ज्यामितीय प्रकाशिकी भाग -1

प्रकाशिकी ज्यामितीय (Geometrical Optics) प्रकाशिकी का वह भाग है जो प्रकाश को ‘किरण’ जैसा मानकर उसकी गति का अध्ययन किया जाता है। इसलिये इसे ‘किरण प्रकाशिकी’ (ray optics) भी कहते हैं। किरण प्रकाशिकी की मान्यता के अनुसार जब तक समांगी माध्यम में प्रकाश गति करता है तब तक उसका मार्ग सीधी रेखा में होता है। जहाँ पर दो माध्यम मिलते हैं, वहाँ प्रकाश किरणे मुड़ जाती हैं (किरणे दो भागों में बंट भी सकतीं हैं।)
वस्तुतः प्रकाशिकी का बड़ी सीमा तक सरलीकरण ही ज्यामितीय प्रकाशिकी है। ज्यामितीय प्रकाशिकी के अन्तर्गत प्रकाश के विवर्तन और व्यतिकरण की कोई व्याख्या नहीं दी जा सकती। किन्तु ज्यामितीय प्रकाशिकी छबियों के निर्माण एवं प्रकाशिक विपथम (optical aberrations) आदि की व्याख्या करने में सक्षम है। दूसरे शब्दों में, ज्यामितीय प्रकाशिकी के द्वारा परिणाम तब तक शुद्ध आते हैं जब तक वस्तुओं का आकार प्रकाश के तरंगदैर्घ्य की तुलना में काफी बड़ा हो।

परिचय
ज्यामितीय प्रकाशिकी, प्रकाशिकी का वह अंग है जिसमें प्रकाश की किरणों की ज्यामिति तथा प्रकाशकीय तंत्र (optical system) द्वारा प्रतिबिंब-निर्माण-प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इसमें प्रकाशीय उपकरणों (optical instruments) के गुणों तथा उन लेंस|लेंसों]], दर्पणों एवं समपार्श्वो (प्रिज्म) का विवरण सन्निहित होता है जिनके द्वारा प्रकाशीय उपकरणों की रचना होती है।
यह सुज्ञात तथ्य है कि प्रकाश की किरणें सरल रेखा में गमन करती हैं। उनके इस गुण को प्रकाश का ऋजुरेखीय संचरण (rectilinear propagation of light) कहते हैं। जिस पदार्थ से होकर प्रकाश की किरणें गुजरती हैं, उसे ‘माध्यम’ (medium) कहते हैं। जब प्रकाश की किरणें किसी माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम में पहुँचती हैं तो तीन क्रियाएँ होती हैं :
(1) प्रकाश की किरणों का कुछ, या अधिक, भाग दोनों माध्यमों के विभाजक तल से पहले ही माध्यम में वापस लौटा दिया जाता है। इस क्रिया का परावर्तन (Reflection) कहते हैं।
(2) प्रकाश की किरणों का कुछ भाग विभाजक तल पर अवशोषित हो जाता है। और
(3) प्रकाश की किरणों का शेष भाग दूसरे माध्यम में चला जाता है। इस क्रिया को अपवर्तन (refraction) कहते हैं।
ज्यामितीय प्रकाशिकी के अभिगृहीत (axioms)
ज्यामितीय प्रकाशिकी कुछ सरल मान्यताओं (नियमों) पर आधारित है। वे हैं –
(1) समांग माध्यम में प्रकाश की किरणें सरल रेखा में चलतीं हैं।
(2) प्रकाश किरणों के स्वतंत्र वितरण का नियम
(3) परावर्तन का नियम
(4) अपवर्तन का नियम (स्नेल का नियम)
(5) प्रकशपुंज (light beam) की उत्क्रमगति का नियम – इसके अनुसार, किसी प्रकाश पुंज की गति को, उसकी आगे की तरफ की गति के ठीक विपरीत दिशा में गति करते हुए भी माना जाता है।
परावर्तन और अपवर्तन प्रक्रिया के समय प्रकाश की किरणें कुछ नियमों का पालन करती हैं।

परावर्तन
परावर्तन संबंधी नियम निम्नलिखित है :

  1. आपाती किरण, विभाजक तल में आपतन बिंदु पर डाला गया अभिलंब एवं परावर्तित किरण, तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं
  2. आपाती एवं परावर्तित किरणें अभिलंब के परस्पर विपरीत ओर स्थित होती हैं और
  3. आपतन एवं परावर्तन कोण परस्पर बराबर होते हैं।<i=<r
    अपवर्तन
    अपवर्तन संबंधी नियम निम्नलिखित हैं :
  4. आपाती किरण, विभाजक तल में आपतन बिंदु पर डाला गया अभिलंब एवं अपवर्तित किरण, तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।
  5. आपाती एवं अपवर्तित किरणें अभिलंब के परस्पर विपरीत ओर स्थित होती हैं। और
  6. आपतन एवं अपवर्तन कोणों की ज्याओं (sines) में एक स्थिर अनुपात होता है। इस अनुपात को ग्रीक अक्षर म्यू (m) द्वारा व्यक्त किया जाता है और इसे पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक कहा जाता है।
    पूर्ण आन्तरिक परावर्तन
    भारतकोश प्रांगण भारतकोश सम्पादकीय कॅलण्डर प्रश्नोत्तरी पूर्ण आन्तरिक परावर्तन पूर्ण आन्तरिक परावर्तन पूर्ण आन्तरिक परावर्तन (अंग्रेज़ी: Total Internal Reflection) एक प्रकाशीय परिघटना है। प्रकाश हमेशा ही एक माध्यम से प्रकाशीय रूप से सघन माध्यम में जा सकता है, लेकिन यह विरल माध्यम में हमेशा नहीं जा सकता। जब प्रकाश किरणें सघन माध्यम से विरल माध्यम के पृष्ठ पर आपतित हो रही हों और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो, तब प्रकाश का अपवर्तन नहीं होता, बल्कि संपूर्ण प्रकाश परावर्तित होकर उसी माध्यम में लौट जाता है। इस घटना को ‘पूर्ण आन्तरिक परावर्तन’ कहते हैं। पूर्ण आन्तरिक परावर्तन का एक उपयोगी प्रयोग ऑप्टिकल फाइबर में किया जाता है। प्रकाशीय तन्तुओं का कार्य पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के सिद्धान्त पर ही आधारित है।

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