द्रव्यमान तथा ऊर्जा की समतुल्यता, आइए जाने

सन् 1905 ई. में आइन्स्टाइन ने अपना आपेक्षिक सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसके अनुसार कणों का द्रव्यमान उनकी गतिज ऊर्जा पर निर्भर रहता है। इसका यह अर्थ है कि ऊर्जा का मान द्रव्यमान वृद्धि को प्रकाश के वेग के वर्ग से गुणा करने पर प्राप्त होता है। इस सिद्धांत की पुष्टि नाभिकीय विज्ञान के बहुत से प्रयोगों द्वारा होती है। सूर्य में भी ऊर्जा इसी तरह बनती है। सूर्य में एक श्रृंखल क्रिया होती है जिसका फल यह होता है कि हाइड्रोजन के चार नाभिकों के संयोग से हीलियम का नाभिक बन जाता है। हाइड्रोजन के चारों नाभिकों के द्रव्यमान का योगफल हीलियम के नाभिक से कुछ अधिक होता है। यह अंतर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। परमाणु बम एवं हाइड्रोजन बम में भी इसी द्रव्यमान-ऊर्जा-समतुल्यता का उपयोग होता है।

ऊर्जा का क्वांटमीकरण (Quantization of energy)

वर्णक्रम के विभिन्न वर्णों के अनुसार कृष्ण पिंड के विकिरण के वितरण का ठीक सूत्र क्या है, इसका अध्ययन करते हुए प्लांक इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विकिरण का आदान प्रदान अनियमित मात्रा में नहीं होता प्रत्युत ऊर्जा के छोटे कणों द्वारा होता है। इन कणों को रहता है। आवृत्तिसंख्या को जिस नियतांक से गुणा करने पर ऊर्जाक्वांटम का मान प्राप्त होता है उसे प्लांक नियतांक कहते हैं। नील्स बोर ने सन् 1913 ई. में यह दिखलाया कि यह क्वांटम सिद्धांत अत्यन्त व्यापक है और परमाणुओं में इलेक्ट्रान जिन कक्षाओं में घूमते हैं। वे कक्षाएँ भी क्वांटम सिद्धांत के अनुसार ही निश्चित होती हैं। जब इलेक्ट्रान अधिक ऊर्जावाली कक्षा से कम ऊर्जावाली कक्षा में जाता है तो इन दो ऊर्जाओं का अंतर प्रकाश के रूप में बाहर आता है। हाइज़ेनबर्ग, श्रोडिंगर तथा डिराक ने इस क्वांटम सिद्धांत को और भी विस्तृत किया है।

ऊर्जा के स्रोत

आधुनिक भौतिक विज्ञान में प्रत्येक कार्य के लिए ऊर्जा को आवश्यक बताया गया है। ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा को न तो जना जा सकता है और ना तो नष्ट किया जा सकता केवल इसका स्वरूप बदला जा सकता है। हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करने हेतु ऊर्जा के इस्तेमाल कई रूपों में करते हैं, यथा – यांत्रिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, रसायनिक ऊर्जा इत्यादि। मोटर में विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदल कर काम लिया जाता है तो बैटरी में रसायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में। मानव शरीर खाद्य पदार्थों की रासायनिक ऊर्जा को पचा कर उससे यांत्रिक कार्य करता है। इसी प्रकार एक विद्युत बल्ब विद्युत ऊर्जा को प्रकाय़ तथा ऊष्मीय ऊर्जा में बदल देता है। कार या बस का ईंजन पेट्रोल की रासायनिक ऊर्जा को पहले ऊष्मीय ऊर्जा में बदलता है तथा उसे फिर यांत्रिक ऊर्जा में। इन सभी कार्यों के लिए प्रयुक्त ऊर्जा इन स्रोतों से प्राप्त होती है – कोयला पेट्रोलियम प्राकृतिक गैस पवन ऊर्जा सौर ऊर्जा ज्वारीय ऊर्जा नदी घाटी परियोजनाएं

ऊर्जा एवं औद्योगिक क्रांति

उर्जा की अवधारणा (कांसेप्ट) उन्नीसवीं शताब्दी में आयी। यह मानव द्वारा आविष्कृत एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं मौलिक अवधारणा है। यह विभिन्न प्रकार की घटनाओं में होने वाली अन्तर्क्रियाओं (इन्टरैक्शन्स्) को संख्यात्मक रूप में व्यक्त करने में बहुत उपयोगी है। इसे एक तरह से विभिन्न भौतिक फेनामेना के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं के लिये सर्वनिष्ट (कॉमन) मुद्रा की तरह समझा जा सकता है। उर्जा की अवधारणा से ही परिवर्तन (ट्रान्स्फार्मेशन) (जैसे रसायन एवं धातुकर्म में) एवं ट्रान्समिशन से सम्बन्धित है जो कि औद्योगिक क्रांति के आधार हैं। जब तक केवल मानवी या पाशविक उर्जा से ही काम होता था, तब तक उर्जा सीमित थी; उसे स्वचालित एवं नियंत्रित करना कठिन कार्य था। किन्तु वाष्प आदि से चलने वाली मशीनों के आविष्कार से यह स्थिति बदल गयी जिससे औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। आधुनिक काल में किसी देश द्वारा खपत की जाने वाली उर्जा उसके विकास की प्रमुख माप है।

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