संघात्मक संविधान की विशेषताएँ, आइए जाने

संघात्मक संविधान में निम्नलिखित विशेषताएँ अपेक्षित होती हैं :
प्रथम, राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य संवैधानिक विभाजन, द्वितीय, संघीय संविधान की प्रभुसत्ता अर्थात् प्रथम तो न संघीय और न राज्य सरकारें संघ से पृथक् हो सकती हैं।
द्वितीय, संघात्मक संविधान उन दोनों से समान रूप से सर्वोपरि होता है।
तृतीय, चूंकि संघीय एवं राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभाजन होता है, अत: संघात्मक सविधान का लिखित होना भी आवश्यक है।
चतुर्थ, संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यसरकारों के समझौते का अंतिम रूप से पुष्ट करता है। अत: ऐसे संविधान का व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना अपेक्षित है। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान का परिवर्तन विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
पंचम, किसी भी प्रकार के विवाद जो संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच में संवैधानिक कार्यसंचालन में कर्तव्य, अधिकार अथवा साधनों के विषय में आ गए हों तो उनके निर्णय के लिए न्यायालय को सविधान के संघात्मक प्रावधानों की मींमांसा करने का पूर्ण एवं अंतिम अधिकार दिया जाना चाहिए।
इन विशेषताओं के साथ संघात्मक संविधान का एक आदर्श प्रारूप संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान है जिसका निर्माण सन् 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार हुआ था। इसके पश्चात् कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस इत्यादि के संघात्मक संविधानों का निर्माण हुआ। भारत का संविधान भी, जो सन् 1950 से लागू हुआ, संघात्मक संविधानों का एक नवीन दृष्टांत है।

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