राजनयिक इतिहास भाग – 3

राजनयिक आचार का इटालियन तरीका

इटली को आधुनिक संगठित एवं व्यावसायिक राजनय का जनक माना जाता है। मान्यता है कि प्रथम दूतावास की स्थापना मिलान के ड्यूक फ्रांसेस्को स्फोरजा ने 1455 में जेनेवा में की थी। 1496 में वेनिस सरकार ने दो व्यापारियों का उपराजदूत बनाकर लन्दन भेजा। कुछ समयोपरान्त इटली के अन्य राज्यों ने भी लन्दन, पेरिस तथा अन्य यूरोपीय राजधानियों में अपने दूतावास स्थापित किये। 16 वीं शताब्दी के अन्त तक स्थायी दूतावास अथवा प्रणिध्यावास नियुक्त करने की परम्परा को अधिकांश यूरोपीय राज्यों ने भी अपना लिया। मध्य युग के अन्त तक इटली में वेनिस तथा फ्लोरेंस जैसे नगर बसा लिये गये थे। अब गैरधार्मिक मामलों में पोप की सर्वोच्चता नहीं रही थी। सामन्तवादी ठिकानों तथा स्वतन्त्र नगरों ने आपस में मिलकर बड़े नगरों की रचना की। इन नगरों को महत्वाकांक्षी पडोसियों तथा प्राचीन शाही परिवारों ने हमेशा सजग रहना पड़ता था। ये अपनी विलुप्त शक्ति को पुनः प्राप्त करने क लिए कोई भी तरीका अपना सकते थे। फ्रांस, स्पेन तथा जर्मनी आदि बाहरी शक्तियों के आपसी मनमुटाव ने इटली को युद्ध भूमि बना दिया। यहां शक्तिशाली एवं कमजोर राज्यों के बीच निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। इन परिस्थितियों में राजनय का महत्व बढ़ गया। कमजोर राज्य अपनी स्वतन्त्रता एवं आत्म रक्षा के लिए राजनयिक तरीकों से शक्तिशाली राज्य से मैत्री सम्बन्ध जोड़ लेते थे।

वेनिस का राजनय
मध्ययुग में राजनयिक कला में सर्वाधिक प्रवीण राज्य वेनिस गणराज्य था। 16वीं शताब्दी में उसके राजदूत वियना, पेरिस, मेड्रिड तथा रोम में कार्य कर रहे थे। वेनिस वालों का पूर्व के साथ दीर्घकालीन घनिष्ठ सम्बन्ध रहा था। अब उन पर बाइजेन्टाइन की राजनीतिक विचारधारा का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। दोहराव तथा संद हे के दोष यहां के राजदूत में भी परिलक्षित होते हैं। यहां राजदूतों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर सावधानी से किया जाता था। राजनय का संगठित व्यवहार सर्वप्रथम यहीं पर अपनाया गया। यहां के राजदूतों को सर्वाधिक व्यवहारकुशल एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति से सूचित माना जाता था। वेनिस के राजनीतिक व्यवहार की निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं :-
(1) राज्यभिलेखागारों को व्यवस्थित रूप में रखने के श्रीगणेश करने का श्रेय वेनिसवासियों को दिया जाता है। उनके नौ शताब्दियों (883 से 1797 तक) के राजनयिक अभिलेख उपलब्ध होते हैं। इन अभिलेखों में राजदूतों को दिये गये निर्देश, राजदूतों के अन्तिम प्रतिवेदन, समाचार-पत्र आदि शामिल हैं। वेनिसवासी यह जानते थे कि विदेश में रहने के कारण राजदूत अपने देश की गतिविधियों से अपरिचित हो जाता है। अतः उसे सामयिक सूचना भेजी जानी चाहिये। इन समाचार-पत्रों को अविसी (avvisi) कहा जाता था।
(2) वेनिस वालों ने राजदूतों की नियुक्ति एवं आचरण के समबन्ध में कुछ नियमों की रचना की थी। वेनिस का राजदूत केवल तीन या चार महीनों के लिए नियुक्त किया जाता था। 15वीं शताब्दी में इसके कार्यकाल की सम्भावित सीमा 2 वर्ष कर दी गई। राजदूत जिस देश को भेजा जाता था वहां पर कोई सम्पत्ति नहीं रख सकता था। यदि यहां उसे कोई भेंट या तोहफा प्राप्त हो तो स्वदेश लौटने पर वह उसे राज्य को सौंप देता था। कार्यकाल में उसे कोई अवकाश नहीं दिया जाता था। लौटने पर 15 दिन के भीतर वह अपने कार्यों का अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था।
(3) राजदूत अपने साथ पत्नी नहीं ले जाता था क्योंकि यह आशंका थी कि गप्पे मारने में समय खराब करके उसके कार्यों में बाधक बन जायेगी। राजदूत के साथ स्वयं का रसोइया होता था ताकि विदेशी रसोइये से जहर खाने का जोखिम न उठाना पड़े।
(4) वेनिसवासियों की यह धारणा थी कि सभी विदेशी तथा विशेष रूप से विदेशी राजदूत जासूसी करने के लिये आते हैं। अतः उनके व्यवहार को नियमित करने के लिए विशेष नियम बनाये गये। 1481 में निर्मित एक नियम के अनुसार वेनिस के राजदूत किसी गैर-सरकारी विदेशी के साथ राजनीतिक विचार-विमर्श नहीं कर सकते थे। जो नागरिक विदेशी राजनयिकों से सार्वजनिक विषयों पर विचार-विमर्श करते थे उनको दण्ड देने की व्यवस्था थी।

राज्यों की स्थिति (The Position of States)
वेनिस के अतिरिक्त इटली के अन्य राज्यों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। वे सामान्यतः कमजोर थे। उनके पास राष्ट्रीय सेना नहीं थी। अपनी सुरक्षा के लिये वे भाड़े के सैनिकों की सहायता लेते थे। उनमें आन्तरिक फूट व्याप्त थी। जब उन पर विदेशी आक्रमण हुए तो उनका बिना विरोध किये ही पतन हो गया। उनकी आपसी फूट के कारण शान्ति व्यवस्था का रहना असम्भव था। सैनिक कमजोरी के कारण वे आत्म रक्षा के लिए राजनय की ओर मुड़। उस समय उनका राजनय किसी आदर्श विचार अथवा दीर्घकालीन लक्ष्य से जुड़ा हुआ नहीं था। वरन् वे तत्कालीन हितों की रक्षा के लिये प्रयत्नशील थे। उस समय के उत्तेजनापूर्ण तथा निर्दयतापूर्ण वातावरण में राजनयिक समझौतों में चालाकी, घूर्तता, छल-कपट एवं झूठ को अपनाया जाता था। इटली के इन राज्यों की राजनीतिक अस्थिरता के कारण यहाँ का जन-जीवन भी उलझा हुआ था।

राजनयिक आचार का फ्रांसीसी तरीका
फ्रांसीसी राजनय पर दो विचारकों के मत का भारी प्रभाव पड़ा। ये थे – ग्रोशियस तथा रिचलू। इनमें से एक तो अन्तर्राष्ट्रीय विधिवेत्ता था और दूसरा राष्ट्रीय राजनीतिज्ञ। दोनों के राजनय सम्बन्धी विचारों के आधार पर ही फ्रांसीसी राजनय के आचार का रूप निर्धारित हुआ।

राजनयिक आचार का भारतीय तरीका

भारत में राजनय का प्रयोग अति प्राचीन काल से चलता चला आ रहा है। वैदिक काल के राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में हमारा ज्ञान सीमित है। महाकाव्य तथा पौराणिक गाथाओं में राजनयिक गतिविधियों के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। प्राचीन भारतीय राजनयिक विचार का केन्द्र बिन्दु राजा होता था, अतः प्रायः सभी राजनीतिक विचारकों- कौटिल्य, मनु, अश्वघोष, बृहस्पति, भीष्म, विशाखादत्त आदि ने राजाओं के कर्तव्यों का वर्णन किया है। स्मृति में तो राजा के जीवन तथा उसका दिनचर्या के नियमों तक का भी वर्णन मिलता है। राजशास्त्र, नृपशास्त्र, राजविद्या, क्षत्रिय विद्या, दंड नीति, नीति शास्त्र तथा राजधर्म आदि शास्त्र, राज्य तथा राजा के सम्बन्ध में बोध कराते हैं। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, कामन्दक नीति शास्त्र, शुक्र नीतिसार, आदि में राजनय से सम्बन्धित उपलब्ध विशेष विवरण आज के राजनीतिक सन्दर्भ में भी उपयोगी हैं। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद राजा को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जासूसी, चालाकी, छल-कपट और धोखा आदि के प्रयोग का परामर्श देते हैं। ऋग्वेद में सरमा, इन्द्र की दूती बनकर, पाणियों के पास जाती है। पौराणिक गाथाओं में नारद का दूत के रूप में कार्य करने का वर्णन है। यूनानी पृथ्वी के देवता ‘हर्मेस’ की भांति नारद वाक चाटुकारिता व चातुर्य के लिये प्रसिद्ध थे। वे स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य एक-दूसरे राजाओं को सूचना लेने व देने का कार्य करते थे। वे एक चतुर राजदूत थे। इस प्रकार पुरातन काल से ही भारतीय राजनय का विशिष्ट स्थान रहा है।

Leave a Comment