वायुमंडल का सामान्य संचार, आइए जाने

वायुमंडल का सामान्य संचार भूमध्यीय तथा ध्रवीय देशों के बीच क्षैतिज तापप्रवणता (ग्रेडियंट) के कारण उत्पन्न होता है। एक प्रकार के वायुमंडल का सामान्य संचार वायुमंडल की हलचल का तथा उसकी क्रियाओं का एक व्यापक विहंगम चित्र है। यदि दीर्घकाल के दैनिक मौसमी नक्शों का परीक्षण किया जाए तो यह ज्ञात होता है कि उनमें प्रवाह के रूप दो प्रकार के होते हैं : (1) अल्पजीवी शीघ्रगामी प्रतिचक्रवात (ऐंटिसाइक्लोन) तथा अवदाब (डिप्रेशन)। इस प्रकार के भँवर प्रारंभ होने के बाद एक दिन से लेकर एक मास तक के काल में समाप्त होते हैं और फिर नक्शों से बिल्कुल अदृश्य हो जाते हैं। ये गौण संचार नाम से प्रसिद्ध हैं। (2) दीर्घजीवी तथा धीरे-धीरे चलनेवाले भँवर। ये भी प्रतिचक्रवर्ती अथवा चक्रवाती प्रकार के होते हैं, परंतु दीर्घ काल तक लगभग निश्चल रहते हैं। ये प्राथमिक संचार कहलाते हैं। चित्र 1 और 2 में जनवरी और जुलाई के महीनों में पृथ्वी पर औसत समुद्रस्तरीय दाबरेखाएँ दी गई हैं। यह स्पष्ट है कि दोनों चित्रों में दक्षिणी गोलार्ध की कुछ बातें एक जैसी हैं। (क) दोनों महीनों में पृथ्वी के समस्त भूमध्यरेखीय प्रदेश में एक अपेक्षाकृत अल्प, किंतु अत्यंत एकसमान, दाब का अखंड कटिबंध है। जनवरी मास में यह कटिबंध भूमध्यरेखा के कुछ उत्तर की ओर है, परंतु जुलाई मास में या तो ठीक उस रेखा पर है या थोड़ा दक्षिण की ओर। यह अल्प-दाब-कटिबंध प्रशांत तथा उष्ण मौसम का कटिबंध है जो समुद्र पर डोल्ड्रम के नाम से प्रसिद्ध है। इस पूरे कटिबंध को हम भूमध्यरेखीय अल्प-दाब-कटिबंध कह सकते हैं। (ख) उपोष्ण (सब-ट्रॉपिकल) देशों में (लगभग 30° दक्षिण अक्षांश के निकट) एच चौड़ा अखंड अधिक दाब का कटिबंध जनवरी और जुलाई दोनों ही मासों में होता है, परंतु जनवरी मास में आस्ट्रेलिया तथा दक्षिण अफ्रीका के ऊपर यह छोटे छोटे अल्पदाब क्षेत्रों द्वारा थोड़ा विच्छिन्न हो जाता है। यह चौड़ा कटिबंध उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध कहलाता है जो दोनों गोलार्धो में सामान्य संचार का एक स्थायी स्वरूप है। (ग) उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध के दक्षिण में वायुदाब दक्षिण की ओर बराबर गिरती जाती है और अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर न्यूनतम हो जाती है। उत्तरी गोलार्ध में निम्नलिखित तीन प्राथमिक दाबक्षेत्रों का परिचय मिलता है: (1) भूमध्यरेखीय अल्पदाब कटिंबध, जो दोनों गोलार्धों में समान रूप से विद्यमान रहता है। (2) उपोष्णवलयिक अधि-दाब-कटिबंध इस गोलार्ध में पूर्णतया भिन्न प्रकार का है। जनवरी मास में यह समुद्रों पर लगभग 25°-35° उत्तर में रहता है। परंतु महाद्वीपों के ऊपर ऊँचे अक्षांशों में इसका संबंध बहुत अधिक दाब की प्रणालियों से रहता है। ये दाबप्रणालियाँ लक्षण में एकदम भिन्न होती हैं और इसलिए उपोष्णवलयिक अधि-दाब-कटिबंध को समुद्रों तक ही सीमित समझना उचित है। (3) जनवरी मास के नक्शे पर उपोत्तरध्रुवीय (सब-आर्कटिक) अल्पदाब-कटिबंध स्पष्टतया दिखाई देता है। इस कटिबंध में दो बड़े अल्पदाब क्षेत्र आइसलैंड तथा अलूशियन द्वीपों पर हैं, जो क्रमानुसार उत्तरतम अटलांटिक महासागर पर तथा उत्तरतम पैसिफिक महासागर पर विस्तृत हैं। इन दोनों क्षेत्रों के बीच में ध्रुव पर अपेक्षतया अधिक दाब का एक क्षेत्र है। ग्रीष्म ऋतु में ये अल्पदाब बहुत क्षीण होते हैं। अलूशियन क्षेत्र तो गायब हो जाता है। ध्रुवों पर वायुदाब अपेक्षाकृत अधिक रहती है। उपोष्णवलयिक अधिदाब कटिबंध तथा उपध्रुवीय अल्पदाब कटिबंध की अखंडता में विच्छिन्नता नवीन तथा अज्ञात तत्वों के कारण होती है जिनका दक्षिणी गोलार्ध में अभाव है।

गौण संचार

गौण संचार चाहे प्रतिचक्रवाती हों या चक्रवाती, उनका लक्षण यह है कि एक या अधिक समदाब रेखाएँ अधिदाब केंद्रों या अल्पदाब केंद्रों को चारों ओर से घेरकर बंद कर देती हैं। इस प्रकार अधिदाब क्षेत्र तथा अल्पदाब क्षेत्र क्रमानुसार वायुमंडल के भार की अधिकता अथवा न्यूनता के स्थानीय क्षेत्र होते हैं। गौण संचार दो प्रकार के होते हैं : (1) प्रत्यक्षत: उष्मीय (थर्मली डाइरेक्ट) और (2) गतिक (डाइनैमिक) अथवा प्रणोदित (फ़ोर्स्ड)। प्रत्यक्षत: उष्मीय अधिदाब तथा अल्पदाब निचले वायुमंडल के किसी स्थानविशेष के ठंडा या गरम होने से निर्मित होते हैं। गतिक अधिदाब तथा अल्पदाब दोनों ही सामान्य संचार की वायुधाराओं की पारस्परिक यांत्रिक (मिकैनिकल) क्रियाओं के कारण निर्मित होते हैं। प्रत्यक्षत: उष्मीय गौण संचारों में पावस (मानसून) तथा उष्णवलयिक प्रभंजन (हरीकेन) संम्मिलित हैं।

पावससंचार

मानसून शब्द ऋतुसूचक अरबी शब्द से निकला है और आरंभ में अरब समुद्र के उन पवनों के लिए इसका व्यवहार किया जाता था जो लगभग छह महीने उत्तर-पूर्व से और छह महीने दक्षिण-पश्चिम से चलती हैं। अब यह शब्द कुछ अन्य पवनों के लिए भी लागू हो गया है जो वर्ष की विभिन्न दिशाओं में प्रतिकूल दिशाओं से दीर्घकालिक तथा नियमित रूप से चलती हैं। इन पवनों के चलने का प्राथमिक कारण थल तथा समुद्री क्षेत्रों के तापों का ऋतुजनित अंतर है। ये पवन थलसमीर तथा जलसमीर के सदृश ही होते हैं परंतु इनकी अवधि एक दिन के बजाए एक वर्ष की होती है और ये सीमित क्षेत्रों के बजाए बहुत विस्तृत क्षेत्रों पर चलते हैं। मानसून को हिंदी में पावस कहते हैं। भूमध्यरेखा के समीप ताप के ऋतुजनित परिवर्तन सामान्यत: पावस के विकास के लिए बहुत छोटे होते हैं। ऊँचे अक्षांशों में, जहाँ पछुवा पवन चलता है और ध्रुवीय प्रदेशों में, थल और समुद्र के ताप की विभिन्नता से बने वातघट (कविंड कॉम्पोनेंट) पृथ्वीव्यापी पवनसंचारों को केवल थोड़ा सा ही बदलने में समर्थ होते हैं। ऐसी परिस्थिति में पावस के विकास के लिए सबसे अधिक अनुकूल प्रदेश उष्णावलय के समीप मध्य अक्षांशों में होते हैं। स्थल की ओर चलनेवाले पवनों में विद्यमान आर्द्रता की मात्रा का तथा स्थल की रूपरेखा का पावसवर्षा पर अत्यंत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न घटनाओं की उपर्युक्त संगति के कारण पावस का अधिकतम विकास पूर्व तथा दक्षिण एशिया पर होता है और इन प्रदेशों के बहुत से भागों में दक्षिण-पश्चिम से चलनेवाले ग्रीष्म ऋतु के वृष्टिमान पावसपवन जलवायु के महत्वपूर्ण अंग हैं। पावसपरिस्थिति उत्तर आस्ट्रेलिया में, पश्चिमी, दक्षिणी तथा पूर्वी अफ्रीका के भागों में और उत्तरी अफ्रीका तथा चिली के भागों में भी उत्पन्न होती है, परंतु बहुत कम मात्रा में। भारत में पावस अचानक तथा नाटकीय रूप से आता है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण भारतीय व्यापारिक पवनों से होती है। ये जून मास के आरंभ में भूमध्यरेखा के आरपार चलना आरंभ कर देते हैं और मुख्यत: रेखांश 80° पूर्व के तथा लगभग रेखांश 5° उत्तर पर भारत देश की ओर मुड़ जाते हैं। जून मास के मध्य में भारत के पश्चिमी किनारे पर पहुँचकर पावस दक्षिण प्रदेश को पार कर लेता है और फिर भारतवर्ष, बर्मा तथा बंगाल की खाड़ी के सब भागों में पहुँच जाता है। दक्षिण प्रदेश के दक्षिणी भागों के अतिरिक्त, जहाँ पश्चिमी घाटों की पहाड़ियों की आड़ के कारण ये पवन पहुँच नहीं पाते, मानसून काल में भारत के सब भागों में भारी वर्षा होती है। यह वर्षा लगभग पूर्णतया संवहनीय (कनवेक्टिव) होती है। इसकी प्रगति के लिए मुख्यत: भूतल की तपन तथा उसकी ऊँचाई से वाष्प का जल में रूपांतरित होना नियंत्रित होता है। भूमितल की उठान का प्रभाव पश्चिमी घाटों में, खासी की पहाड़ियों में, अराकान की चोटियों में तथा हिमालय पर्वत पर भली भाँति दिखाई पड़ता है। इन भागों में अत्यधिक वर्षा होती है। कभी कभी गंगाघाटी की द्रोणी में बहुत देर तक विस्तृत वर्षा होती रहती है। यह लगातार वर्षा प्राय: उन उथले अवदाबों के कारण होती है जो मुख्य पावसी अल्पदाब की ओर पश्चिम दिशा में मंद गति से चलती हैं। भारतीय पावस की शक्ति बहुत घटती बढ़ती रहती है। जब पावस तीव्र होता है तो भारत के अधिकतम भागों में वर्षा औसत से बहुत अधिक हो जाती है और जब पावस हल्का होता है तो वर्षा न्यून होती है। पावस का उत्तर की ओर बढ़ना हिमालय पहाड़ के कारण सीमित हो जाता है, परंतु पावस का प्रवाह बर्मा, थाइलैंड, इंडोचीन तथा दक्षिण चीन में बहुत प्रविच्छिन्न रहता है। इस प्रायद्वीप के अक्ष के निकट स्थित ऊँची पहाड़ियाँ (जो भारत-यूनन-वायुमार्ग पर कूबड़ के नाम से कुख्यात है) घने संवहन बादलों से ढकी रहती हैं और यहाँ बहुधा वर्षा होती रहती है। पावस के आरंभकाल में वर्षा की मात्रा और बारंबारता में भारी उत्तार चढ़ाव होते रहते हैं जो भारतीय कृषक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इस देश में सांख्यिकीय दीर्घपरास ऋतु पूर्वानुमान (स्टैटिस्टिकल लॉङरेंज फ़ोरकास्टिंग) के विकास की ओर अधिक ध्यान दिया गया है और सांख्यिकीय रीतियों का भारतीय पावस के अल्पकालिक परिवर्तनों के संबंध में उपयोग किया जा रहा है। भारत में इस प्रकार से किए हुए ऋतु विषयक पूर्वानुमान हाल के वर्षो में पर्याप्त रूप से ठीक सिद्ध हुए हैं।

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