भूराजनैतिक अवधारणाएँ एवं मूल तत्व

भूराजनीति में चिंतन पद्वत्ति का विशेष महत्व है। समस्त विश्व को एक इकाई मानकर देशों के व्यवहार पर निष्कर्षात्मक वक्तव्य रखना, एक जटिल प्रक्रिया है। यहाँ यह बताना उपयोगी होगा कि भूराजनीति का चरम उद्देश्य राष्ट्र-जीवन की आवश्यक शर्तों की अनुपालना हेतु संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना है। इस पृष्ठभूमि के संदर्भ में विभिन्न भूराजनैतिक अवधारणाओं की समालोचना की जानी चाहिए।
सर् हॉलफोर्ड जॉन मैकिन्डर की १९०४ की संकल्पना द जियॉग्राफिकल पॉइवट ऑफ हिस्टरी एक ऐसी ही अतुलनीय कृति है। इसके मूल में यह निहित है कि चुँकि पृथ्वी के भूपटल पर महाद्वीपों की आकृति-विस्तार व उससे प्रभावित विभिन्न राष्ट्रीय समुदायों के वितरण का ऐतिहासिक बोध, उनके परस्पर स्थानिक व देशीय संबंधों की व्याख्या करने में सक्षम है। अतः भविष्य में भी इन कारकों का राष्ट्रों के मध्य संबंधों पर असर पङेगा। ऐसी ही एक मूलाकृति है, हृदयस्थल या हार्टलैण्ड।
हार्टलैण्ड संकल्पना के अनुसार समुद्री जलमार्गों के व्यापार के प्रयोग से यूरोप-एशिया महाद्वीप के क्षितिज भाग परस्पर संपर्क में आ गए। ये तटीय क्षेत्र मध्य भाग की पारंपरिक व्यवस्था के विकल्प में उभरे। पारंपरिक व्यवस्था से अभिप्राय है, व्यापार का परंपरागत थल मार्गों से कारवाँ के माध्यम से किया जाना। मैकिण्डर के अनुसार इतिहास में कुछ वृहत्तर प्रक्रम हैं, जो कि सामान्य ऐतिहासिक प्रबोध से परे हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक प्रक्रम था, यूरोप में राष्ट्र-राज्यों की उत्पत्ति।
मैकिण्डर के अनुसार, यूरोप का उद्भव, एशियाई आक्रांताओं के निरंतर झंझावातों से उत्पन्न चेतना का परिणाम है। हूणों के क्रूर आक्रमणों ने यूरोप को एशियाई सत्ता व आकार के प्रति सावचेत किया। यही नहीं, अपितु, पूर्वी यूरोप के जातीय ढाँचे में इसके चलते जो परिवर्तन आए, वे एक प्रतिरोधक के रूप में स्थापित हो गए।
यह चिंतन एक विशिष्ट संबंध की व्याख्या करता है। महाद्वीपीय एकांगिकता का बोध महासागरीय प्लवन के माध्यम से ही संभव हो सका है। अतः मैकिण्डर के चिंतन में द्वंद दिखाई देता है।

भूराजनीति एवं भौगोलिक संसाधन

भूराजनीति का एक महत्वपूर्ण अंग भौगोलिक संसाधनों की स्वामित्वता है। यह स्वामित्व सामरिक संसाधनों के क्षेत्र में अत्यंत इच्छित है। उर्जा संसाधन एक ऐसे ही चिह्नित क्षेत्र है।

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