातियाँ हैं। इनके बीच अन्य सभी जातियाँ हैं जो सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणी में रखी जा सकती हैं। हिंदू धर्मशास्त्रों ने पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त किया है। जातियों की सामाजिक मर्यादा का अनुमान करने में इससे सुविधा होती है। किंतु अनेक जातियों की वर्णगत स्थिति अनिश्चित है। कायस्थ जाति के वर्ण के विषय में अनेक धारणाएँ हैं।
खानपान और व्यवहार संबंधी प्रतिबंध
एक पंक्ति में बैठकर किसके साथ भोजन किया जा सकता है और किसके हाथ का छुआ हुआ या बनाया हुआ कौन सा भोजन तथा जल आदि स्वीकार्य या अस्वीकार्य है, इसके अनेक जातीय नियम हैं जो भिन्न भिन्न जातियों और क्षेत्रों में भिन्न भिन्न हैं। इस दृष्टि से ब्राह्मण को केंद्र में रखकर उत्तर भारत में जातियों को पाँच समूहों में विभक्त किया जा सकता है। एक समूह में ब्राह्मण जातियाँ है जिनमें स्वयं एक जाति दूसरी जाति का कच्चा भोजन स्वीकार नहीं करती और न एक पंक्ति में बैठकर भोजन कर सकती है। ब्राह्मणों को कुछ जातियाँ इतनी निम्न मानी जाती हैं कि उच्चजातीय ब्राह्मणों से उनकी कभी कभी सामाजिक दूरी बहुत कुछ उतनी ही होती है। जितनी उच्च ब्राह्मण जाति और किसी शूद्र जाति के बीच होती है। दूसरे समूह में वे जातियाँ आती हैं जिनके हाथ का पका भोजन ब्राह्मण स्वीकार कर सकता है। तीसरे समूह की जातियों से ब्राह्मण केवल जल ग्रहण कर सकता है। चौथे समूह की जातियाँ यद्यपि अछूत नहीं, तथापि ब्राह्मण उनके हाथ का जल ग्रहण नहीं कर सकता। पाँचवे समूह में वे सब जातियाँ हैं जिपके छूने मात्र से ब्राह्मण तथा अन्य शुद्ध जातियाँ अशुद्ध हो जाती हैं और अशुद्धि दूर करे के लिये वस्त्रों एवं शरीर को धोने तथा अन्य शुद्धिक्रियाओं को आवश्यकता होती है। हिंदू समाज में भोजन संबंधी एक जातीय आचार यह हे कि कच्चा भोजन अपनी जाति के हाथ का ही स्वीकार्य होता है। दूसरी परंपरा यह है कि ब्राह्मण के हाथ का भी कच्चा भोजन ग्रहण किया जाता है। तीसरी परंपरा यह है कि अपने से सभी ऊँची जातियों के हाथ का कच्चा भोजन स्वीकार किया जाता है। सभी जातियाँ पहली परंपरा में हैं और अन्य जातियाँ सामान्यत: बाद के नियमों का अनुसरण करती हैं। एक अछूत जाति दूसरी अछूत जाति के हाथ से न तो कच्चा और न पक्का भोजन स्वीकार करती है, यद्यपि शुद्ध जातियों के हाथ का दोनों प्रकार का भोजन उन्हें स्वीकार्य है। पूर्वी तथा दक्षिणी बंगाल, गुजरात तथा समस्त दक्षिणी भारत में कच्चे तथा पक्के भोजन का यह भेद नहीं है। गुजरात तथा दक्षिणी भारत में ब्राह्मण किसी अब्राह्मण जाति के हाथ से न तो भोजन और न जल ही ग्रहण करता है। उत्तर भारत में अस्पृश्य जातियों से छू जाने पर छूत लगती है किंतु दक्षिण में अछूत व्यक्ति की छाया और उसके निकट जाने से ही छूत लग जाती है। ब्राह्मण को तमिलाड में शाणान जाति के व्यक्ति द्वारा 24 पग से, मालाबार में तियाँ से 36 पग और पुलियाँ से 96 पग की दूरी से छूत लग जाती है। महाराष्ट्र में अस्पृश्य की छाया से उच्चजातीय व्यक्ति अशुद्ध हो जाता है। केरल में नायर जैसी सुसंस्कृत जाति के छूने से नंबूद्री ब्राह्मण अशुद्ध हो जाता है। तमिलाड में पुराड बन्नान नाम की एक जाति के दर्शन मात्र से छूत लग जाती है।

जातियों की अनर्हताएँ तथा विशेषाधिकार
भारतीय जातिव्यवस्था में कुछ जातियाँ उच्च, पवित्र, शुद्ध और सुविधाप्राप्त हैं और कुछ निकृष्ट, अशुद्ध, अस्पृश्य और असुविधाप्राप्त हैं। क्षत्रिय पूज्य एवं ब्राह्मण पवित्र हैं और उन्हें अनेक धार्मिक, सामाजिक तथा नगारिक विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इनके विपरीत अस्पृश्य जातियाँ हैं। धार्मिक दृष्टि से ये जातियाँ शास्त्रों के पठनपाठन तथा श्रवण के अधिकार से वंचित हैं। इनका उपनयन संस्कार नहीं होता। इनके धार्मिक कृत्यों में पौरोहित्य नहीं करता। देवालयों में इनका प्रवेश निषिद्ध है। ये अशुद्ध और अशुद्धिकारक हैं। आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्र में गंदे और निकृष्ट समझे जानेवाले कार्य इनके सुपुर्द हैं जिनसे आय प्राय: अत्यल्प होती है। इनकी बस्तियाँ गाँव से कुछ हटकर होती हैं। ये अनेक सामाजिक और नागरिक अनर्हताओं के भागीदार हैं। नाई और धोबी की शारीरिक सेवाएँ इन्हें उपलब्ध नहीं हैं। ये सार्वजनिक तालाबों, धर्मशालाओं और शिक्षासंस्थाओं का उपयोग नहीं कर सकते। अंत्यजों की दशा उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत में अधिकहीन है। 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक महाराष्ट्र में महार जाति के लोगों को दिन में दस बजे के बाद और 4 बजे के पहले ही गाँव और नगर में घुसने की आज्ञा थी। उस समय भी उन्हें गले में हाँडी और पीछे झाड़ू बाँधकर चलना होता था। दक्षिण भारत में पूर्वी और पश्चिमी घाट के शाणान और इड़वा कुछ काल पूर्व तक दुतल्ला मकान नहीं बनवा सकते थे। वे जूता, छाता और सोने के आभूषणों का उपयोग नहीं कर सकते थे। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक तियाँ और अन्य अछूत जाति की नारियाँ शरीर का ऊर्ध्व भाग ढककर नहीं चल सकती थीं। नाई, कुम्हार, तेली जैसी जातियाँ भी वैदिक संस्कारों और शास्त्रीय ज्ञान के अधिकार से वंचित रही हैं। इसके विपरीत क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। मनुस्मृति के अनुसार क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों को मृत्युदंड से मुक्ति दी गयी थी। हिंदू राजाओं के शासनकाल में ब्राह्मणों को दंड तथा करसंबंधी अनेक रियायतें प्राप्त थीं। धार्मिक कर्मकांडों में पौरोहित्य का अधिकार क्षत्रिय एवं ब्राह्मण को है। क्षत्रिय भी विशेष सम्मान के अधिकारी हैं। शासन करना उनका अधिकार है। छुआछूत का दायरा बहुत व्यापक है। अछूत जातियाँ भी एक दूसरे से छूत मानती हैं। मालाबार में पुलियन जाति के किसी व्यक्ति को यदि कोई परहिया छू ले तो पुलियन पाँच बार स्नान करके और अपनी एक अँगुली के रक्त निकाल देने के बाद शुद्धिलाभ करता है। श्री ई. थर्स्टन के अनुसार यदि नायादि जाति का व्यक्ति एक सौ हाथ की दूरी पर आ जाए तो सभी अपवित्र हो जाते हौं। उन्हीं के अनुसार यदि ब्राह्मण किसी परहिया अथवा होलिया के घर या मुहल्ले में भी चला जाए तो उससे उनका घर और बस्ती अपवित्र हो जाती है।

जाति और पेशा
प्रत्येक जाति का एक या अधिक परंपरागत धंधा है। कुछ विभिन्न जातियों के समान परंपरागत धंधे भी हैं। आर. वी. रसेल (R.V. Russel) ने मध्यभारत के बारे में बताया है कि वहाँ कृषकों की 40, बुनकरों की 11 और मछुओं की सात भिन्न भिन्न जातियाँ हैं। कृषि, व्यापार और सैनिक वृत्ति आदि कुछ ऐसे पेशे हैं जो प्राय: सभी जातियों के लिये खुले रहे हैं। अछूत इसमें अपवाद हैं, यद्यपि कृषि अनेक अछूत जातियाँ भी करती हैं। आज ईसा की 20 वीं शताब्दी के मध्य तक अधिकांश जातियों के अधिकतर लोग अपने परंपरागत पेशों में लगे हैं। चमड़ा कमाना, जूते बनाना, विष्टा की सफाई आदि कुछ ऐसे गंदे तथा निकृष्ट समझे जानेवाले कार्य हैं। जिन्हें करने की अनुमति अन्य उच्च जातियाँ अपने सदस्यों को नहीं देतीं। इसके विपरीत बुनाई का धंधा अनेक छोटी जातियों ने अपना लिया है। जजमानी व्यवस्था से संबंधित नाई, धोबी, बढ़ई, लोहार, आदि के कुछ ऐसे धंधे हैं जिनपर संबंधित जातियाँ अपना अधिकार मानती हैं। पौरोहित्य पर ब्राह्मण जातियों का एकाधिकार है। यज्ञ कराना, अध्ययन अध्यापन और दान दक्षिणा लेना ब्राह्मणों का जातीय कर्म तथा वृत्ति है। क्षत्रियों का परंपरागत कार्य शासन और सैनिक वृत्ति है।

गाँव में विभिन्न जातीय समूह सेवा की एक ऐसी व्यवस्था में गठित हैं जिसमें अधिकांश जातियाँ दूसरे की परंपरागत रूढ़ियों पर आधारित आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के लिये उपयोगी, निश्चित तथा विशिष्ट सेवा देती हैं1 इसे कुछ विद्वानों ने जजमानी व्यवस्था कहा है। जजमानी व्यवस्था का विस्तार आर्थिक जीवन के साथ साथ सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी है और अनेक सेवक जातियाँ अपने सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी है और अनेक सेवक जातियाँ अपने जजमानों से आर्थिक सेवा के अतिरिक्त सामाजिक उत्सवों और धार्मिक संस्कारों के आधार पर भी संबद्ध हो गई। ब्राह्मण तथा अनेक सेवक जातियों का संबंध तो अपने जजमानों केवल धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन से है। भाट, नट आदि और ब्राह्मणों की अनेक जातियों की गणना इस श्रेणी में की जा सकती है।

सजातीय विवाह
सजातीय विवाह जातिप्रथा की रीढ़ माना जाता है। वास्तव में बहुधा एक जाति में भी अनेक अंतर्विवाही समूह होते हैं जो एक प्रकार से स्वयं जातियाँ हैं और जिनकी पृथक्‌ जातीय पंचायतें, अनुशासन और प्रथाएँ हैं। इन्हें उपजातियों का नाम भी दिया जाता है। सजातीय अथवा अंतर्विवाह के कुछ अपवाद भी हैं। पंजाब के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च जाति का व्यक्ति छोटी जाति की स्त्री से विवाह कर सकता है। मालाबार में नंबूद्री ब्राह्मण मातृस्थानीय नायर नारी से वैवाहिक संबंध करता है।

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