फ्रांसीसी क्रांति की प्रकृति की संपूर्ण जानकारी

फ्रांसीसी क्रांति की प्रकृति को क्रांति के आदर्शों, क्रांति के नेतृत्व, क्रांति की प्रगति, क्रांति के दौरान लाए गए परिवर्तनों और विश्व पर पड़े प्रभावों के प्रकाश में समझे जाने की जरूरत है। इस दृष्टि से क्रांति एक ऐसी क्रांति थी जिसका प्रारंभ तो कुलीन वर्ग ने किया, फिर आगे चलकर इसका नेतृत्व मध्यवर्ग के हाथों में आया। कुछ समय के लिए यह क्रांतिकारी तत्वों के प्रभाव में रही और अंत एक सैनिक तानाशाह के साथ हुआ। इस तरह फ्रांसीसी क्रांति उस विशाल नदी की तरह जो उच्च पर्वत शिखर से प्रारंभ होकर मार्ग में अनेक छोटे-मोटे पर्वतों को लांघती हुई कभी तीव्र गति से, तो मंद गति से प्रवाहमान रही।
क्रांति का मध्यवर्गीय स्वरूप
1789 में हुई फ्रांसीसी क्रांति को एक बुर्जुआ क्रांति के रूप में देखा जा सकाता है। क्रांति के प्रथम चरण में नेतृत्व तृतीय स्टेट के बुर्जुआई तत्वों के हाथों में था। मध्यवर्गीय नेतृत्व ने निजी संपत्ति को ध्यान में रखते हुए कुछ सिद्धान्त भी बनाएं। वस्तुतः सामंतवाद के अंत की घोषणा तो कर दी गई किन्तु सामंती अधिकारों को यूं ही नहीं छोड़ दिया गया, बल्कि भूमिपतियों की क्षतिपूर्ति करने के बाद ही किसान किसी उत्तरदायित्व से मुक्त हो सकते थे।
मानवाधिकारों की घोषणा में मध्यवर्गीय प्रभाव देखा जा सकता है। संपत्ति के अधिकार को मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों की श्रेणी में रखा गया जो बुर्जुआ हितों के संरक्षण से संबंधित है। इसी प्रकार वयस्क मताधिकार की बात तो की गई किन्तु संविधान में “नागरिक” शब्द का अत्यंत संकुचित अर्थों में प्रयोग किया गया। नागरिक को सक्रिय व निष्क्रिय नागरिकों में विभाजित किया गया। सक्रिय नागरिक वे थे जो अपनी कम से कम तीन दिन के आय की रकम प्रत्यक्ष कर के रूप में अदा करते थे और सिर्फ इन्हें ही मत देने का अधिकार था। प्रतिनिधि होने के लिए भी संपत्ति की योग्यता को आधार बनाया गया और यह धनी लोग ही राजनीतिक क्रियाकलापों में भाग ले सकते थे और इसका मतलब था कि धनी लोग मध्यवर्ग से जुड़े थे। इस तरह फ्रांसीसी क्रांति ने जन्म पर आधारित भेदभाव को नष्ट किया परन्तु उसके जगह प्राचीन सामंतवाद के बदले धन पर आधारित नए सामंतवाद का प्रभुत्व हुआ।
क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने निरंकुश सरकार द्वारा लिए गए ऋणों की बात तो की किन्तु उन ऋणों को माफ करने की बात किसी ने नहीं की। इसका कारण था यह ऋण सरकार को बुर्जुआ वर्ग ने दिया था। इसी प्रकार सरकार ने चर्च की संपत्ति को तो जब्त किया परन्तु उसे भूमिहीनों को नहीं बांटा गया। जमीनों को सर्वाधिक ऊंची कीमतों पर बेचा गया और इस जमीन को खरीदने की क्षमता मध्यवर्ग के पास थी।
फ्रांसीसी क्रांति ने मजदूरों के हितों को नजरंदाज किया और श्रमिक आंदोलन को हतोत्साहित किया। क्रांति के दौरान श्रमिक वर्ग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी किन्तु बुर्जुआ नेतृत्व को उसकी बढ़ती स्थिति मंजूर नहीं थी। अतः नेशनल असेम्बली ने निरंकुश राजतंत्र युग में निर्मित कानूनों को पुनः लागू कर दिया। जिसके तहत् सभी श्रमिक संघ संबंधी कार्यों पर प्रतिबंध लगा दिया गए और गिल्डों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
नेशनल एसेम्बली में बुर्जुआओं की प्रधानता थी और उसमें जिरोंदिस्त और जैकोबियन भी बुर्जुआ वर्ग से संबंधित थे। यद्यपि जैकोबियन सर्वहारा वर्ग के हित की बात करते थे परन्तु आतंक के राज्य की स्थापना में बुर्जुआ हितों को ही ऊपर रखा गया और श्रमिकों प्रतिक्रियाओं को दबाने हेतु सेना की सहायता ली गई।
डायरेक्टरी के शासन में भी मध्यवर्गीय हितों को प्रमुखता दी गई। संचालक मंडल ने जिस द्विसदनी विधायिका का निर्माण किया उसके सभी सदस्य मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी थे।
नेपोलियन के सुधारों पर भी बुर्जुआई प्रभाव देखा जा सकता है। उसने बुर्जुआ हितों को संरक्षित रखते हुए अपनी विधि संहिता में संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित रखा, कुलीनों को अपेक्षाकृत व्यापक अधिकार दिए तथा उसके व्यापारिक और वाणिज्यिक सुधारों का फायदा मध्यवर्ग को ही मिला। इस तरह क्रांति के स्वरूप में मध्यवर्गीय तत्व दिखाई देते हैं। किन्तु पूरे क्रांति और उसके प्रभाव के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि क्रांति में मध्यवर्गीय तत्वों के साथ कृषक, मजदूर, महिलाओं की सहमागिता थी। इस तरीके से यह मात्र मध्यवर्गीय क्रांति नहीं थी अपितु एक लोकप्रिय क्रांति के रूप में इसे देखा जा सकता है।
विश्वव्यापी स्वरूप
फ्रांसीसी क्रांति एक विश्वव्यापी चरित्र को लिए हुए थी। क्रांतिकारियों ने 1789 में मनुष्य तथा नागरिक अधिकारों की घोषणा की, जिसके तहत् कहा गया कि जन्म से समान पैदा होने के कारण सभी मनुष्यों को समान अधिकार मिलना चाहिए और यह सभी देशों के लिए सभी मनुष्यों के लिए, सभी समय के लिए और उदाहरण स्वरूप सारी दुनिया के लिए हैं। यह घोषणा सिर्प फ्रांस के लिए नहीं वरन् हर जगह के उन सभी लोगों की भलाई के लिए हैं जो स्वतंत्र होना चाहते थे तथा निरंकुश राजतंत्र एवं सामंती विशेषधिकारों के बोझ से मुक्ति पाना चाहते थे, बनाया गया था। नेशनल एसेम्बली द्वारा 1792 ई. में कॉमपेने नामक अंगे्रज नायक को फ्रांसीसी नागरिक की उपाधि दी गई और उसे नेशनल कन्वेंशन का प्रतिनिध भी चुना गया। इसी प्रकार क्रांति के दौरान यह विचार आया कि क्रांति को स्थायी और सुदृढ़ रखने के लिए इसे यूरोप के अन्य देशों में भी विस्तारित किया जाएं। इसमें एक ऐसे युद्ध की कल्पना की गई जिसमें फ्रांसीसी सेनाएं पड़ोसी देशों में प्रवेश कर वहां के स्थानीय क्रांतिकारियों से मिलकर राजतंत्र को अपदस्थ कर गणतंत्रों की स्थापना करती है।
फ्रांस की क्रांति मात्र एक राष्ट्रीय घटना नहीं थी अपितु सिद्धान्तों- स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के नारों से संपूर्ण यूरोप गूंज उठा। क्रांति के प्रभाव इतने दूरगामी रहे कि समस्त यूरोप इससे आच्छादित हुआ। इसी संदर्भ में कहा गया “यदि फ्रांस को जुकाम होता है तो समस्त यूरोप छींकता है।”

सामाजिक क्रांति’ के रूप में
फ्रांसीसी क्रांति के मूल में तत्कालीन फ्रांसीसी समाज की दुरावस्था भी एक महत्वपूर्ण कारक थी। पूरा समाज विशेषाधिकार प्राप्त और अधिकार विहीन वर्गों में विभक्त था। कृषकों की स्थिति करों के बोझ से खराब थी तो दूसरी तरफ उन्हें सामंतों के अत्याचार तथा चर्च के हस्तक्षेप से भी शोषण का शिकार होना पड़ता था। इन स्थितियों ने क्रांति को राह दिखाई और क्रांतिकारियों ने इसी असमानता के विरूद्ध आवाज बुलंद की और स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व का नारा दिया। क्रांति के दौरान ही सामंतवाद के अंत की घोषणा हुई, विशेषाधिकारों को खत्म किया गया।
अधिनायकवादी स्वरूप
फ्रांसीसी क्रांति में सर्वसाधारण की भागेदारी रहीं थी किन्तु उनके हितों को नजरंदाज करके क्रांति ने अधिनायकवाद का रूप धारण कर लिया जिसमें किसी एक व्यक्ति के सिद्धान्तों और इच्छाओं की प्रधानता थी। वस्तुतः क्रांति के दौरान रॉबस्पियर के नेतृत्व में एक तानाशाही सरकार या अधिनायकतंत्र की स्थापना हुई थी और आगे चलकर नेपालियन ने भी अधिनायकतंत्र की स्थापना की।
प्रगतिशील क्रांति के रूप में
फ्रांस की क्रांति वहां की पुरातन व्यवस्था में व्याप्त तमाम विकृतियों, विसंगतियों एवं बुनियादी दोषों के विरूद्ध एक सशक्त प्रतिक्रिया थी। क्रांति ने निरंकुश राजतंत्र असमानता पर आधारित फ्रांसीसी समाज, विलासितापूर्ण पादरी वर्ग तथा आर्थिक दिवालियेपन के संकट से जूझ रहे कुशासन का अंत कर फ्रांस में प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली का मार्ग प्रशस्त किया। इस दृष्टि से इसे दृष्टि से इसे प्रगतिशील क्रांति के रूप में देखा जा सकता है
इतना ही नहीं मानवधिकारों की घोषणा स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के नारे तथा राष्ट्रीयता की विचारधारा से समस्त विश्व के नारे तथा राष्ट्रीयता की विचारधारा से समस्त विश्व को अवगत कराया परिणामस्वरूप विश्व के कई देशों में राजनीतिक अधिकारों की मांग को लेकर जनांदोलन होने लगे। इटली एवं जर्मनी के एकीकरण की भावना को प्रोत्साहन मिला। धर्म और राजनीति के पृथक्करण का मुद्दा पहली बार इस क्रांति के दौरान उठा। राज्य और राजनीति धर्म से अलग किए गए।

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