अरबी की खेती के लिए जलवायु एवं भूमि, आइए जाने

अरबी या घुइयाँ (अंग्रेजी:Taro) के नाम से भी जाना जाता है | मुख्य रूप से इसकी खेती कन्द के लिए ही की जाती है | इसके अन्द की सब्जी बनायी जाती है, उपवास के समय इन्हीं कन्दों का उपयोग फलाहार के लिए किया जाता है | इसके पत्तों की भी सब्जी बनाई जाती है | कुछ प्रजातियों के कन्दों में कनकानाहट पायी जाती है | जो उबाल देने के बाद समाप्त हो जाती है | पत्तियों में कनकनाहट कंन्द की तुलना में अधिक पायी जाती है |
भारत में अरबी दो प्रकार की होती है जिसमे एक एडिन और दूसरी डेसिन टाइप होती है। एडिन को अरबी तथा डेसिन को बण्डा कहते हैं। दोनों प्रजातियों की खेती पूरे भारत में की जाती हैI क्षेत्रफल की दृष्टि से अफ्रीका अरबी का प्रथम उत्पादक देश है। घुईया या अरबी में चिड़चिड़ाहट या एक्रीडिटी पाई जाती है जो पकाने के बाद ख़त्म हो जाती है |

अरबी की खेती के लिए जलवायु एवं भूमि

बिहार के विभिन्न जिलों में इसकी खेती के लिए अत्यन्त उपर्युक्त जलवायु पाई गई है जिससे इसकी बढ़वार तथा पैदावार अच्छी होती हैअरबी की खेती के लिए हमेशा ऊँची, उपजाऊँ तथा अच्छी जल निकास वाली भूमि उपर्युक्त होता है। चिकनी मिट्टी को छोड़ इसकी खेती सभी प्रकार के खेतों में की जाती है जिसका पी॰एच॰ मान 5.5 से 7.0 हो।

अरबी की उन्नतशील प्रजातियां

अरबी की बहुत सी प्रजातियां पाई जाती है जिनमें सतमुखी, श्रीरश्मि, तथा श्री पल्लवी प्रजातियां उन्नतशील हैं साथ ही सफ़ेद गौरैया, काका काचू, पंचमुखी, एन.डी.सी.1,एन.डी.सी.2, एन.डी.सी.3, सहर्षमुखी, कदमा, मुक्ताकाशी, नदिया लोकल, अहिना लोकल, तेलिया इसके साथ ही सी.9, सी.135, सी.149 , सी.266 इसके साथ ही एस.3, एस.11, पंजाब, गौरैया बिहार, फैजाबादी, बंसी और लधरा प्रजाति भी अच्छी होती हैं। जिसकी उत्पादन क्षमता भी ज्यादा होती है।

खेत की तैयारी

अरबी की नर्म मिट्टी में ज्यादा उपज होती है इसलिए खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। तत्पश्चात तीन चार जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को भुरभुरा करके समतल बना लेना चाहिए| आख़िरी जुताई में सड़ी गोबर की खाद 100 से 150 कुंतल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिला देना चाहिए |

अरबी की खेती में बीज की मात्र
मध्यम आकार की अरबी बीज के लिए उपयुक्त मानी जाती है। बीजों के लिए मध्यम आकार के कंदो का चुनाव करना चाहिएI मध्यम आकार के कंद 7.5 से9.5 कुंतल प्रति हेक्टेयर बीज लगता हैI

समय तथा विधि
उत्तर भारत में अरबी की दो बुवाई की जाती है। जायद में मार्च से अप्रैल तक कंदो की बुवाई या रोपाई की जाती हैI खरीफ या बरसात में तथा पहाड़ो में जून से जुलाई तक कंदो की बुवाई या रोपाई की जाती हैI इसकी बुवाई कतारों में करनी चाहिए जिसकी दूरी 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर एवं 6 से 7 सेंटीमीटर गहराई पर कंदो की बुवाई या रोपाई करनी चाहिएI

उर्वरक की मात्रा

नत्रजन फास्फोरस तथा पोटाश 80:60:80 कि॰ग्रा॰/हेक्टर की दर से व्यवहार में लाने के लिए अनुशंसित है। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग तीन भागों मे बाँट कर करें। रोपाई से पूर्व फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा नेत्रजन एवं पोटाश की एक तिहाई मात्रा का प्रयोग करें।नेत्रजन एवं पोटाश की एक तिहाई मात्रा अंकुरण होने के 7-8 दिनों बाद तथा शेष बची मात्रा को प्रथम उपरिवेषन से एक माह बाद निकौनी के पश्चात् मिट्टी चढ़ाते समय इस्तेमाल करें।

सिंचाई

फरवरी माह में रोपाई की गई फसल में 5-6 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। खेतों में नमी बनाये रखने के लिए 12-15 दिनों मे अंतराल पर सिंचाई अवश्य करें जिससे अच्छी उपज होती है।
निकाई – गुड़ाई:-
प्रथम निकौनी 45-50 दिनों बाद करें इसके पश्चात् मेड़ पर मिट्ट्ी चढ़ा दें जिससे पौधों की अच्छी बढ़वार के साथ-साथ अच्छी उपज भी होती। खरपतवार के नियंत्रण के लिए खरपतवार नाशी का भी प्रयोग कर सकते हैं। जैसे एल्ट्रजीन या सीमैजिन का एक किलोग्राम क्रियाशिल तत्व/हेक्टर की दर से प्रयोग करें।

रोग तथा नियंत्रण
अरबी में मुख्यतः लीफ ब्लाइट या पीथियम गलन बीमारी या रोग लगता हैI लीफ ब्लाइट के नियंत्रण हेतु डाइथेन एम 45 का 8 से 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए इसके साथ ही रोगरोधी प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिएI पीथियम के नियंत्रण हेतु किसी फफूंदी नाशक से भूमि शोधन करना चाहिए तथा रोगरोधी प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिएI
कीट तथा उनका नियंत्रण
अरबी में लीफ हापर तथा लीफ ईटर कीट लगते हैI लीफ हापर के नियंत्रण हेतु एक प्रतिशत बी.एच.सी. डस्ट का छिड़काव करना चाहिएI लीफ ईटर के नियंत्रण हेतु लेड अर्सिनेट का छिड़काव करना चाहिएI

फसल की खुदाई

अरबी की फसल 5-7 माह में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। वैसे 140 – 150 दिनों बाद कन्दों की खुदाई कर बाजार में बिक्री की जा सकती है।जब इसे बीज के उद्वेश्य से इसकी खेती करते हैं तो इसे दिसम्बर-जनवरी माह में खुदाई की जानी चाहिए ताकि जितने भी तने हैं वह पूरी तरह से सुख जाय।

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