ब्रिटिश राजतंत्र का संवैधानिक पद, कार्य व शक्तियाँ

ब्रिटिश एकराट्तंत्र अथवा ब्रिटिश राजतंत्र(अंग्रेज़ी: British Monarchy, ब्रिटिश मोनार्की, ब्रिटिश उच्चारण:ब्रिठिश मॉंनाऱ्क़़ी), वृहत् ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड की यूनाइटेड किंगडम की संवैधानिक राजतंत्र है। ब्रिटिश एकाधिदारुक को यूनाइटेड किंगडम समेत कुल 15 राष्ट्रमण्डल प्रदेशों, मुकुटिया निर्भर्ताओं और समुद्रपार प्रदेशों के राजमुकुटों सत्ताधारक एकराजीय संप्रभु होने का गौरव प्राप्त है। वर्तमान सत्ता-विद्यमान शासक, 6 फरवरी वर्ष 1952 से महारानी एलिजाबेथ द्वितीय हैं जब उन्होंने अपने पिता जॉर्ज षष्ठम् से राजगद्दी उत्तराधिकृत की थी।
संप्रभु और उसके तत्काल परिवार के सदस्य देश के विभिन्न आधिकारिक, औपचारिक और प्रतिनिधि कार्यों का निर्वाह करते हैं। सत्ताधारी रानी/राजा पर सैद्धांतिक रूप से एक संवैधानिक शासक के अधिकार निहित है, परंतु सदियों पुराने आम कानून के कारण संप्रभु अपने अधिकतर शक्तियों का अभ्यास केवल संसद और सरकार के विनिर्देशों के अनुसार ही कार्यान्वित करने के लिए बाध्य हैं। इस कारण से, इसे वास्तविक तौर पर एक संसदीय सम्राज्ञता मानी जाता है। संसदीय शासक होने के नाते, शासक के अधिकतर अधिकार, निष्पक्ष तथा गैर-राजनैतिक कार्यों तक सीमित हैं। सम्राट, शासक और राष्ट्रप्रमुख होने के नाते उनके अधिकतर संवैधानिक शासन तथा राजनैतिक-शक्तियों का अभ्यय वे सरकार और अपने मंत्रियों की सलाह और विनिर्देशों पर ही करते हैं। परंपरानुसार शासक, ब्रिटेन के सशस्त्र बल के अधिपति होते हैं। हालाँकि, संप्रभु के समस्त कार्य-अधिकारों का अभ्यय शासक के राज-परमाधिकार द्वारा होता है।
वर्ष 1000 के आसपास, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के राज्यों में कई छोटे प्रारंभिक मध्ययुगीन राज्य विकसित हुए थे। इस क्षेत्र में आंग्ल-सैक्सन लोगों का वर्चस्व इंग्लैंड पर नॉर्मन विजय के दौरान 1066 में समाप्त हो गया, जब अंतिम आंग्ल-सैक्सन राजा हैरल्ड द्वितीय की मृतु हो गयी थी और अंग्रेज़ी सत्ता विजई सेना के नेता, विलियम द कॉङ्करर और उनके वंशजों के हाथों में चली गयी।
13वीं सदी में इंग्लैंड ने वेल्स की रियासत को अवशोषित किया तथा मैग्ना कार्टा द्वारा संप्रभु के क्रमिक निःशक्तकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। 1603 में स्कॉटलैंड के राजा जेम्स चतुर्थ, अंग्रेजी सिंहासन पर जेम्स प्रथम के नाम से विराजमान होकर जो दोनों राज्यों को एक व्यक्तिगत संघ की स्थिति में ला खड़ा किया। 1649 से 1660 के लिए अंग्रेज़ी राष्ट्रमंडल के नाम से एक क्षणिक गणतांत्रिक काल चला, जो तीन राज्यों के युद्ध के बाद अस्तिव में आया, परंतु 1660 के बाद राजशाही को पुनर्स्थापित कर दिया गया। 1707 में परवर्तित एक्ट ऑफ़ सेटलमेंट, 1701, जो आज भी परवर्तित है, कॅथॉलिक व्यक्तियों तथा कैथोलिक व्यक्ति संग विवाहित व्यक्तियों को अंग्रज़ी राजसत्ता पर काबिज़ होने से निष्कर्षित करता है। 1707 में अंग्रेज़ी और स्कॉटियाई राजशाहियों के विलय से ग्रेट ब्रिटेन राजशही की साथपना हुई और इसी के साथ अंग्रज़ी और स्कोटिश मुकुटों का भी विलय हो गया और संयुक्त “ब्रिटिश एकराट्तंत्र” स्थापित हुई। आयरिश राजशही ने 1801 में ग्रेट ब्रिटेन राजशाही के साथ जुड़ कर ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की यूनाइटेड किंगडम की स्थापना की।
ब्रिटिश एकराट्, विशाल ब्रिटिश साम्राज्य के नाममात्र प्रमुख थे, जो 1921 में अपने वृहत्तम् विस्तार के समय विष के चौथाई भू-भाग पर राज करता था। 1922 में आयरलैंड का पाँच-छ्याई हिस्सा आयरिश मुक्त राज्य के नाम से, संघ से बहार निकल गया। बॅल्फोर घोषणा, 1926 ने ब्रिटिश डोमिनिओनों के औपनिवेशिक पद से राष्ट्रमंडल के भीतर ही विभक्त, स्वशासित, सार्वभौमिक देशों के रूप में परिवर्तन को मान्य करार दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य सिमटता गया, और ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकतर पूर्व उपनिवेश व प्रदेश स्वतंत्र हो गए।
जो पूर्व उपनिवेश, ब्रिटिश शासक को अपना शासक मानते है, उन देशों को ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल प्रमंडल या राष्ट्रमण्डल प्रदेश कहा जाता है। इन अनेक राष्ट्रों के चिन्हात्मक समानांतर प्रमुख होने के नाते, ब्रिटिश एकराट् स्वयं को राष्ट्रमण्डल के प्रमुख के ख़िताब से भी नवाज़ते हैं। हालांकि की शासक को ब्रिटिश शासक के नाम से ही संबोधित किया जाता है, परंतु सैद्धान्तिक तौर पर सारे राष्ट्रों का संप्रभु पर सामान अधिकार है, तथा राष्ट्रमण्डल के तमाम देश एक-दुसरे से पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त हैं।

संवैधानिक पद, कार्य व शक्तियाँ

ब्रिटेन की राजतांत्रिक व्यवस्था में, राजा/रानी(संप्रभु) को राष्ट्रप्रमुख का दर्ज दिया गया है। ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था, जोकि हज़ारों वर्षों की कालावधि पर क्रमिक रूप से विकसित व परिवर्तित होती रही है, में, शासक के पारंपरिक व वास्तविक शक्तियाँ घटती-बढ़ती रही है। ब्रिटिश राजनैतिक संकल्पना में, ब्रिटेन के संप्रभु को राजमुकुट के मानवी अवतार के रूप में माना जाता है, अर्थात वे सम्पूर्ण राज्य व पूरी शसंप्रणाली के समस्त शासनाधिकार के अंत्यंत स्रोत हैं, और ब्रिटेन पर शासन करने का अधिकार अंत्यतः ब्रिटिश संप्रभु के पास ही है। अतः, न्यायाधीश, सांसदों तथा तमाम मंत्रियों समेत, सारे सरकारी अफ़सरों और कर्मचारियों एक आधिकारिक नियोक्ता व कार्याधिकार के के प्रदाता भी संप्रभु ही हैं। तथा निष्ठा की शपथ महारानी(अथवा महाराज) के प्रति ली जाती है। तथा सरे संसदीय अधिनियमों को वैधिक होने के लिए शाही स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है। तथा यूनाइटेड किंगडम का राष्ट्रगान गॉड सेव द क्वीन(हे ईश्वर, हमारी रानी को रक्षा करो) है। इसके अलावा सभी डाक टिकटों, सिक्कों व मुद्रा-नोटों पर शासक की छवि को अंकित किया जाता है।
बहरहाल, शासन-प्रक्रिया, नीति-निर्धारण व प्रशासनिक निर्णय लेने में, अधिराट् का वास्तविक योगदान न्यूनतम तथा नाममात्र का छूट है, क्योंकि विभिन्न ऐतिहासिक संविधियों और रूढ़ियों के कारण शासक के अधिकतर अधिराटिय शक्तियाँ अधिराट् से मुकुट के मंत्रियों और अधिकारियों या अन्य संस्थानों के पास प्रत्यायोजित कर दी गयी हैं। अतः शासकों द्वारा राजमुकुट के नाम पर किये गए अधिकतर कार्य, चाहे शासक द्वारा स्वयं ही किये गए कार्य हो, जैसे की महारानी का अभिभाषण या संसद का राजकीय उद्घाटन, सरे कार्यो के निर्णय कहीं और लिए जाते हैं:
विधायिक कार्य महारानी ससंसाद द्वारा, संसद, हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ़ कॉमन्स की सलाह और स्वीकृति द्वारा किया जाता है, वहीँ, कार्यकारी शक्तिया महारानी के नाम पर उनकी महिमा की सरकार द्वारा अभ्ययित किये जाते हैं। जिसमे, प्रधानमंत्री और मुकुट के अन्य मंत्री तथा मंत्रिमण्डल द्वारा अभ्ययित किये जाते हैं, जो असल में, महारानी की शाही परिषद् की एक समिति है। तथा शासक की न्याय करने और दंड देने की शक्तियाँ न्यायपालिका पर निहित की गयीं हैं, जो संवैधानिक तौर पर, सर्कार से स्वतंत्र है। वहीँ चर्च ऑफ़ इंग्लैंड, जिसकी प्रमुख रानी है, की अपनी स्वयं की प्रशासनिक व्यवस्था है। इसके अलावा भी शासक के अन्य कार्यों को विभिन्न समितियों व निकायों को सौंपे गए हैं।
संवैधानिक भूमिका
प्रधानमंत्री की नियुक्ति

जब आवश्यक हो, तब, अधिराट् का दायित्व है की वे अपनी सरकार का नेतृत्व करने के लिए एक प्रधानमंत्री की नियुक्ति करें(जो परंपरानुसार मुकुट के अन्य मंत्रियों की नियोक्ति तथा निष्काशन के लिये जिम्मेदार होते हैं)। अलिखित संविधान की ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार आम तौर पर प्रधान मंत्री हाउस ऑफ़ कॉमन्स में बहुमत प्राप्त दल के नेट होते हैं। प्रधानमंत्री अपना कार्यभार, शासक के साथ एक व्यक्तिगत मुलाक़ात के बाद करते है, जिसमे “हाँथ चूमने” की एक परंपरा होते ही नियुक्ति तुरंत ही, बिना और किसी औपचारिकता के, पारित हो जाती है।
त्रिशंकु सभा की स्थिति में, अधिराट् के पार अपने विवेक के उपयोग कर, अपने इच्छानुसार सरकार के प्रतिनिधि का चुनाव करने के अधिक अवसर होता है, हालाँकि ऐसे स्थिति में भी रीतिनुसार सदन के सबसे बड़े दल के नेता को ही चुना जाता है। 1945 से आज तक, केवल दो बार ऐसे स्थिति आई थी। पहली बार फऱवरी 1974 के आम चुनाव के बाद, और 2010 के आम चुनाव के बाद, जब कंज़र्वेटिव पार्टी और लिबरल-डेमोक्रेटिक पार्टी ने गठबंधन बनाया था।
संसद भंग करना
पारंपरिक तौर पर, संसद के सत्र को बुलाने व भंग करने का अधिकार शासक के विवेक पर था, और शासक स्वेच्छा से सभा बुलाया व भंग किया करते थे। अतः धरणात्मक रूप से आज भी संसद बुलाने व भंग करने के अधिकार का अभ्यय शासक ही करते हैं। 2011 में पारित फिक्स्ड-टर्म परलियामेंट्स एक्ट ने संसद भंग करने के अशिकार को ख़त्म कर दिया। हालाँकि सत्रंतन करने का अधिकार शासक के पास अभी भी है। यदि एक अल्पसंख्यक सरकार, संसद को भंग कर नए चुनाव घोषित करने की मांग करती है, तो शासक ऐसी मांग को ख़ारिज करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। धारणात्मत रूप से शासक स्वेच्छा से प्रधानमंत्री को कभी भी पदोच्यित कर सकते हैं, परंतु वर्त्तमान स्थिति में प्रधानमन्त्री को स्तीफा, मृत्यु या चुनावी हार की स्थिति में ही पद से निष्काषित किया जाता है। प्रधानमंत्री को कार्यकाल के बीच निष्काषित करने वाले अंतिम शासक विलियम चतुर्थ थे, जिन्होंने 1834 में लॉर्ड मेलबॉर्न को निकाला था।
राज-परमाधिकार
धार्मिक भूमिका

संप्रभु, स्थापित चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के सर्वोच्च प्रशासक हैं। चर्च के सारे बिशप व आर्चबिशपों की नियुक्ति शासक द्वारा, प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है। प्रधानमंत्री, चर्च आयोग द्वारा तैयार किये गए प्रत्याशियों की एक सूची में से नियुक्ता को चुनते हैं। अंग्रेज़ी गिर्जा में राजमुकुट की भूमिका नाममात्र की है। चर्च के वरिष्ठताम् पादरी, कैंटरबरी के आर्चबिशप, इस चर्च तथा विश्व भर के आंग्लिकाई कलीसिया के आध्यात्मिक नेता के रूप में देखे जाते हैं। तथा अधिराट्, चर्च ऑफ़ स्कॉटलैंड के संरक्षण की शपथ भी लेते हैं, तथा चर्च की महासभा के प्रभु उच्चायुक्त को नियुक्त करने का भी दायित्व रखते हैं, अन्यथा, गिर्जा के कार्यों में उनकी कोई सार्थक भूमिका नहीं है, नाही वे इसपर कोई अधिकार रखते हैं। विस्थापित चर्च ऑफ़ वेल्स तथा चर्च ऑफ़ आयरलैंड में संप्रभु का कोई औपचारिक भूमिका नहीं है।’

ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में भूमिका
18 वीं और 19वीं सदी के दौरान ब्रिटेन के औपनिवेशिक विस्तार द्वारा, ब्रिटेन ने विश्व के अन्य अनेक भू-भागों वे क्षेत्रों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। जिनमें से अधिकतर देशों ने मध्य 20वीं सदी तक ब्रिटेन से स्वतंत्रता हासिल कर ली। हालाँकि उन सभी देशों ने यूनाइटेड किंगडम की सरकार की अधिपत्यता को नकार दिया, परंतु उनमें से कई राष्ट्र, ब्रिटिश शासक को अपने अधिराट् के रूप में मान्यता देते हैं। ऐसे देहों राष्ट्रमण्डल प्रदेश या राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमि कहा जाता है। वर्त्तमान काल में, यूनाइटेड किंगडम के अधिराट् केवल यूनाइटेड किंगडम के ही नहीं बल्कि उसके अतिरिक्त कुल 15 अन्य राष्ट्रों के अधिराट् भी हैं। हालांकि इन राष्ट्रों में भी उन्हें लगभग सामान पद व अधिकार प्राप्त है जैसा की ब्रिटेन में, परंतु उन देशों में, उनका कोई वास्तविक राजनीतिक या पारंपरिक कर्त्तव्य नहीं है, शासक के लगभग सारे कर्त्तव्य उनके प्रतनिधि के रूप में उस देश के महाराज्यपाल(गवर्नर-जनरल) पूरा करते हैं। ब्रिटेन की सरकार का राष्ट्रमण्डल प्रदेशों की सरकारों के कार्य में कोई भी भूमिका या हस्तक्षेप नहीं है। ब्रिटेन के अलावा राष्ट्रमण्डल आयाम में: एंटीगुआ और बारबुडा, ऑस्ट्रेलिया, बहामा, बारबाडोस, बेलिज, ग्रेनेडा, जमैका, कनाडा, न्यूजीलैंड, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप, सेंट लूसिया, सेंट किट्स और नेविस, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस और तुवालु जैसे देश शामिल हैं।
पूर्वतः राष्ट्रों के राष्ट्रमण्डल के सारे देश राष्ट्रमण्डल परिभूमि के हिस्सा हुआ करते थे, परंतु 1950 में भारत ने स्वतंत्रता के पश्चात स्वयं को गणराज्य घोषित किया, और ब्रिटिश राजसत्ता की राष्ट्रप्रमुख के रूप में संप्रभुता को भी खत्म कर दिया। परंतु भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता बरक़रार राखी। उसके बाद से, राष्ट्रमण्डल देशों में, ब्रिटिश संप्रभु को (चाहे राष्ट्रप्रमुख हों या नहीं) “राष्ट्रमण्डल के प्रमुख” का पद भी दिया जाता है, जो राष्ट्रमण्डल के संगठन का नाममात्र प्रमुख का पद है। इस पद का कोई राजनैतिक अर्थ नहीं है।

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