लैंगिक असामान्यताएँ और लैंगिक परिवर्तन

लैंगिक असामान्यताएँ (Sexual abnormalities)

अवियोजन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लैंगिक असामान्यताएँ हो जाती हैं। ये असामान्यताएँ मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं : (1) स्त्री पुरूष (2) उभयलिंगी तथा (3) मध्यलिंगी।
स्त्रीपुंरूषता (Gynandromorphism) – स्त्रीपुंरूषता के अंतर्गत ऐसे प्राणी आते हैं जिनमें नर तथा मादा दोनों की विशेषताएँ पाई जाती हैं, जैसे तितलियों, पक्षियों तथा कीट पतंगों में से कुछ तो आधे आधे स्त्री पुरुष होते हैं तथा कुछ में वे विशेषताएँ भिन्न भिन्न अनुपात में होती हैं। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि स्त्रीपुरूष प्राणी का जीवन मादा के, जिसमें एक्स एक्स (XX) उपस्थित है, रूप में आरंभ होता है। जब कोशिका विभाजन प्रांरभ होता है। उस समय विभाजित कोशिका के एक भाग में क्रोमोसेम की संख्या में घटबढ़ हो जाती है। फलस्वरूप एक विभाजित कोशिका में केवल एक वाई (Y) ही आ पाता है। इस प्रकार के क्रोमोसोमों की असमान संख्या के कारण नर तथा मादा की आकृतियों में भिन्नता होती जाती है। ऐसे स्त्री-पुंरूष वाले प्राणियों की आंतरिक रचना के परीक्षणों से पता चलता है कि उनके शुक्राणु तथा डिंब जननांग भी उपस्थित रहते हैं। यह असामान्यता उन में अधिक मात्रा में पाई जाती है जिनमें हॉर्मोनो का प्रभाव अत्यल्प होता है, अथवा सर्वथा नहीं होता। यही कारण है कि कुछ पक्षियों को छोड़कर स्त्रीपुंरूपता अन्य विकसित तथा उच्च प्राणियों में नहीं पाई जाती।
उभयलिंगता (Hermaphroditism) – संसार के लगभग सभी जीव उभयलिंगी होते हैं। पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व की दिशा में किसी प्राणी का विकास किस आधार पर होता है, इस संबंध में सभी वैज्ञानिक एक मत नहीं हैं। कोशिका विभाजन के समय क्रोमोसोमों की संख्या में क्यों अंतर आ जाता है, अथवा लिंगनिर्माण के समय वोल्फ़ी तथा म्यूलरी वाहिनियों (Wolffian and Mullerian ducts) में से एक का क्यों ह्रास हो जाता है, या पुरुषत्व अथवा स्त्रीत्व निर्धारक हार्मोन किसी नियम, या मात्रा से, क्यों और कैसे नि:स्रवित होते हैं? इन सब प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर अभी वैज्ञानिक नहीं दे पाए हैं। अत: हम यह मान लेंगे कि स्त्री या पुरुष होना निरे संयोग की बात है।

प्रत्येक प्राणी में यह क्षमता होती है कि वह नर, या मादा में विकसित हो जाए। उभयलिंगता इसका ज्वलंत उदाहरण है। उभयलिंगी कई प्रकार के होते हैं, जैसे (1) ऐसे प्राणी जो स्वनिषेचन (self-fertilization) करते हैं, जैसे हाइड्रा (hydra), फीताकृमि (tapeworm), चपटाकृमि (flatworm) आदि (इन जंतुओं में इनका अपना ही शुक्राणु अपने ही डिबों को निषेचित करता है), (2) दूसरे ऐसे प्राणी होते हैं जो निषेचन के लिए एक दूसरे पर निर्भर करते हैं; जैसे केंचुआ, जोंक आदि।
वनस्पतियों की भी अनेक जातियों में एक ही पौधे में कुछ फूल पौधे के किसी विशेष भाग में ही पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी के अनेक पौधों में एक ही फूल में स्त्रीकेसर (pistils) तथा पुंकेसर (stamens) समीपस्थ होते हैं ताकि गर्भाधान में सरलता हो।
उभयलिंगियों में नर तथा मादा के अंत: और बाह्य लक्षण एकसाथ पाए जाते हैं। भेकों (toads) की मादाओं में शुक्र तथा नरों में डिंब ग्रंथियाँ प्राय: साथ साथ पाई जाती हैं। कछुओं में भी अंडवृषण (ovotestes) पाए गए हैं। कबूतरों में नर की शुक्र ग्रंथि डिंब तथा तारामीन की मादा के डिंबाशय में वृषण पाए गए हैं। केकड़ों में वृषण तथा डिंबाशय साथ साथ पाए गए हैं। इलास्मोब्रैक (Elasmobranch) मछलियों में निष्क्रिय वृषण और सक्रिय डिंबाशय साथ साथ पाए गए हैं। कुछ मछलियाँ ऐसी भी पाई गई जिनमें दो डिंबाशय तथा एक वृषण था।
मध्यलिंगता (Intersexuality) – यह वह स्थिति है जब कोई प्राणी किसी एक लिंग की ओर विकसित होते होते सहसा, किसी कारणवश, दूसरे लिंग को भी धारण कर ले। मनुष्यों में हिजड़ों (eunuchs) की यही अवस्था होती है। आनुवंशिकविज्ञान के अनुसार ऐसी अवस्था का कारण तीन कायिक, या दैहिक क्रोमसोम समूह के साथ दो एक्स (X) क्रोमोसोमों का होना है। (गोल्डश्मिट्)। इस अनुपात के कारण मक्खियों की बाहरी आकृति नर तथा मादा का मिश्रण होती है, यद्यपि जनन से उनके शरीर में नर तथा मादा ऊतक (tissues) नहीं पाए जाते। वे आकृति में या तो नर ही होंगी, या मादा ही। ऐसे प्राणी वंध्या होते हैं। ब्रैवेल ने बतलाया है कि अंतर्लिगी की जनन ग्रंथियाँ तो एक ही प्रकार की होती हैं, किंतु कुछ या सभी सहायक अंग तथा गौण लक्षण दूसरे लिंग का निर्णय मात्र कर देते हैं उनका वास्तविक विकास हार्मोनों के प्रभाव से ही होता है। सन् 1923 में क्रिउ ने कुछ घरेलू पशुओं (बकरे, सूअर, घोड़े, चौपाए, भेड़ तथा ऊँट) की जाँच की और पाया कि उनमें मिथ्या मध्यलिंगता (pseudo-intersexuality) थी, अर्थात् कुछ में तो नारी जननांग अत्यंत संकुचित थे, कुछ में सीधे और स्पष्ट, किंतु अनपेक्षित लंबे थे, तथा कुछ में स्पष्टत: नर के समान, किंतु अपूर्ण नलिकायुक्त थे। कुछ में वृषण तथा डिंब ग्रंथियाँ भी उपस्थित थीं। पुरुषों (मनुष्यों) में कुछ को मासिक धर्म होते तथा कुछ को दूध पिलाते हुए पाया गया है। जननांग में घाव, या शल्यक्रिया, या हार्मोन प्रयोग द्वारा माध्यलिंगता उत्पन्न हो सकती हैं।

लैंगिक परिवर्तन (Sexual Reversals)

अनेक प्राणियों में स्वत: लिंग परिवर्तन होता रहता है, उनका जीवनचक्र इस प्रकार होता है : नर (या मादा) र उभयलिंगी र मादा (या नर)। बोनेलिया, परजीवी केकड़ों, घोघों, मधुमक्खियों, तारामीनों तथा पक्षियों में लैगिक परिवर्तन प्राय: होते रहते हैं। प्राय: सभी वैज्ञानिकों ने मुर्गो में लैंगिक परिवर्तन का अध्ययन किया है और पाया है कि कोई मुर्गा आरंभ में मादा था और अंडे देता था, किंतु, डिंबाशय में रोग हो जाने के कारण अंडोत्पादन बंद हो गया। मुर्गी में धीरे धीरे मुर्गा के लक्षण प्रकट होने लगे और वह मुर्गियों में गर्भाधान करने लगी। क्रिउ का कहना है कि मादाओं में (चिड़ियों में) सामान्य डिंबाशय के साथ साथ एक छोटा, अल्पवर्धित वृषण भी होता है। डिंबाशय के निष्क्रिय होते ही वृषण सक्रिय हो जाता है। यही स्थिति उन मुर्गियों की हुई जिनकी डिंबग्रंथियाँ काटकर निकाल दी गई थीं।
चौपायों के जुड़वों (twins) में स्वतंत्र मार्टिन (Free Martin) नाम से एक असामान्य घटना का उल्लेख किया गया है। यह हॉर्मोन प्रभाव का उदाहरण है। जुड़वें तीन प्रकार के होते हैं : दोनों नर या दोनों मादा, या एक नर और एक मादा। अंतिम प्रकार में ऐसा होने की संभावना रहती है कि भ्रूणीय विकास में दोनों भ्रूणों में पारस्परिक रक्त का प्रवाह एक शरीर से दूसरे शरीर में होता रहे। ऐसी दशा में हॉर्मोनों का भी आदान प्रदान चल सकता है। नर हॉर्मोन पहले विकसित होता है और जुड़वों को नरत्व (maleness) की ओर ले चलता है। मादा हॉर्मोन देर में विकसित होता है और जुड़वों में से एक को मौलिक रूप से मादा बनाता है। फलस्वरूप जो मादा उत्पन्न होगी, उसमें नर के स्पष्ट लक्षण होंगे और वह वंध्या होगी। लिलि (Lillie) ने यह बतलाया है कि चौपायों के जुड़वों में सामान्य रक्तप्रवाह होता है और मादा को वास्तव में नर हॉर्मोनयुक्त रक्त प्राप्त होता है। अन्य पशुओं में जुड़वों में सामान्य रक्तप्रवाह की व्यवस्था नहीं होती, अत: उनमें स्वतंत्र मार्टिन नहीं होते।
लैंगिक परिवर्तन का प्रभाव मनुष्यों पर भी देखा जाता है। प्राय: समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है कि अमुक का लिंग परिवर्तन हो गया। सन् 1935 तथा 36 के ओलिंपिक चैपियनों में दो स्त्रियाँ ऐसी पाई गई जो बाद में चलकर पुरुष हो गई। मनुष्यों में यौवनारंभ के पूर्व (Prepuberty) यदि स्त्री पुरुष की जननग्रंथियाँ काट दी जाएँ, तो उनका लिंग परिवर्तन तो हो जाएगा, किंतु वे पूर्णतया स्त्री, या पुरुष नहीं हो सकेंगे और न तो संतोनोत्पादन ही कर सकेंगे। उनके हाव-भाव अवश्य स्त्रियोचित, या पुरुषोचित हो जाएँगे। पक्षियों में लिंगपरिवर्तन स्त्रीत्व से पुरुषत्व की ओर ही होता है।

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