बन्दी प्रत्यक्षीकरण भाग – 2

स्कॉटलैंड का दृष्टिकोण
स्कॉटलैंड की संसद ने 1701 में बंदी प्रत्यक्षीकरण के समान ही प्रभाव वाले कानून को पारित किया, अन्यायपूर्ण कैद को रोकने और अभियोग में अनुचित देरी के खिलाफ अधिनियम, जिसे अब Criminal Procedure Act 1701 c.6 के रूप में जाना जाता है (संविधि क़ानून संशोधन (स्कॉटलैंड) अधिनियम 1964 द्वारा लघु शीर्षक दिए जाने के लिए) यह अधिनियम अभी भी सक्रिय है, हालांकि कुछ भागों को निरस्त कर दिया गया है।
ऑस्ट्रेलिया
प्रक्रियात्मक उपाय के रूप में बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रादेश ऑस्ट्रेलिया द्वारा ग्रहण किये गए अंग्रेज़ी क़ानून का एक हिस्सा है।
2005 में, ऑस्ट्रेलियाई संसद ने ऑस्ट्रेलियाई आतंकवाद विरोधी अधिनियम 2005 पारित किया। कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने, इसके द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण को सीमित किये जाने के कारण इस अधिनियम की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किये.
कनाडा
बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिकार कनाडा द्वारा विरासत में मिली ब्रिटिश कौमन लॉ परंपरा का हिस्सा है। चार्टर ऑफ़ राइट्स एंड फ्रीडम के खंड दस के माध्यम से संविधान अधिनियम 1982 में समाहित किये जाने से पूर्व वे मुकदमे क़ानून में अस्तित्व में थे।
प्रत्येक व्यक्ति के पास गिरफ्तारी या हिरासत सम्बंधी अधिकार है।..c) बंदी प्रत्यक्षीकरण के तहत निर्धारित हिरासत की वैधता जानने के लिए और हिरासत के अवैध होने पर मुक्त होने के लिए.
कनाडा के इतिहास में प्रादेश निरस्तीकरण प्रख्यात रूप से अक्टूबर संकट के दौरान दिखा, जिस दौरान क्युबेक सरकार के निवेदन पर प्रधानमंत्री पिअर ट्रुडेवु द्वारा वॉर मेज़र ऐक्ट लागू किया गया। इस अधिनियम का प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन, स्लाविक और यूक्रेनी कनाडियाई नजरबन्दी और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी कनाडियाई नजरबन्दी को न्यायसंगत बनाने के लिए किया गया। दोनों नजरबन्दीयों को अंततः संसद के अधिनियमों के द्वारा ऐतिहासिक गलतियों के रूप में पहचान मिली.
भारत
भारतीय न्यायपालिका ने मुकदमों की एक शृंखला में बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रादेश का केवल उन व्यक्तियों को रिहा करने के लिए प्रभावी ढंग से सहारा लिया जो अवैध रूप से हिरासत में लिए गए थे।
भारतीय न्यायपालिका ने लोकस स्टैंडी के पारंपरिक सिद्धांत को त्याग दिया. यदि हिरासत में रह रहा व्यक्ति एक याचिका दायर कर पाने की स्थिति में नहीं है, तो याचिका को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसकी ओर से दायर किया जा सकता है। बन्दी राहत का पैमाना, भारतीय न्यायपालिका की कार्रवाइयों से हाल ही में विस्तृत हुआ है। बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रादेश का प्रयोग राजन आपराधिक मामले में किया गया था।
आयरलैंड
आयरलैंड में बंदी प्रत्यक्षीकरण के सिद्धांत की आयरिश संविधान की धारा 4, अनुच्छेद 40, द्वारा गारंटी दी गई है। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की गारंटी देता है और वास्तव में बिना लैटिन शब्द का उल्लेख किए, एक विस्तृत बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार करता है। हालांकि, इसमें यह भी उल्लिखित है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण सुरक्षा बलों के लिए युद्ध की स्थिति में या सशस्त्र विद्रोह के दौरान बाध्यकारी नहीं है।
राज्य ने बंदी प्रत्यक्षीकरण को सामान्य कानून के भाग के रूप में विरासत में पाया जब 1922 में यह ब्रिटेन से अलग हुआ, परन्तु इसके सिद्धांत की, 1922 से 1937 तक प्रभावी रहे आयरिश मुक्त राज्य के संविधान के अनुछेद 6 द्वारा भी गारंटी दी गई थी। एक ऐसे ही प्रावधान को तब शामिल किया गया था जब 1937 में वर्तमान संविधान को अपनाया गया। उस तारीख के बाद से बंदी प्रत्यक्षीकरण को दो संवैधानिक संशोधन द्वारा प्रतिबंधित किया गया है, 1941 में दूसरा संशोधन और 1996 में सोलहवां संशोधन.
दूसरे संशोधन से पहले, हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति का यह संवैधानिक अधिकार होता था कि वह हाई कोर्ट के न्यायाधीश के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए प्रादेश दायर करे और जितने चाहे उतने हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के समक्ष करे. द्वितीय संशोधन के बाद से, एक कैदी केवल एक ही न्यायाधीश के समक्ष दरख्वास्त कर सकता था और, एक बार एक प्रादेश के जारी हो जाने पर, हाई कोर्ट के अध्यक्ष को न्यायाधीश या तीन न्यायाधीशों के पैनल को चुनने का अधिकार था जो मामले का फैसला करते. इस संशोधन मे एक और आवश्यकता भी जोड़ी गई जो थी जब एक उच्च न्यायालय को यह विश्वास हो कि किसी व्यक्ति का हिरासत में रखा जाना कानून की असंवैधानिकता के कारण अवैध है, तब उसे यह मामला आयरिश सुप्रीम कोर्ट को भेज देना चाहिए और हो सकता है कि वह उस व्यक्ति को ज़मानत पर छोड़ दे जो केवल अंतरिम हो.
1965 में, सुप्रीम कोर्ट ने ओ’कैलघन मामले में यह माना कि संविधान के प्रावधानों का मतलब है कि एक व्यक्ति जिस पर एक अपराध का आरोप लगाया गया है, को जमानत से इनकार केवल तभी किया जा सकता है जब उसके फरार होने की या गवाहों या सबूत के साथ छेड़-छाड़ करने की आशंका हो. सोलहवें संशोधन के बाद से, एक अदालत के लिए इस बात को ध्यान में रखना संभव हो गया है कि क्या एक व्यक्ति ने अतीत में जमानत पर रिहा होने पर गंभीर अपराध किए हैं।

इज़रायल
1967 के बाद से, इजरायली सेना द्वारा प्रशासित वेसट बैंक के क्षेत्रों में, सैन्य आदेश 378 फिलीस्तीनी कैदियों की न्यायिक समीक्षा अभिगम का आधार है। इसमें वारंट के बगैर गिरफ्तारी करने और बाद में अदालत की सुनवाई से पहले अधिक से अधिक 18 दिन तक की हिरासत में रखने की अनुमति है। अप्रैल 1982 में, चीफ ऑफ़ स्टाफ, राफेल इटन के कार्यालय ने एक दस्तावेज़ जारी किया जिसकी नीति के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के तुरंत बाद पुनः-गिरफ्तार करते है।
“जब आवश्यक हो, कानूनी उपायों का उपयोग करे जिससे कानून में निर्धारित अवधि तक पूछताछ के लिए गिरफ्तार करने और फिर एक या दो दिन के लिए आज़ाद करने के बाद पुनः गिरफ्तार करने में सक्षमता होती है।”
इजराइली सैनिक हिब्रू शब्द टेरचर का इस्तेमाल उस नई नीति का वर्णन करने के लिए करते थे जिसमें इस प्रथा की सिफारिश की गई थी।
इजरायल की सुरक्षा सेवाओं के “मेथड्स ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन” में 1987 लैंडो आयोग ने यह प्रस्ताव दिया कि जिस अवधि तक एक कैदी को बिना न्यायिक पर्यवेक्षण के कैद में रखा जाना चाहिए उसे घटा कर आठ दिन का किया जाए. सैन्य न्याय प्रणाली पर, 1991 के अपने रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह उल्लेख किया “कि बिना न्यायिक पर्यवेक्षण के हिरासत में रखे जाने की प्रस्तावित आठ दिन की अधिकतम अवधि भी इजरायली कानून की तुलना में सुरक्षा प्रदान कर पाने में बहुत कम है। यह न्यायिक उपयोग के अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ असंगत भी है।”
एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा 1991 की एक रिपोर्ट के अनुसार सैन्य आदेश संख्या 378 का अनुच्छेद 78 (a) से (e) सैनिकों को अधिकार देता है “कि वे किसी भी व्यक्ति जो सुरक्षा अपराध के मामले में संदिग्ध हो, को बिना एक वारंट के गिरफ्तार कर सके और 96 घंटे के लिए हिरासत में ले सके. इस के बाद, बंदी को प्रथम बार एक न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता से पहले पुलिस अधिकारियों द्वारा दो बार सात-दिन की वृद्धि की जा सकती है।” रिपोर्ट के नुसार इज़राइल और पूर्वी जेरूसलम में कानून यह है कि एक व्यक्ति को “एक न्यायाधीश के समक्ष यथा शीघ्र प्रस्तुत किया जाना चाहिए, परन्तु उसकी गिरफ्तारी के 48 घंटों के बाद नहीं.” विशेष स्थितियों में 48 घंटे की एक अधिकतम वृद्धि की अनुमति दी गई है।
मलेशिया
मलेशिया में, बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार, नाम का छोटा रूप, संघीय संविधान में निहित है। अनुच्छेद 5 (2) उल्लेख करता है कि “जहां उच्च न्यायालय या उसके किसी न्यायाधीश से शिकायत की जाती है कि एक व्यक्ति को अन्यायपूर्ण तरीके से हिरासत में रखा गया, न्यायालय उस शिकायत की जांच करेगा और, जब तक वह संतुष्ट नहीं हो जाएगा कि उसका हिरासत में लिया जाना न्यायसंगत है, उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाने और रिहा कर दिए जाने का आदेश देगा.”
जैसा कि यहां कई संविधियां हैं, उदाहरण के लिए, आंतरिक सुरक्षा अधिनियम 1960, जो अभी भी जांच के बिना हिरासत में रखने की अनुमति देता है, यह प्रक्रिया आम तौर पर केवल ऐसे मामलों में प्रभावी होती है जब केवल यह दिखाया जा सके कि हिरासत में लिए जाने के आदेश के तरीके में कोई त्रुटि थी।
न्यूजीलैंड
जबकि आम तौर पर बंदी प्रत्यक्षीकरण सरकार पर प्रयोग किया जाता है, यह व्यक्तियों पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 2006 में, अभिरक्षा विवाद के पश्चात एक बच्चे का उसके नाना ने कथित तौर पर अपहरण कर लिया। बच्चे के पिता ने, मां, नाना, नानी, पर नानी और एक अन्य व्यक्ति जिसने कथित तौर पर बच्चे के अपहरण में सहायता की थी, के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण दायर कर दिया गया। मां ने बच्चे को अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं किया और अदालत की अवमानना करने के लिए गिरफ्तार कर ली गई। उसे उस वक्त रिहा किया गया जब बच्चे के नाना ने उसे जनवरी 2007 के उतरार्ध में अदालत में पेश किया।
फिलीपींस
फिलिपिनो संविधान के बिल ऑफ़ राइट्स में, बंदी प्रत्यक्षीकरण को धारा 15, अनुच्छेद 3 में U.S संविधान के तकरीबन-हूबहू सूचीबद्ध किया गया है:
“बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रादेश के विशेषाधिकार को आक्रमण या विद्रोह के मामलों में निलंबित नहीं किया जाएगा जब सार्वजनिक सुरक्षा को इसकी आवश्यकता होती है।”
1971 में, प्लाजा मिरांडा बमबारी के पश्चात, फरडीनैंड मार्कोस के शासन काल में मार्कोस प्रशासन, ने बंदी प्रत्यक्षीकरण को समाप्त कर दिया ऐसा आनेवाले विद्रोह को दबाने के प्रयास के रूप में, सीपीपी को 21 अगस्त के लिए दोषी ठहराने पर किया गया। इसके खिलाफ व्यापक विरोध के पश्चात, यद्यपि, मार्कोस प्रशासन ने प्रादेश को वापस लाने का फैसला किया। कई लोगों ने इसे मार्शल लॉ की प्रस्तावना माना.
दिसम्बर 2009 में, बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रादेश के विशेषाधिकार को मेगुइनडानाओ में निलंबित कर दिया गया चूंकि उस प्रांत को मार्शल लॉ के अधीन घोषित किया गया था। यह उस अमानवीय मेगुइनडानाओ हत्याकांड के परिणाम स्वरूप हुआ।
पोलैंड
बंदी प्रत्यक्षीकरण के समान एक अधिनियम पोलैंड में 1430 के दशक में अपनाया गया था। नेमिनेम केप्टिवेबिमस, जो neminem captivabimus nisi iure victum का संक्षिप्त रूप है, (लैटिन, “हम अदालत के फैसले के बिना किसी को भी गिरफ्तार नहीं करेंगे”) पोलैंड और पोलिश लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल का बुनियादी अधिकार था, जिसका यह कहना था कि राजा, अदालत के व्यवहार्य फैसले के बिना szlachta (श्लाष्टा) के किसी भी सदस्य को ना तो सज़ा दे सकता है और ना ही बंदी बना सकता है। इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को मुक्त कराना है जिसे गैर-कानूनी रूप से गिरफ्तार किया गया है। नेमिनेम केप्टिवेबिमस का इससे कुछ लेना-देना नहीं है कि कैदी दोषी है कि नहीं है, बल्कि सिर्फ इससे है कि आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया गया है।

स्पेन
1526 में Señorío de Vizcaya का Fuero Nuevo अपने क्षेत्र में बंदी प्रत्यक्षीकरण को स्थापित करता है। वर्तमान स्पेन के संविधान का कहना है कि कानून द्वारा एक बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रक्रिया प्रदान की जाएगी ताकि अवैध रूप से गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति को न्यायिक अधिकारियों को तत्काल सौंपना सुनिश्चित हो सके. जो कानून इस प्रक्रिया को नियंत्रित करता है वह 24 मई 1984 का बंदी प्रत्यक्षीकरण क़ानून है जो यह सुविधा मुहैय्या कराता है कि कारावास में बंद एक कैदी खुद या फिर किसी तृतीय पक्ष द्वारा अपने बंदी प्रत्यक्षीकरण का दावा कर सकता है और एक जज के समक्ष प्रस्तुत होने के लिए अनुरोध कर सकता है। इस अनुरोध में उन आधारों को निर्दिष्ट करना जरुरी है जिसके अनुसार हिरासत को गैरकानूनी माना गया है, उदाहरण के लिए, जैसे हो सकता है कि बंदी बनाने वाले के पास कानूनी अधिकार नहीं है, या फिर कैदी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया या उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया, आदि. तो जज इसके बाद यदि जरुरत हो तो अतिरिक्त जानकारी का अनुरोध कर सकता है और एक बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश जारी कर सकता है जिस बिंदु पर हिरासत में रखने वाले प्राधिकारी के पास उस कैदी को न्यायाधीश के सामने लाने के लिए 24 घंटे होते हैं।

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