कम लागत में अधिक मुनाफे के लिए करें सही समय पर मटर की खेती, विस्तृत विधि

मटर एक फूल धारण करने वाला द्विबीजपत्री पौधा है। इसकी जड़ में गांठे मिलती हैं। इसकी संयुक्त पत्ती के अगल कुछ पत्रक प्रतान में बदल जाते हैं। यह शाकीय पौधा है जिसका तना खोखला होता है। इसकी पत्ती सेयुक्त होती है। इसके फूल पूर्ण एवं तितली के आकार के होते हैं। इसकी फली लम्बी, चपटी एवं अनेक बीजों वाली होती है। मटर के एक बीज का वजन ०.१ से ०.३६ ग्राम होता है। इसका केंद्र दक्षिण एशिया है| उत्पादन मध्यम ताप पर किया जाता है। यह 1 वर्षीय पादप होता है।

पहले के समय में हरी मटर को केवल सीजन आने पर ही खाया जाता था लेकिन अब बढ़ती टेक्नोलॉजी के चलते हरी मटर के दानो को निकाल कर उन्हें वैक्यूम कर फ्रोज़न कर दिया जाता है जिससे की हरी मटर पूरे साल भर मिल सकती है, और इसके अलावा हरी मटर के दानो को सूखा कर भी इसे उपयोग किया जाता है, सुखाने के बाद खड़ी मटर को दो हिस्सों में तोड़ दिया जाता है और उसे मटर की दाल का रूप दे दिया जाता है।
भारत में सर्दियों के मौसम में उगायी जाने वाली फसलों में मटर का महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें न केवल प्रोटीन तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं वरन इसमें विटामिन, फ़ॉस्फ़रस तथा लौह तत्व भी काफ़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं। देश भर में इसकी खेती व्यापारिक स्तर पर की जाती है। उत्तर भारत की पहाड़ियों में मटर की ग्रीष्म और पतझड़ ऋतु की फसलें भी उगायी जाती हैं और इन मौसमों में उगायी गई मटर का कुछ भाग अप्रैल से नवम्बर के महीनों में मैदानी इलकों में भी उपलब्ध रहता है।

जलवायु और मिट्टी

मटर को हल्की बलुई दोमट से लेकर मटियार दोमट तक की विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है। हालांकि मटर के लिए उपयुक्त भूमि अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी होती है। किन्तु क्षारीय मिट्टी में इसकी पैदावार अच्छी नहीं होती है। मटर के लिए सबसे उपयुक्त पी. एच. मान 6.0 से 7.5 होती है।

मटर के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है और ग्रीष्म ऋतु के दौरान भारी गर्मी पड़ने पर इसकी फ़सल अच्छी नहीं होती है। यह मौसम झुर्रीदार बीज वाली क़िस्मों के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है। जब फ़सल पर्याप्त ठंडी जलवायु में पकती है तब हरी फलियाँ की पैदावार अधिक होती है। इसके फूल और फलियां पाले से अधिक प्रभावित होती है। हालांकि पाले का प्रभाव पौधों की पत्तियों और तनों पर भी हो सकता है, बीज अंकुरण के लिय तापमान 5 डिग्री सेल्सियम न्यूनतम, 22 डिग्री सेल्सियम अधिकतम होना अच्छा रहता है।

क़िस्में

आर्केल : यह झुर्रीदार बीज वाली क़िस्म है। पौधे बौने, हरे रंग के मजबूत और उंचाई में 35-45 से०मी० होते हैं। फूल सफेद व फलियों आकर्षक गहरे रंग की व 8 सें. मी. लंबी होती है। इनमें 7-8 गहरे रंग के मीठे दाने भरे होते हैं। बीज जब पूरी तरह पक जाते हैं तो हल्के हरे रंग के और झरियां होते हैं। बुआई के 55 से 60 दिन के बाद फलियों की पहली तुड़ाई होती है। हरी फलियों की पैदावार प्रति हेक्टेअर 100 से 130 कुन्टल. है और बीज की पैदावार 15 कुन्टल प्रति हेक्टेअर है।

मध्य मौसमी क़िस्म बोनविले :

मध्यम लंबाई वाली , दोहरी फलियों युक्त, झर्रीदार बीज वाली क़िस्म है। 55 से 60 दिनों में फल आते हैं। फलियां हल्के हरे रंग की , सीधी और लगभग 9 सें. मी. लबी होती है। दाने मीठे और गहरे हरे रंग के होते हैं। बुआई के 85-90 दिनों के अदंर मटर की फ़सल तैयार हो जाती है। फलियों की उपज 100 से 120 कुन्टल प्रति है. और बीज 12 से 15 कुन्टल प्रति हेक्टेअर बैठती है।

लिंकन : पौधे बौने, मजबूत और पत्तियाँ गहरे हरे रंग की होती है। फलियां गहरे हरे रंग की लंबी और सिरे पर हल्की सी मुडी हुई होती हैं जिनमें अच्छे दाने होते हैं। फलियों में 8 से 10 दाने होते हैं और ये मीठे होते हैं। पहाडी इलाकों में बोने के लिए क़िस्म अधिक उपयुक्त है। पहली तुडाई बुआई के 85- 90 दिनों के बाद की जा सकती है।

बीज की मात्रा व बुआई

बीजदर

पछेती क़िस्मों के लिए 70-75 कि०ग्रा० और अगेती क़िस्मों के लिए 100 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर किन्तु आर्केल जैसी क़िस्मों के लिए 125 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर बीज की आवश्यकता होती है।

दूरी

अगेती क़िस्मों में कतार की दूरी 30 सें०मी० और मध्य मौसमी और पछेती क़िस्मों के लिए 45 सें०मी० दूरी रखी जाती है।

बुआई

अगेती क़िस्में , जैसे आर्केल मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक बोई जा सकती है। मध्य मौसमी क़िस्में, जैसे बोनविले और लिंकन अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के मध्य तक बोई जा सकती है। पछेती क़िस्म नवम्बर के अंत तक बोई जा सकती है ।

उर्वरकों का प्रयोग

फलियों के शीघ्र विकास एवं बढ़वार के लिए नाइट्रोजन उर्वरक की कुछ मात्रा फायदेमंद रहती है। फ़ॉस्फ़ेट के प्रयोग से मटर की गुणवत्ता एवं पैदावार दोनों में लाभ होता है। उसी प्रकार पौटेशियम खादों के उपयोग से पैदावार पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। खेती की तैयारी करते समय गोबर की खाद 20 टन प्रति हेक्टेअर और किसान खाद, सी. ए. एन. 125 किलो प्रति हेक्टेअर अथवा उत्तम वीर यूरिया 60 से 65 किलो प्रति हेक्टेअर डालें। इसके साथ-साथ 420 किलो सुपर फ़ॉस्फ़ेट, व 100 किलो म्युरेट आफॅ पोटाश प्रति हेक्टेअर की दर से दे।

सिंचाई

उचित जमाव के लिए पलेवा की सलाह दी जाती है। इसके पश्चात शुष्क मौसम में 10 से 15 दिनों के अतंराल पर हल्की सिंचाई भी करनी चाहिए। फूल एवं फलियों की शुरूआत के समय एक या दो सिंचाई करना आवश्क है। विकसित होते हुए फलों एवं फलियों की पाले से रक्षा करने के लिए पाले मौसम में पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है।

खरपतवारों की रोकथाम

अधिकतर बगीचे वाली मटर कतारों में बोई जाती है, अतः यंत्रों की सहायता से खरपतवारों को काबू करना कठिन हो जाता है। अधिकाशं सदाबहार खरपतवारों की रोकथाम के लिए रसायनों का उपयोग किया जाता है। फ़सल की बुआई से पहले और बाद में पौधे उगने से पहले 900 लीटर पानी में 1.5 किलो प्रति हेक्टेअर की दर से लिन्यूरान छिड़कने से सभी सदाबाहर घासों एवं खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है। इस उपचार के बाद 3 से 4 सप्ताह तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए। एम. सी. इ. ; टोपोटाक्स अथवा 2-4 डी., एम्युटॉक्स 0.84 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर का छिड़काव करने से सदाबार चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर काबू पाया जा सकता है। छिड़काव धूप वाले दिन ही जब हवा न चल रही हो, किया जाना चाहिए। इस उपचार के 10-12 दिनों बाद तक फ़सल की सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

पौध संरक्षण

मटर की फ़सल को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़े हैं-मटर का पत्ती बेधक, माहू कुतरने वाले कीड़े, कट वमर्सद्ध तथा मटर का फली बेधक।

मटर की पत्ती का बेधक

मटर की पत्तियों पर इसके लार्वा का आक्रमण होने से पत्तियों पर सफेद रंग की टेढी-मेढी नालियाँ बन जाती है और पौधों की बढ़ौत्तरी रुक जाती है।

रोकथाम

0.05 प्रतिशत मिथाइल पाराथोन   का छिड़काव करने से इस कीट की रोकथाम की जा सकती है। यदि इसका प्रकोप दुबारा दिखाई पडे तो इस उपचार को 15-20 दिन बाद दोहराना चाहिए।

माहू

यह कीडा पत्तियों तथा रसदार स्थानों मे रस चूसता है। इसके बदले में ये चिपचिपे तरल पदार्थ का भारी मात्रा में श्राव करते हैं जिससे काली फफूंदी आकर्षित होती है। इसके कारण प्रकाश संश्लेषण क्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है। माहू का आग्रमण जनवरी के बाद होता है।

रोकथाम

माहू का प्रकोप होन पर ही 0.05 प्रतिशत मैटासिक्टाक्स  का घोल छिड़कें। 15-20 दिनों के बाद यदि आवश्यक हो तो दोबारा छिड़काव करें।

कुतरने वाले , कट वमर्सद्ध

ये सूडियाँ मिट्टी की सतह पर पौधों को काट देती है। बुआई से पहले मिट्टी में प्रति हेक्टेअर 25 किलो 5 प्रतिशत वाले फैनवैलेरेट का छिड़काव करके इस कीड़े की रोकथाम की जा सकती है।

मटर का फली बेधक

झल्लियाँ फलियों में छेद करके घुस जाती हैं तथा इसके बीजों,दानों को नष्ट कर देते हैं। फलियों पर छोटे-छोटे छिद्रों से इसके होने का पता लग जाता है |

रोकथाम

फ़सल पर 0.25 प्रतिशत कार्बारिल का छिड़काव करके इस बेधक की रोकथाम की जा सकती है। इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि फलियाँ इस छिड़काव से पहले तोडी जाएँ अथवा छिड़काव के 10 दिन में बाद ही तोड़ी जाएँ।

बीमारियाँ

चूर्णित आसिता,पाउडरी मिल्डयू :

 पत्तियाँ, तने शाखाएँ तथा फलियाँ बुकनी जैसे पदार्थ से ढक जाती हैं। इसका भीषण असर उस मौसम में होता है, जबकि दिन और रात के तापमान काफ़ी अतंर है भारी ओस गिरती है। यह बीमारी पछेती पकने वाली क़िस्मों को अधिक प्रभावित करती है।

रोकथाम का उपाय

जैसे ही यह बीमारी दिखाई पड़े फ़सल पर प्रति हेक्टेअर 0.3 प्रतिशत वाले 3 ग्राम गंधक के फफूंदी नाशक को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें और हर सात दिन बाद यह छिड़काव दोहराएँ। दूसरे फफूंदीनाशक जैसे कैराथेन, बाविस्टिन का छिड़काव भी प्रति लीटर पानी में 1 ग्राम की दर से किया जा सकता है।
झुलसा, (विल्ट) : यह बीमारी केवल जड़ों पर आक्रमण करती है, जो इसके प्रभाव से काली पड़ जाती हैं। इसके कारण पौधा तुरंत झुलस जाता है और मर जाता है। अगेती क़िस्म इससे ज्यादा प्रभावित होती है।

रोकथाम का उपाय

फ़सल को अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में या नवम्बर में बोए, क्योंकि इस समय बोई गई फ़सल साधारणतया झुलसे के आक्रमण से बच जाती है। सितम्बर या अक्टूबर के शुरू में बोई गई फ़सल को इस बीमारी से सबसे अधिक पहुँचता है।

उतराई

सब्जी के उद्देश्य से फलियों के उपयोग के अनुसार ही मटर को उतारा जाता है। जब फलियों का रंग गहरे से हल्के रंग में बदल रहा हो तथा वे अच्छी प्रकार भर गई हो तथा सख्त न हो, तभी उन्हें तोडिए। फलियाँ तोड़ने के दौरान पौधे को सावधानी से पकडिये ताकि इसमें और फलियाँ लग सकें। यदि फलियाँ तोड़ते समय बेलें टूट गई तो शेष फलियाँ समुचित रूप से विकसित नहीं होंगी |

पैदावार

साधारणत: अगेती क़िस्में प्रति हेक्टेअर 80 से 100 क्विंटल हरी फलियाँ देती हैं। मध्य मौसमी तथा पछेती क़िस्म 100 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टेअर से अधिक की पैदावार देती हैं।
स्रोत-uttamkrishi.com

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