कृत्रिम जल निकासी के कारण

आर्द्रभूमि मिट्टी को कृषि योग्य बनाने के लिए जल निकासी की आवश्यकता हो सकती है। उत्तरी अमेरिका और यूरोप में, हिमाच्छादन के कारण कई छोटी झीलें बन गई हैं जो धीरे-धीरे से ह्यूमस (सड़ी हुई पत्तियों वाली मिट्टी) से भर जाने के बाद दलदल बनाती हैं। इनमे से कुछ को खुली खाइयों और गड्ढों का प्रयोग करके गंदली भूमि (मकलैंड) बनाने के लिए बहा दिया गया था, जिनका प्रयोग मुख्यतः उच्च मूल्य वाली फसलों जैसे कि सब्जियां उगाने के लिए किया जाता है।
दुनिया में इस प्रकार की सबसे बड़ी परियोजना सदियों से नीदरलैंड में चली आ रही है। प्रागैतिहासिक काल में एम्स्टर्डम, हार्लेम और लीडेन के बीच के क्षेत्र दलदली और छोटी झीलों के रूप में थे। टर्फ कटिंग (दलदली/पीट कोयले का खनन), जमीन के धंसने और तटीय रेखा के अपक्षरण के कारण धीरे धीरे एक बड़ी झील बन गई जिसे हार्लेममेर्मीर या हार्लेम की झील के नाम से जाना जाता है। 15वीं सदी में वायुशक्ति से चलने वाले पम्प इंजिनों के अविष्कार ने सिरे की जमीन के कुछ हिस्से पर जल निकासी को संभव बनाया, किन्तु झील की अंतिम जल निकासी के लिए बड़े भाप शक्ति चालित पंपों का डिजाइन बनने और क्षेत्रीय अधिकारियों के बीच समझौतों तक का लंबा समय लगा। झील को हटाने की प्रक्रिया 1849 और 1852 के बीच चली जिससे हजारों वर्ग किलोमीटर नई भूमि का निर्माण हुआ।
तटीय मैदानों और नदी डेल्टाओं में मौसम के अनुसार या स्थाई रूप से उच्च जल सारिणी होनी चाहिए और यदि इनका प्रयोग कृषि के लिए किया जाना है तो इनकी जल निकासी में सुधार अवश्य किया जाना चाहिए। इसका एक उदाहरण फ्लोरिडा का नींबू उगाने वाला क्षेत्र फ़्लैटवुड्स है। लंबी अवधि तक अधिक वर्षा होने के बाद, अधिक गीली मिट्टी में नींबू के पेड़ों को नुकसान से बचाने के लिए जल निकासी पंपों का प्रयोग किया जाता है। चावल के उत्पादन के लिए पानी पर पूरी तरह से नियंत्रण की आवश्यकता है, क्योंकि फसल चक्र के विभिन्न चरणों में खेतों में पानी भरने या निकालने की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार की जल निकासी में भी नीदरलैंड सबसे आगे है, जहां न केवल तट के किनारे की निचली भूमि से जल निकासी की गई, बल्कि मूल राष्ट्र के अत्यंत विशाल बनने तक समुद्र को वास्तव में पीछे धकेला गया।
नम जलवायु में, मिट्टी फसल उगाने के लिए अनुकूल हो सकती है लेकिन अपवादस्वरूप बर्फ के पिघलने या भारी वर्षा के कारण प्रत्येक वर्ष की कुछ अवधि के लिए इसमें जल भराव हो जाता है। वह मिट्टी जो मुख्यतः चिकनी मिट्टी है, पानी को बहुत धीरे धीरे नीचे की ओर जाने देगी, इस बीच पौधों की जडें सांस नहीं ले पाएंगी क्योंकि जड़ों के पास जमा अतिरिक्त पानी मिट्टी में हवा के प्रवाह को रोकता है।
अन्य भूमियों पर हार्डपैन नामक खनिज युक्त मिट्टी की एक अभेद्य परत हो सकती है या खोखली भूमि के नीचे अपेक्षाकृत अभेद्य चट्टानी परतें हो सकती हैं। फलयुक्त वृक्षों के लिए जल निकासी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भूमि जो वैसे तो उत्कृष्ट हैं, उसमे साल में एक सप्ताह के लिए जल भराव हो सकता है, जो फलयुक्त वृक्षों और प्रतिस्थापन स्थापित होने तक भूमि की उत्पादकता लागत को ख़त्म करने के लिए पर्याप्त समय है। इनमे से प्रत्येक मामले में वार्षिक या बारहमासी फसलों को नुकसान से बचाने के लिए उपयुक्त जल निकासी द्वारा अस्थायी रूप से पानी को बाहर निकला जाता है।
सूखे क्षेत्रों में सिंचाई द्वारा खेती की जाती है और उसमे कोई जल निकासी की आवश्यकता पर विचार नहीं करेगा। हालांकि, सिंचाई के पानी में हमेशा खनिज और लवण मिले होते हैं, जो भाप द्वारा वाष्पित होने से सघन हो कर विषाक्त स्तर तक पहुंच सकते हैं। सिंचित भूमि में मिट्टी की लवणता पर नियंत्रण के लिए समय-समय पर पानी के अत्यधिक बहाव और जल निकासी की आवश्यकता हो सकती है।

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