नवपाषाण युग का सम्पूर्ण इतिहास भाग – 2

क्षेत्र के आधार पर काल-विभाजन
फर्टाइल क्रेसेंट

9500 ई.पू. के आसपास प्री-पोटरी नियोलिथिक ए (पीपीएनए) चरण से संबंधित पहली पूरी तरह से विकसित नियोलिथिक संस्कृतियां फर्टाइल क्रेसेंट में दिखाई दी। लगभग 10700 से 9400 ई.पू. तक एलेप्पो के उत्तर में 25 किमी की दूरी पर टेल कैरामेल में एक बस्ती स्थापित हुई। इस बस्ती में 9650 के समय की दो मंदिर शामिल थी। प्री-पोटरी नियोलिथिक ए (पीपीएनए) के दौरान लगभग 9000 ई.पू. में लेवंत में दुनिया का पहला ज्ञात नगर जेरिको दिखाई दिया। यह पत्थर और संगमरमर की एक दीवार से घिरा हुआ था जिसमें 2000-3000 लोग रहते थे और यहां पत्थर का एक विशाल टावर भी था। लगभग 6000 ई.पू. में लेबनान, इजायल और फिलिस्तीन, सीरिया, एनाटोलिया और उत्तरी मेसोपोटामिया में हलफ संस्कृति दिखाई पड़ी और जो शुष्क कृषि पर टिकी थी।
दक्षिणी मेसोपोटामिया
जलोढ़ मैदानों (सुमेर/एलाम). थोड़ी सी बारिश की वजह से सिंचाई व्यवस्था जरूरी है। 5500 ई.पू. की उबैद संस्कृति.
उत्तरी अफ्रीका
बकरी और भेड़पालन संभवतः 6000 ई.पू.[कृपया उद्धरण जोड़ें] में निकट पूर्व से मिस्र पहुंच गया। ग्रीम बार्कर का कहना है “नील घाटी में पालतू जानवरों और पौधों का पहला निर्विवाद सबूत उत्तरी मिस्र में पांचवीं सहस्राब्दी ई.पू. के आरम्भ तक और आगे चलकर दक्षिण में एक हजार साल बाद तक दिखाई नहीं दिया है और दोनों मामलों में यह उन रणनीतियों का हिस्सा है जो अभी भी काफी हद तक मछली पकड़ना, शिकार करना और जंगली पौधों को इकठ्ठा करने पर निर्भर है और इससे यह पता चलता है कि गुजर बसर के तरीके में होने वाले इस तरह के परिवर्तन निकट पूर्व से आने वाले किसानों की वजह से नहीं हुए थे बल्कि यह एक स्वदेश विकास था और इसके साथ ही साथ अनाजों को या तो स्वदेश से या अदला बदली के माध्यम से प्राप्त किया जाता था। अन्य विद्वानों का तर्क है कि मिस्र में खेती और पालतू जानवरों (और साथ ही साथ मिट्टी की ईंटों से मकान, इमारत इत्यादि बनाने की वास्तुकला और अन्य नियोलिथिक सांस्कृतिक विशेषताएं) का प्राथमिक प्रोत्साहन मध्य पूर्व से मिला था।

यूरोप
दक्षिण पूर्व यूरोप में कृषि समाज सबसे पहले 7000 ई.पू. के आसपास और मध्य यूरोप में 5500 ई.पू. के आसपास दिखाई दिया। इस क्षेत्र के सबसे आरंभिक सांस्कृतिक परिसरों में थेसली की सेस्क्लो संस्कृति शामिल है जो बाद में स्तार्सेवो-कोरोस (क्रिस), लाइनियरबैंडकेरामिक और विंका को प्रदान करते हुए बाल्कन में फ़ैल गई। सांस्कृतिक प्रसार और लोगों के प्रवासन के एक संयोजन के माध्यम से नियोलिथिक परम्पराएं पश्चिम और उत्तर की तरफ फैलती हुई लगभग 4500 ई.पू. तक उत्तर पश्चिमी यूरोप तक पहुंच गई। हो सकता है कि विंका संस्कृति ने लेखन की सबसे आरंभिक प्रणाली, विंका चिह्नों का सृजन किया हो हालांकि प्रायः सर्वत्र पुरातत्वविदों ने इस बात को स्वीकार किया है कि सुमेरियन कीलाक्षर स्क्रिप्ट ही लेखन का सबसे आरंभिक वास्तविक रूप था और विंका चिह्नों ने काफी हद तक लेखन के एक वास्तविक विकसित रूप के बजाय पिक्टोग्राम और इडियोग्राम का प्रदर्शन किया। कुकुटेनी-ट्राईपिलियन संस्कृति ने 5300 से 2300 ई.पू. तक रोमानिया, मोल्डोवा और यूक्रेन में बहुत सी बस्तियों का निर्माण किया। गोज़ो (माल्टीज द्वीपसमूह में) और मनाजद्रा (माल्टा) के भूमध्यसागरीय द्वीप पर गगान्तिजा के मेगालिथिक मंदिर परिसर अपनी विशाल नियोलिथिक संरचनाओं के लिए उल्लेखनीय हैं जिनमें से सबसे पुराना परिसर 3600 ई.पू. के आसपास का है। हाइपोजियम ऑफ हल-सफ्लिएनी, पाओला, माल्टा एक भूमिगत संरचना है जिसका पता 2500 ई.पू. के आसपास की गई खुदाई से चला है; वास्तव में यह एक अभयारण्य था जो एक कब्रिस्तान बन गया जो दुनिया का एकमात्र प्रागैतिहासिक भूमिगत मंदिर है जहां माल्टीज द्वीपों की प्रागितिहास में अनोखे पत्थर की मूर्ति में कलात्मकता की झलक मिलती है।

दक्षिण और पूर्व एशिया
उत्तर भारत की सबसे आरंभिक नियोलिथिक साइटों में से एक लहुरादेवा जो मध्य गंगा क्षेत्र में स्थित है जो आठवीं सहस्राब्दी ई.पू. के आसपास के सी14 समय का है। अभी हाल ही में गंगा और यमुना नदियों के संगम के पास झुसी नामक एक और स्थान का पता चला है जो अपने नियोलिथिक स्तरों के लिए 7100 ई.पू. की एक सी14 डेटिंग है। लहुरादेवा पर पुरात्वविद राकेश तिवारी की एक नई 2009 रिपोर्ट से नए सी14 डेटिंग का पता चलता है जो चावल से जुडे 8000 ई.पू. और 9000 ई.पू. के बीच के समय का है जो लहुरादेवा को सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का सबसे आरंभिक नियोलिथिक साइट बनाता है।
दक्षिण एशिया का एक और पुराना नियोलिथिक साइट 7000 ई.पू. का मेहरगढ़ है। यह “पाकिस्तान के बलूचिस्तान के काची के मैदान में स्थिति है और यह दक्षिण एशिया में खेती (गेंहूं और जौ) और पशुपालन (मवेशी, भेड़ और बकरियां) की दृष्टि से सबसे आरंभिक साइटों में से एक है।
दक्षिण भारत में निलियोथिक का आरम्भ 3000 ई.पू. तक हुआ और यह लगभग 1400 ई.पू. तक कायम रहा जब मेगालिथिक संक्रमण काल का आरम्भ हुआ। कर्नाटक क्षेत्र में 2500 ई.पू. के बाद से शुरू होकर बाद में तमिलनाडु में फैलने वाले ऐशमाउन्ड्स दक्षिण भारतीय नियोलिथिक की एक विशेषता है।
पूर्व एशिया में सबसे आरंभिक साइटों में लगभग 7500 ई.पू. से 6100 ई.पू. तक की पेंगतौशन संस्कृति और लगभग 7000 ई.पू. से 5000 ई.पू. तक की पिलिगंग संस्कृति शामिल है।
‘नियोलिथिक’ (जिसे इस अनुच्छेद में परिष्कृत पत्थर के हथियारों के रूप में परिभाषित किया गया है) पश्चिम पापुआ (इण्डोनेशियाई न्यू गिनी) के छोटे और अत्यंत दूरवर्ती और अगम्य इलाकों की एक जीवन शैली के रूप में कायम है। परिष्कृत पत्थर की बसूलों और कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल आजकल (2008 के अनुसार सीई) उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां धातु के हथियारों की उपलब्धता सीमित है। अगले कुछ वर्षों में यह सब एक साथ समाप्त होने वाला है क्योंकि पुरानी पीढ़ी खत्म हो जाएगी और स्टील ब्लेडों और चेनसॉ का प्रचलन बढ़ जाएगा.

अमेरिका
मेसोअमेरिका में लगभग 4500 ई.पू. तक लेकिन शायद ज्यादा से ज्यादा 11,000-10,000 ई.पू. पहले इसी तरह की घटनाओं का एक समूह (अर्थात् फसलों की खेती और अनुद्योगशील जीवनशैलियां) दिखाई दिया हालांकि यहां नियोलिथिक के मध्य से अंतिम दौर के बजाय “प्री-क्लासिक” (या रचनात्मक) शब्द का इस्तेमाल किया गया है और आरंभिक नियोलिथिक के लिए पुरातन युग और पूर्ववर्ती काल के लिए पैलियो-भारतीय शब्द का इस्तेमाल किया जाता है हालांकि इन संस्कृतियों को आम तौर पर नियोलिथिक से संबंधित नहीं माना जाता है।

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