हास्य रस के भेद एवं हास्य-विधाएँ, आइए जाने

हास्य के भेदों पर भी आचार्यों ने विचार किया है। उन्होंने हास्य के दो भेद किए हैं। एक है आत्मस्थ और दूसरा है परस्थ। हास्यपात्र की दृष्टि से आत्मस्थ हास्य है स्वत: उस पात्र का हँसना और परस्थ हास्य है दूसरों को हँसाना। सामाजिकों या सहृदय श्रोताओं, अथवा नाट्यदर्शकों की दृष्टि से आत्मस्थ हास्य है अन्यों की हँसी के बिना स्वत: उनमें उद्भुत हास्य और परस्थ हास्य है दूसरों को हँसता हुआ देखकर उनमें उत्पन्न हास्य। दृष्टिकोणों का यह अंतर समझ लेने पर इन दोनों शब्दों के अर्थों का विचार सरलतापूर्वक समाप्त किया जा सकता है। फिर, आचार्यों ने हास्य के छह भेद किए हैं – स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अवहसित और अतिहसित; जिन्हें भावभेद नहीं किंतु हसनक्रिया के ही भेद मानना पड़ेगा। संक्षेप में, आँखों की मुस्कराहट स्मित है। बत्तीसी दीख पड़ना हसित है, हो ही की सी ध्वनि निकल पड़ना विहसित है। अंग हिल उठना अवहसित है। पेट पकड़नेवाली हँसी अवहसित है और पूरे ठहाकेवाली झकझोरकारिणी पसलीतोड़ हँसी अतिहसित है। साहित्यदर्पणकार ने स्मित और हसित को श्रेष्ठों के योग्य कहा है। विहसित और उपहसित को मध्यम वर्गीय लोगों के योग्य और अपहसित तथा अतिहसित को नीच लोगों के योग्य कहा है। रंगमंच में दर्शकों के लिए भी हँसने की एक मर्यादा होनी चाहिए, उस दृष्टि से उत्तम, मध्यम, अधम की यह बात भले ही मान ली जा सकती है। नहीं तो झकझोर देनेवाली हँसी केवल नीचों की वस्तु समझ लेने से उच्च वर्गीय लोक स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण तत्व से वंचित रह जाऐंगे। डॉ॰ रामकुमार वर्मा ने उत्तम, मध्यम, अधम के प्रभाव की इष्टि से हास्य के तीन भेद माने हैं और इन्हें आत्मस्थ, परस्थ से गुणित करके हसन क्रिया के बारह भेद लिखे हैं। स्मित, हसित आदि हसनक्रियाभेदों को हास्य का अनुभाव ही कहा जा सकता है। इन अनुभावों का वर्णन मात्र कर देना अलग बात है और अपनी रचना द्वारा सामाजिकों में ये अनुभाव उत्पन्न करा देना अलग बात है। हास्यरस की सफल रचना वह है जो हास्यरस के अनुभाव अनायास उत्पन्न करा दे।
विदेशी विद्वानों के विचार से हास्य के पाँच प्रमुख भेद हैं जिनके नाम हैं – ह्यूमर (शुद्ध हास्य), विट (वाग्वैदग्ध्य), सैटायर (व्यंग्य), आइरनी (वक्रोक्ति) और फार्स (प्रसहन)। ह्यूमर और फार्स हास्य के विषय से संबंधित हैं जबकि बिट, सैटायर और आइरनी का संबंध उक्ति के कौशल से है जिनमें पिछले दो का उद्देश्य केवल संतुष्टि ही न होकर संशुद्धि भी रहा करता है। पैरोडी (रचनापरिहास अथवा विरचनानुकरण) भी हास्य की एक विधा है जिसका उक्तिकौशल से संबंध है किंतु जिसका प्रधान उद्देश्य है संतुष्टि। आइरनी का अर्थ परिहास चिंत्य है। उपहास में, हमारे विचार से, आइरनी (वक्रोक्ति) का भी अंतर्भाव मान लिया जाना चाहिए अन्यथा वह हास्य की कोटि से बाहर की वस्तु हो जाएगी। विट अथवा वाग्वैदाध्य को एक विशिष्ट अलंकार कहा जा सकता है।

हास्य की उत्पत्ति एवं साधन

भारतीय साहित्यपंडितों ने जिस प्रकार शृंगार के साथ न्याय किया है उसका दशमांश भी हास्य के साथ नहीं किया, यद्यपि भरत मुनि ने इसकी उत्पत्ति शृंगार से मानी है अर्थात् इसे रति या प्रीति का परिमाण माना है और इसे शृंगार के बाद ही नवरसों में महत्व का दर्जा दिया है। आनंद के साथ इसका सीधा संबंध है और न केवल रंजनता की दृष्टि से किंतु उपयोगिता की दृष्टि से भी इसकी अपनी विशिष्टता है। यह तन मन के तनाव दूर करता है, स्वभाव की कर्कशता मिटाता है, आत्मनिरीक्षण और आत्मपरिष्कार के साथ ही मीठे ढंग पर समाजसुधार का मार्ग प्रशस्त करता है, व्यक्ति और समाज की थकान दूर कर उनमें ताजगी भरता हुआ जनस्वास्थ्य और लोकस्वास्थ्य का उपकारक बनता है। यह निश्चित है कि संस्कृत साहित्य तथा हिंदी साहित्य में इस हास्यरस के महत्व के अनुपात से इसके उत्तम उदाहरणों की कमी ही है। फिर भी ऐतिहासिक सिंहावलोकन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि साहित्य में हास्यरस का प्रवाह वैदिक काल से लेकर आज तक निरंतर चला आ रहा है, यद्यपि वर्तमान काल के पूर्व उसें विविधता इतनी नहीं जितनी आज दिखाई पड़ रही है।
हास्यरस की धारा के वैविध्य (अथवा भेदों) को विषय और व्यंजना (अर्थात् अर्थ और वाक्) की दृष्टि से देखा जा सकता है। विषय को हम आकृति, प्रकृति, परिस्थिति, वेश, वाणी, व्यवहार और वस्तु में विभक्त कर सकते हैं। आकृति का बेतुकापन है मोटापा, कुरूपता, भद्दापन, अंगभंग, बेजा नजाकत, तोंद, कूबड़, नारियों का अत्यंत कालापन, आदि। इनमें से अनेक विषयों पर हास्यरस की रचनाएँ हो चुकी हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि एक समय का हास्यास्पद विषय सभी समयों का हास्यास्पद विषय हो जाए, ऐसा नहीं हुआ करता। आज अंगभंग, निर्मुच्छता आदि हास्य के विषय नहीं माने जाते अतएव अब इनपर रचनाएँ करना हास्य की सुरुचि का परिचायक न माना जाएगा। प्रकृति या स्वभाव का बेतुकापन है उजड्डपन, बेवकूफी, पाखंड, झेंप, खुशामद, अमर्यादित फैशनपरस्ती, कंजूसी, दिखावा पंडितमन्यता, अतिहास्यपात्रता, अनधिकारपूर्ण अहंमन्यता, आदि। आकृति के बेतुकेपन की अपेक्षा प्रकृति के बेतुकेपन को अपना लक्ष्य बनाकर रचनाएँ करना अधिक प्रशस्त है। रचनाकारों ने कंजूसी आदि की वृत्तियों पर अच्छे व्यंग किए हैं, परंतु अभी इस दिशा में अनेक विषय अछूते ही छूट गए हैं। परिस्थिति का बेतुकापन है गंगामदारी जोड़ा (उदाहणार्थ “कौवा के गले सोहारी”, हूर के पहल में लंगूर”, “पतलून के नीचे धोती”, “गदहे सों बाचालता अरु धोबी सों मौन”, आदि) समय की चूक (अवसर चूकी ग्वालिनी, गावै सारी रात) समाज की असमंजसता में व्यक्ति की विवशता आदि। इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है रामचरितमानस का केवट प्रसंग जिसमें राम का मर्म समझ जाने की डींग हाँकनेवाले मूर्ख किंतु पंडितमन्य केवट को राम कोई उत्तर नहीं दे पाते और एक प्रकार से चुपचाप आत्मसमर्पण कर देते हैं। यह परिस्थिति का व्यंग था। वेश का बेतुकापन, हास्पात्र नटों और विदूषकों का प्रिय विषय ही रहा है और प्रहसनों, रामलीलाओं, रासलीलाओं, “गम्मत”, तमाशों आदि में आसानी से दिया जा सकता है। धर्मध्वजियों (बगुलाभक्तों का) वेश, अंधानुकरण करनेवाले फैशनपरस्तों का वेश, “मर्दानी औरत” का वेश, ऐसे बेतुके वेश हैं जो रचना के विषय हो सकते हैं। वेश के बेतुकेपन की रचना भी आकृति के बेतुकेपन की रचना के समान प्राय: छिछले दर्जे की होगी। वाणी का बेतुकापन है हकलाना, बात बात पर “जो है सो” के सदृश तकियाकलाम लगाना, शब्दस्खलन करना (“जल भरो” की जगल “भल जरो” कह देना), अमानवी ध्वनियाँ (मिमियाना, रेंकना, स्वरवैषमय अथवा फटे बँस की सी आवाज, बैठे गले की फुसफुसाहट आदि), शेखी के प्रलाप, गपबाजी (जो अभिव्यंजना की विधा के रूप की न हो), पंडिताऊ भाषा, गँवारू भाषा, अनेक भाषा के शब्दों की खिचड़ी, आदि। व्यवहार का बेतुकापन है असमंजस घटनाएँ, फूहड़ हरकतें, अतिरंजना, चारित्रिक विकृति, सामाजिक उच्छ्रंखलताएँ, कुछ का कुछ समझ बैठना, कह बैठना या कर बैठना, कठपुतलीपन (यंत्रवत् व्यवहार जिसें विचार या विवेक का प्रभाव शून्यवत् रहता है) इत्यादि। हास्यरस की अभिव्यंजना के लिए, चाहे वह परिहास की दृष्टि से (संतुष्टि की दृष्टि से) हो चाहे उपहास की दृष्टि से (संशुद्धि की दृष्टि से), व्यवहार का बेतुकापन ही प्रचुर सामग्री प्रदान कर सकता है। वस्तु की दृष्टि से मनुष्य ही क्यों, देव दानव (विष्णु, शंकर, राम, कृष्ण, रावण, कुंभकर्ण आदि) पशु पक्षी (कुत्ते, गधे, ऊँट, उल्लू, कौवा आदि), खटमल मच्छर, झाडू, टोकनी, प्लेट राशनिंग आदि अनेक विषयों पर सफलतार्पूक कलमें चलाई गई हैं। परंतु इन वस्तुओं और विशेषत: इष्ट देवों एवं प्रशासनिक व्यंगों के साथ मजाक जहाँ तक प्रीतिभाव को लेकर होगा, वहीं तक हास्यरस की कोटि का अधिकारी कहा जाएगा। खीझभरी अन्य रचनाएँ रौद्र, वीभत्स या अन्य रसों की कोटि में पहुँच जा सकती हैं।

अभिव्यंजना में प्रत्याशित का वैपरीत्य अनेक प्रकार से देखा और दिखाया जा सकता है। इसे बेतुकापन, विकृति, असमंजसता आदि शब्दों से ठीक ठीक नहीं समझाया जा सकता। यह वह वाक्कौशल है जिसके लिए रचनाकार में भी पर्याप्त प्रतिभा अपेक्षित होती है और उस रचना के द्रष्टा, श्रोता या पाठक में भी। जिस सामाजिक (द्रष्टा, श्रोता या पाठक) में हास्य की इच्छा और आशा न होगी, स्वभाव में विनोदप्रियता और हास्योन्मुखता न होगी तथा बुद्धि के शब्दसंकेतों और वाक्यगत अंगों को समझने की क्षमता न होगी, समझना चाहिए कि उसके लिए हास्यरस की रचनाएँ है ही नहीं। इसी प्रकार जिस कलाकार (कवि, लेखक या अभिनेता) में परिष्कारप्रियता, प्रत्युत्पन्नमतित्व और शब्द तौलने की कला नहीं है वह हास्यरस का सफल लेखक नहीं हो सकता। सफल लेखक अप्रत्याशित शब्दाडंबर के सहारे, शब्द की अप्रत्याशित व्युत्पत्ति के सहारे (जैसे-को घाटे ये वृषभानुजा वे हलधर के बीर-बिहारी); अप्रत्याशित विलक्षण उपमाओं आदि अलंकारों के सहारे (जैसे-न साहेब ते सूधे बतलाएँ, गिरी थारी अइसी झन्नायें, कबौं छउकन जइसी खउख्यायें, पटाका अइसी दगि दगि जाएँ-रमई काका, मन गाड़ी गाड़ी रहै प्रीति क्लियर बिनु लैन, जब लगि तिरछे होत नहिं सिंगल दोऊ नैन-सुकवि); विलक्षण तर्कोक्तियों के सहारे (जैसे हाथी के पदचिह्रों के लिए लालबुझक्कड़ी तर्क पाँव में चक्की बाँध के हिरना कुदा होय); वाग्वैदग्ध्य (विट्) की अनेक विधाओं के सहारे यथा, (1) अर्थ के फेर बदल के सहारे (जैसे-“भिक्षुक गो कितको गिरिज? सुतौ माँगन को बलि द्वारे गयो री” सागर शेल सुतान के बीच यों आपस में परिहास भयो री; (2) प्रत्युतर में नहले की जगह दहला लगाने की कला के सहारे (जैसे-गावत बाँदर बैठ्यो निकुंज में ताल समेत, तैं आँखिन पेखे; गाँव में जाए कै मैं हू बछानि को बैलहिं बेद पढ़ावत देखे – काव्यकानन); सैटायर के सहारे (जैसे-रामचरितमानस के शिवबरात प्रसंग में विष्णु की उक्ति “”कि बर अनुहारि बरात न भाई, हँसी करइइहु पर पुर जाई)””, कृष्णायन में उद्धव की उक्ति की भवन जरैहैं मधुपुरी, श्याम बजैहैं बेनु? भवानीप्रसाद मिश्र जी का गीतफरोश आदि), कटाक्ष (आइरानी) के सहारे (जैसे, करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहिं, रे गंधी मतिअंध तू अतर दिखावत काहि – बिहारी; मुफ्त का चंदन घस मेरे नंदन – लोकोक्ति; मुनसी कसाई की कलम तलवार है – भड़ोवा संग्रह,; विरूपरचनानुकरण (पैरोडी) के सहारे (जैसे, नेता ऐसा चाहिए जैसा रूप सुभाय, चंदा सारा गहि रहै देय रसीद उड़ाय – चोंच, बीती विभावरी जाग री; छप्पर पर बैठे कावें कावें करते हैं कितने काग री-बेढब); विरूप वचनानुकरण के सहारे (जिसे भी विरूपरचनानुकरण के समान पैरोडी की एक विधा ही समझना चाहिए – जैसे पं. नेहरु की भाषण परिपाटी की नकल, किसी अहिंदीभाषी की प्रांतीय अथवा जातीय विशेषताओं से युक्त भाषा की नकल, किसी के तकियाकलामों की नकल); तथा इसी प्रकार की अनेकानेक अभिव्यंजना शैलियों से हास्यरस का उद्रेक कराया करते हैं।
प्रभाव की दृष्टि से हमारी समझ में हास्यरस या तो विशेषत: परिहास की कोटि का होता है या उपहास की कोटि का। इन दोनों शब्दों को हमने परंपरागत अर्थ में सीमाबद्ध नहीं किया है। जो संतुष्टि प्रधान काव्य है उसे हम परिहास की कोटि का मानते हैं और जो संशुद्धि प्रधान है उसे उपहास की कोटि का। अनेक रचनाओं में दोनों का मिश्रण भी हुआ करता है। परिहास और उपहास दोनों के लिए सामाजिकों की सुरुचि का ध्यान रखना आवश्यक है। मांसल शृंगारपरक हास, आजकल के शिष्ट समाज को रुचिकर नहीं हो सकता। देवता विषयक व्यंग सहधर्मियों को ही हँसाने के लिए हुआ करता है। उपहास के लिए सुरुचि का ध्यान अत्यंत आवश्यक है। मजा इसमें ही है कि हास्यपात्र (चाहे वह व्यक्ति हो या समाज) अपनी त्रुटियाँ समझ ले परंतु संकेत देनेवाले का अनुगृहीत भी हो जाए और उसे उपदेष्टा के रूप में न देखे। बिना व्यंग के हास को परिहास समझिए, चाहे वह वर्णनात्मक हो चाहे वार्तालाप की कोटि का और अपने पर अथवा अन्य पर, विशेषत: अन्य पर, व्यंग करके जो प्रभाव दिखाया जाता है वह उपहास है ही। बिट, ह्यूमर, पैरोडी आदि के सहारे उत्पन्न वह हास जो विशुद्ध संतुष्टि की कोटि का है, परिहास ही कहा जाएगा। अनुभाव की दृष्टि से हास्यरस को मृदुहास की कोटि का समझना चाहिए या अट्टास की कोटि का। हसित, अपहसित आदि अन्य कोटियों का इन्हीं दोनों में अंतर्भाव मान लेना चाहिए। मृदुहास के दो भी किए जा सकते हैं, एक है गुप्त हास जिसका आनंद मन ही मन लिया जाता है और दूसरा है स्फुट हास जिसका मुस्कराहट आदि के रूप में अन्य जन भी दर्शन कर सकते हैं। अट्टहास के भी दो भेद किए जा सकते हैं-एक है मर्यादित हास जो हँसनेवाले की परिस्थिति से नियंत्रित रहता है और दूसरा है अमर्यादित हास जिसमें परिस्थिति सापेक्षता का भान नहीं रहता। हास्य के भेदों का यह विवेचन संभवत: अधिक वैज्ञानिक होगा।

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