वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसें, जानिए आप भी

ग्रीनहाउस प्रभाव की खोज 1824 में जोसेफ फोरियर द्वारा की गई थी तथा 1896 में पहली बार स्वेन्‍टी आरहेनेस (Svante Arrhenius) द्वारा इसकी मात्रात्मक जांच की गई थी। यह प्रक्रिया द्वारा जो अवशोषण (absorption) और उत्सर्जन के अवरक्त विकिरण द्वारा वातावरण में गर्म गैसें वातावरण में एक और ग्रह की सतह कम है।

ग्रीनहाउस प्रभाव के रूप में अस्तित्व इस प्रकार विवादित नहीं है। स्वाभाविक रूप से ग्रीन हाउस गैसों के पास होने का मतलब है एक गर्मी के प्रभाव के बारे में 33 डिग्री सेल्सियस (59 °F), जो पृथ्वी पर रहने योग्य नहीं होंगे। .पृथ्वी पर महत्वपूर्ण ग्रीन्हौसे गैसें हैं, जल-वाष्प (water vapor), जो कि 36–70 प्रतिशत तक greenhouse प्रभाव पैदा करता है (बादल इसमे शामिल नही हैं (not including clouds)) ; carbon dioxide (CO2) जो 9-26 प्रतिशत तक greenhouse प्रभाव पैदा करता है; methane (methane) (CH4) 4-9 प्रतिशत तक और ozone, जो 3-7 प्रतिशत तक प्रभाव पैदा करती है I मुद्दा यह है कि मानवीय गतिविधियों से जब कुछ ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय सांद्रता बढ़ती है तब ग्रीनहाउस प्रभाव की शक्ति कैसे परिवर्तित होती है।
औद्योगिक क्रांति के बाद से मानवी गतिविधि में वृद्धि हुई है जिसके कारण ग्रीन हाउस गैसों कि मात्रा में बहुत जियादा वृद्धि हुई है, इसके कारण विकरणशील बाध्य (radiative forcing) CO से2, मीथेन (methane), tropospheric ओजोन, सीएफसी (CFC) और s nitrous भी बहुत बढ़ गए हैं (nitrous oxide)Iअगर अणु (Molecule) कि दृष्टि से देखें तो मीथेन ग्रीनहाउस गैसcarbon dioxide की तुलना में अधिक प्रभावी है, पर उसकी सांद्रता इतनी कम है कि उसका विकरणशील ज़ोर (radiative forcing) कार्बन डाइऑक्‍साइड कि तुलना में केवल एक चौथाई है प्राक़तिक रूप से उत्पन्न होने वाली कुछ दूसरी गैसे ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान देती हैं। इन्‍में से एक नाइट्रस ऑक्साइड (nitrous oxide) (N2O) कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण अपना विकास कर रही है!CO2 और CH4 की वातावरण सांद्रता (atmospheric concentrations) 1700 वीं सदी के मध्‍य में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से क्रमशः 31% और 149% बढ़ गई है। पिछले 650,000 वर्षों के दौरान किसी भी समय से इन स्तरों को काफी अधिक माना जा रहा है। यह वह अवधि है जिसके लिए विश्वसनीय आंकड़े आइस कोर् (ice core)s. से निकाले गए हैं। कम प्रत्यक्ष भूवैज्ञानिक प्रमाण से यह माना जाता है कि CO2 की इतनी ज्यादा मात्रा पिछली बार 20 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। जीवाश्‍म ईंधन (Fossil fuel) के जलने से पिछले 20 वर्षों में मानवीय गतिविधियों से CO2 में हुई बढोतरी में कम से कम एक तिहाई वृद्धि है। शेष कार्य भूमि के उपयोग में परिवर्तन के कारण से होता है विशेषकर वनों की कटाई से ऐसा होता है। (deforestation)CO2 की वर्तमान वासयुमंडलीय सांद्रता आयतन की दृष्टि से लगभग 385 प्रति दस लाख ( (ppm) पीपीएम) है। भविष्य में CO2 का स्तर ज्यादा होने कि आशंका है क्यूंकि जीवाश्म ईंधन और भूमि के उपयोग में काफ़ी परिवर्तन आ रहे हैं वृद्धि क दर अनिश्चित आर्थिक, सामाजिक (sociological), तकनीकी और प्राकृतिक घटनाओं पर निर्भर करेगी पर शायद आखिरकार जीवाश्म ईंधन की उपलब्धता ही निर्णायक साबित हो आईपीसीसी की उत्सर्जन परिदृश्‍यों पर विशेष रिपोर्ट (Special Report on Emissions Scenarios) भविष्य के कई CO2 परिदृश्‍यो के बारे में बताती है जो 2100 के आख़िर तक 541 से लेकर 970 पीपीएम तक हो सकते हैं। इस स्तर तक पहुंचने के लिए तथा 2100 के बाद भी उत्सर्जन जारी रखने के लिए जीवाश्म ईंधन के पर्याप्त भंडार हैं, यदि कोयला (coal), बालू रेत (tar sands) या मीथेन क्लेथ्‍रेट (methane clathrate) का व्यापक प्रयोग किया जाता है।

प्रतिक्रिया

जलवायु पर बाध्‍क घटकों के प्रभाव विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा जटिल हो जाते हैं।
सर्वाधिक स्पष्ट प्रत्युत्तरों में से एक का संबंध जल के वाष्पीकरण से है। कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी दीर्घकालीन ग्रीनहाउस प्रभाव वाली गैसों के मिलने से पैदा होने वाली गर्मी वायुमंडल में जल के अधिक मात्रा में वाष्‍पीकरण का कारण बनता है। क्यूंकि जल-वाष्प ख़ुद एक ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए इससे वातावरण और भी ज्यादा गर्म हो जाता है और इससे और बी ज्यादा पानी वाष्प में बदलता है (क सकारात्मक प्रतिक्रिया (positive feedback)) और यह प्रतिक्रिया चलती रहती है जबतक कि प्रतिक्रिया चक्र पर रोक न लग जाए.अकेले कार्बन डाई आक्साइड से होने वाले इसका प्रभाव बहुत विशाल होगा। यद्यपि प्रत्युत्तर की यह प्रक्रिया वायु की नमी के कणों में बढोतरी करती है, तब भी सापेक्ष आर्द्रता (relative humidity) या तो स्थिर रहती है या थोड़ी सी घट जाती है क्योंकि वायु गर्म हो जाती है। प्रत्युत्तर का यह प्रभाव केवल धीरे धीरे ही उल्टा हो सकता है क्योंकि कार्बन डाई आक्साइड में दीर्घकालीन वायुमंडलीय जीवनावधि (atmospheric lifetime) होती है।
बादलों से प्रभावित होने वाले प्रत्युत्तर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। नीचे से देखा है, बादल को वापस उत्सर्जन अवरक्त विकिरण की सतह और एक इतनी गर्मी प्रभाव डालती है, ऊपर से देखा है, बादल और सूर्य के प्रकाश उत्सर्जन अवरक्त विकिरण प्रतिबिंबित करने के लिए जगह है और इसलिए एक शीतलन प्रभाव डालती है। शुद्ध प्रभाव क्या गर्म अथवा ठंडा है यह बादल की किस्म (type) और उंचाई जैसे विवरणों पर निर्भर करता है। जलवायु के प्रतिमानों पर इन विवरणों को प्रदर्शित करना कठिन होता है क्योंकि जलवायु प्रतिमानों के संगणक खानों पर रिक्त स्थानों के बिंदुओं के बीच की तुलना में बादल बहुत छोटे होते हैं।
जैसे जैसे वायुमंडल गर्म होता जाता है वैसे वैसे परामर्शी प्रत्युत्तर की प्रक्रिया चूक दर (lapse rate) में परिवर्तन से संबंधित होती है।क्षोभमंडल (troposphere) उंचाई में बढोतरी होने के साथ-साथ वायुमंडल का तापमान घटता जाता है। अवरक्त विकिरण का उत्सर्जन तापमान की चौथी शक्ति पर निर्भर करता है, वातावरण की उपरी तह से ज्यादा लम्बी विकिरण (longwave radiation) उत्सर्जित होती है और निचली तह से यह कम होती है। ज्यादातर विकिरण जो उपरी वातावरण से उत्सर्जित होती है खला में चली जाती है, जबकि निचले वातावरण से उत्सर्जित होने वाली विकिरण दोबारा वतावारव द्वारा सोख ली जाती है। इस प्रकार, ग्रीन हाउस प्रभाव वातावरण में तापमान के ऊंचाई के साथ कम होने की रफ़्तार पे निर्भर करता है, अगर तापमान की दर कम है तो ग्रीन हाउस असर ज्यादा होगा और अगर तापमान गिरने की दर कम है तो ग्रीन हाउस असर कम होगा। सिद्धांत और मॉडल दोनों यह संकेत करते हैं कि वार्मिंग से ऊंचाई के साथ तापमान का गिरना कम हो जाएगा, जिससे एक नकारात्मक lapse rate feedback पैदा हो जाएगा और इससे ग्रीन हाउस असर कमज़ोर होगा। ऊंचाई के साथ तापमान परिवर्तन की दर का मापन छोटी-छोटी त्रुटियों के प्रति बहुत सवेंदेंशील होता है, इससे यह पता करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि मॉडल हकीकत से मेल खाता है के नहीं
एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है आइस’अल्बेडो प्रत्युत्तर जब वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है, तब ध्रुवों के पास बर्फ तेज दर से पिघलने लगती है। जैसे जैसे बर्फ पिघलती है वैसे वैसे भूमि अथवा खुला जल उसका स्‍थ्‍स्थान ले लेता है। भूमि और जल दोनों ही बर्फ की तुलना में कम परावर्तक होते हैं और इसीलिए सौर विकिरण को अधिक मात्रा में सोख लेते हैं। इससे अधिक गर्मी हो जाती है जिसके कारण और अधिक बर्फ पिघलने लगती है तथा यह चक्र चलता रहता है।
सकरामातक पुननिर्वेशन (Positive feedback) जो की CO2 और CH4 के उत्सर्जन के कारण होता है एक अन्य कारण है जो वार्मिंग को बढाता है। यह गैसें जमते हुए पेर्मफ्रोस्त (permafrost) जैसे की जमा हुई लकड़ी (peat), siberia (bog) में दलदल (Siberia) से पैदा होती हैं। इसी तरह मीथेन clathrate (methane clathrate), जो की महासागरों में पाया जाता है, से जो भारी मात्रा में CH4 निकलती है, वार्मिंग का एक मुख्य कारण हो सकती है, जैसा की clathrate gun hypothesis (clathrate gun hypothesis) कहता है।

सौर परिवर्तन

कुछ कागजात सुझाव देते हैं कि सूर्य के योगदान का कम आकलन किया गया है। Duke University (Duke University) के दो शोधकर्ताओं, Bruce West और Nicola Scafetta ने यह अनुमान लगाया है कि सूर्य ने 1900-2000 तक शायद 45-50 प्रतिशत तक तापमान बढ़ाने में योगदान दिया है और 1980 और 2000 के बीच में लगभग 25-35 प्रतिशत तक तापमान बढाया है। पीटर स्कॉट और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा पता चला है जलवायु मॉडल ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को जिआदा आंकते हैं और सोलर फोर्सिंग को जिअदा महत्व नहीं देते, वे यह भी सुझाव देते हैं ज्वालामुखी धूल और सुल्फाते एरोसोल्स ओ भी कम आँका गया है फिर भी वे मानते हैं कि सोलर फोर्सिंग होने के बावजूद, जिअदातर वार्मिंग ग्रीन हाउस गैसों के कारण होने की संभावना है, ख़ास कर के 20 वीं सदी के मध्य से लेकर .
एक अनुमान यह है कि अलग अलग अलग रूपों में सौर निर्गम (solar output), जो की बादलों के बंनने से, जो की गालाक्टिक ब्रह्मांडीय किरणों (galactic cosmic ray) द्वारा बनते हैं, ने भी हाल की वार्मिंग में हिस्सेदारी की है। यह भी सुझाव दिया गया है कि सूर्य में जो चुंबकीय गतिविधि है वह भी ब्रह्मांडीय किरणों को प्रवर्तित करती है जिससे बादलों के संघनन नाभिक प्रभावित होते हैं और जलवायु भी प्रभावित होती है।

तापमान में परिवर्तन

वाद्य तापमान रिकार्ड (instrumental temperature record) के अनुसार पृथ्वी का तापमान, चाहे वो ज़मीन पर हो या समुद्र में, 1860-1900 के मुकाबले बढ़ा है यह तापमान में वृद्धि शहरी गर्मी द्वीप (urban heat island) प्रभाव से प्रभावित नहीं होता 1079 से, ज़मीन का तापमान समुद्र के तापमान के मुकाबले लगभग दुगना बड़ा है (0.25 °C प्रति दशक बनिस्पत 0.13 °क प्रति दशक) निचले त्रोपोस्फेरे (troposphere) में तापमान 0.12 और 0.22 °C (0.22 और 0.4 °F) के बीच में प्रति दशक बड़ा है, जैसा की उपग्रह के आंकडे बताते हैं . (satellite temperature measurements) यह माना जाता है कि 1850 से पहले पिछले एक या दो हज़ार सालों (one or two thousand years) से तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, कुछ क्षेत्रीये उतार -चडाव जैसे की मध्यकालीन गर्म काल (Medieval Warm Period) या अल्प बर्फीला युग (Little Ice Age)
समुद्र में तापमान ज़मीन के मुकाबले धीरे बड़ते हैं क्यूंकि महासागरों की अधिक heat कैपसिटी अधिक होती है और वे वाष्पीकरण से जिआदा गर्मी खो सकते हैं उतरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में ज़मीन जिआदा है इसलिए वह दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) की तुलना में जल्दी गर्म होता है उतरी गोलार्ध में मौसमी बर्फ और समुद्री बर्फ के व्यापक इलाके हैं जो की ice-albedo फीडबैक पर निर्भर करते हैं उतरी गोलार्ध में दक्षिणी गोलार्ध के मुकाबले अधिक ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित की जाती हैं, पर यह गर्मी में अन्तर के लिए जिम्मेदार नहीं है क्यूंकि प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें काफ़ी समय तक रहती हैं और दोनों गोलार्धो में अच्छी तरह घुल-मिल जाती हैं
NASA’s गोद्दर्द अन्तरिक्ष अध्ययन संस्थान (Goddard Institute for Space Studies), के अनुमानों पर आधारित, 2005 सबसे गर्म साल था, जबसे मापन के साधन 1800 के अंत में उपलब्ध हुए तब से, 1998 के रिकॉर्ड को इसने एक डिग्री के कुछ सौवें भाग से तोडा विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization) और जलवायु अनुसंधान एकक (Climatic Research Unit) द्वारा तैयार किए गए अंदाजों से निष्कर्ष निकाला गया की 2005, 1998 के बाद दूसरा सबसे जिआदा गर्म साल था 1998 में तापमान असामान्य रूप से जिआदा इसलिए था क्यूंकि उस साल अल Niño के दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation) घटित हुए थे
Anthropogenic उत्सर्जन के अन्य प्रदूषक -विशेषकर सल्फेट एरोसोल (aerosol) स-ठंडा करने वाला प्रभाव डालते हैं क्यूंकि यह आती हुई सूर्य की रौशनी को प्रतिबिंबित कर देते हैं यह एक आंशिक कारण है उस शीतलन का जो बीसवी सदी के मध्य में पाया गया हालांकि प्रा‍कृतिक परिवर्तनशीलता के कारण भी ठंडापन हो सकता है।जेम्स Hansen (James Hansen) और उनके सहयोगियों ने प्रस्ताव रखा है कि जीवाश्म ईंधन के जलने से जो पदार्थ निकलते हैं -CO2 और एरोसोल्स ने एक दूसरे प्रभाव को खत्म कर दिया है, इसलिए गर्मी जिआदातर गैर CO2 ग्रीनहाउस गैसों के कारण ही है।

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