बंजर जमीन पर खेती कर कमाए दस करोड़ रुपए सालाना

खेती जमीन पर मनुष्य द्वारा फसल उपजावे के खेती या कृषि कहल जाला। ई एक तरह के आजीविका के साधन के रूप में अपनावल आर्थिक क्रिया बाटे। खेती आपन भोजन आ आय हासिल करे वाला लोग के किसान कहल जाला।
खारे पानी और बंजर भूमि में झींगा मछली पालन
भाई 10 करोड़ का तो पता नहीं लकिन जो रास्ता मैं आपको बताने जा रहा हूँ वो जाता उसी तरफ है–करोड़ों की तरफ |
यहाँ आप करोड़ों कमा सकते हो और जमा पूंजी भी गवां सकते हो
इस बिज़नेस में 3 क्वालिटी जरूरी हैं –
1-मधुमखी ,चींटी की तरह मेहनती
2-फौजी की तरह ड्यूटी के पाबंद
3-हररोज नया सिखने की इच्छा
खारे पानी और बंजर भूमि में भी मछली पालन कर लाखों कमा सकते हैं किसान
खारे पानी से ग्रस्त भूमि(बंजर भूमि) का प्रयोग सफेद झींगा पालन के लिए किया जा सकता है। यह व्यवसाय खारेपन से ग्रस्त भूमि का सदुपयोग के साथ-साथ अच्छी आय प्राप्त करने का उत्तम साधन है। यदि तकनीकी ज्ञान से इसका पालन किया जाए तो आज का युवा इससे अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकता है।
खारा पानी (बंजर भूमि) होने से ऐसे क्षेत्र जहां गन्ना और धान का उत्पादन भी संभव नहीं है, वहां किसान जागरूकता के साथ काम करके लाखों रुपये की आमदनी प्राप्त कर सकता है।
ऐसे क्षेत्र में किसान मत्स्य पालन कर सकते हैं। इस काम में सरकार भी उनकी मदद कर रही है। जहां खारा पानी (बंजर भूमि) है, वहां झींगा मछली पालन किया जा सकता है। एक हेक्टेयर में प्रति वर्ष 10 टन झींगा मछली का उत्पादन किया जा सकता है और इस मछली की बाजार में भी बहुत डिमांड है और दिल्ली व पानीपत बाजार में आसानी से 400 से 500 रुपये किलो भाव किसान को मिल जाता है।
लगातार जोत घट रही है और खेती घाटे का सौदा बन रही है। जलभराव के कारण काफी हिस्से में फसलें बर्बाद हो जाती हैं?
जहां पानी खारा है और जलस्तर काफी ऊपर होने से कृषि संभव नहीं है, वहां झींगा मछली पालन किया जा सकता है। इसके लिए किसान को पट्टे पर जमीन भी आसानी से मिल सकती है। प्रदेश के कुछ जिलों में झींगा मछली पालन कर किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं।
झींगा मछली पालन शुरू करने में खर्च आता है और सरकार की तरफ से क्या मदद दी जाती है?
प्रति हेक्टेयर पर लगभग 25 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसमें तालाब की खोदाई, जनरेटर, इंजन खरीदने, पानी सप्लाई करने के साधन आदि भी शामिल हैं। कुल राशि पर 50 प्रतिशत सब्सिडी सरकार देती है।
मछली पालन के तौर तरीके में पहले की तुलना में अब क्या बदलाव आया है?
पहले एकीकृत मछली पालन किया जाता है, जिसमें एक ही किस्म की मछली का बीज तालाब में डाल दिया जाता था और प्रति वर्ष एक यूनिट से केवल पांच से छह क्विंटल उत्पादन होता था। इसके बाद मिश्रित मछली पालन का चलन शुरू हुआ, जिसमें तालाब में तीन किस्मों का बीज डाला जाता है, जिसमें एक किस्म की मछली पानी की तलहटी पर, दूसरी पानी के बीच में तथा तीसरी किस्म की मछली पानी की ऊपरी सतह पर तैयार होती हैं और उत्पादन भी 10 टन हो जाता है।
मत्स्य शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख संस्थान
मत्स्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न पाठ्यक्रमों को संचालित करने वाले कुछ प्रमुख संस्थानों, महाविद्यालयों के नाम इस प्रकार हैं।
1. कर्नाटक क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज, सूरखाल – फिस हार्बर इंजीनियरिंग
2. अन्नाकलाई विश्वविद्यालय, पोर्टनोवो (समुदायिक जीव विज्ञान)
3. मद्रास विश्वविद्यालय, चेन्नई (सागर तटीय जल जीव पालन)
4. केरल विश्वविद्यालय, तिरुवनंतपुरम (मत्स्य विज्ञान एवं जलीय जीव विज्ञान)
5. टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई पारास्नातक (डॉक एवं हार्बर इंजीनियरिंग)
6. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई पारास्नातक (सामुदायिक भु- रसायन)
7. कोचीन विश्वविद्यालय, कोचीन – पारास्नातक (अद्यौगिकी मत्सिकी)
8. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खडगपुर – बी. टेक. (नेवल आर्किटेक्ट एंड मैरिन इंजीनियरिंग)
9. इंजीनियरिंग कॉलेज, बाल्तेयर (फिशरीज इंजीनियरिंग एंड नेवल आर्किटेक्चर)
10. आन्ध्र प्रदेश विश्वविद्यालय बाल्तेयर (सामुदायिक भू- भौतिकी एवं जीव विज्ञान)
अन्य संस्थान
सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज एजूकेशन मुम्बई के अलावा कई अन्य क्षेत्रीय केन्द्रों से भी मत्स्य शिक्षा प्रदान करता है। संस्थान के आगरा तथा हैदराबाद केन्द्रों में अंत मरूस्थलीय मत्स्यपालन में प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इसका एक क्षेत्रीय केंद्र लखनऊ (चिनहट में स्थित है जहाँ अंतर मरूस्थलीय मत्स्य की सहकारिता विषय में नौ माह का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
इसी तरह इसका एक क्षेत्रीय केंद्र आंध्रप्रदेश में स्थित है, काकीपाड़ा मत्स्य केंद्र, इस केंद्र द्वारा मत्स्य विज्ञान प्रसार विधि एवं तकनीक की जानकारी दी जाती है। मत्स्य शिक्षा का एक अन्य एक वर्षीय पाठ्यक्रम सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज एजूकेशन की देखरेख मेंबैरकपुर (पश्चिम बंगाल) में संचालित किया जाता है। इस संस्थान द्वारा प्रत्येक वर्ष पचास छात्रों को प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए जीव विज्ञान विषय के साथ बारहवीं उत्तीर्ण होना आवश्यक शर्त माना गया है।
देश का प्रथम मत्स्य विज्ञान महविद्यालय सन 1989 में मंगलौर में बंगलोर, कृषि विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित किया गया। इस संस्थान द्वारा फिशरीज एजुकेशन में स्नातकोत्तर की शिक्षा दी जाती है।

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