प्रतिजैविक दवाओं का इतिहास, आइए जानें

बीसवीं सदी की शुरुआत से पहले कई संक्रामक रोगों के इलाजऔषधीय लोकोक्तियों पर आधारित होते थे। प्राचीन चीनी चिकित्सा में संक्रमण के इलाज के लिए पौधों से प्राप्त प्रतिजैविक तत्वों का उपयोग 2,500 साल पहले शुरू हुआ। प्राचीन मिस्र,प्राचीन यूनानी और मध्ययुगीन अरब जैसी कई प्राचीन सभ्यताओं में संक्रमण के इलाज के लिए फफूंद और पौधों का इस्तेमाल होता था। 17 वीं सदी मेंकुनैन की छाल का उपयोग मलेरिया के इलाज के लिए व्यापक रूप से होता था, जो रोगजीनस प्लासमोडियम के प्रोटोजोन परजीवी के कारण होता है। बीमारियां क्यों होती हैं, यह जानने-समझने के वैज्ञानिक प्रयासों, सिंथेटिक प्रतिजैविक कीमोथेरेपी के विकास और प्राकृतिक प्रतिजैविक दवाओं का पृथक्करण प्रतिजैविक के विकास में मील के पत्थर साबित हुए.
मूलतः एंटीबायोसिस कहे जाने वाले प्रतिजैविक वैसी दवाएं हैं, जो बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती हैं। एंटीबायोसिस शब्द का मतलब है “जीवन के खिलाफ” और इसकी शुरुआत फ्रांस के जीवाणु विज्ञानीविलेमिन ने इन दवाओं के असर का वर्णन करने के लिए की. (एंटीबायोसिस का पहली बार वर्णन 1877 में बैक्टीरिया में किया गया था, जब लुईस पाश्चर और रॉबर्ट कोच ने देखा कि हवा से पैदा हुए एक बैसिलस द्वारा बैसीलस एंथ्रासिस के विकास को रोका जा सकता है।. इन दवाओं को बाद में अमेरिकी सूक्ष्मजीव विज्ञानी सेलमैन वाक्समैन ने 1942 में प्रतिजैविक नाम दिया.
एक विज्ञान के रूप में सिंथेटिक प्रतिजैविक कीमोथेरेपी और प्रतिजैविक के विकास की कहानी 1880 के दशक के आखिर में जर्मनी में वहां के चिकित्सा विज्ञानी पॉल एर्लीच ने शुरू की. डॉ॰ एर्लीच ने बताया कि कुछ रंग मानव, पशु या बैक्टीरियल कोशिकाओं को बांधने व रंगने में सक्षम होते हैं, जबकि दूसरे ऐसा ऐसा नहीं कर पाते. बाद में उन्होंने यह विचार व्यक्त किया कि संभव है कि कुछ रंग या रसायन जादुई गोली या चुनिंदा दवा के रूप में काम करें और वे मानव मेजबान को नुकसान पहुंचाए बिना बैक्टीरिया को बांधकर मार दें. काफी प्रयोगों और विभिन्न सूक्ष्म जीवों के खिलाफ रंगों के प्रदर्शन के बाद उन्होंने चिकित्सकीय रूप से उपयोगी दवा, मानव निर्मित प्रतिजैविक सालवर्सनकी खोज की. हालांकि, पार्श्व कुप्रभाव (साइड इफेक्ट) और बाद में प्रतिजैविक पेनिसिलिन की खोज के बाद सालवर्सन का प्रतिजैविक के रूप में इस्तेमाल खत्म हो गया। एर्लीच के कार्यों, जिससे प्रतिजैविक क्रांति का जन्म हुआ, के बाद 1932 में डोमेक ने प्रोन्टोसिल की खोज की.[13] पहले व्यावसायिक रूप से उपलब्ध जीवाणुरोधी प्रतिजैविक प्रोंटोसिल का विकास गेरहर्ड डोमेक (जिन्हें उनके प्रयासों के लिए 1939 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला) की अगुवाई वाली एक टीम ने जर्मनी के IG फारबेन कांग्लोमरेट केबेयर प्रयोगशालाओं में किया। प्रोन्टोसिल का ग्रैम पोजिटिव कोकी पर अपेक्षाकृत व्यापक प्रभाव दिखा और यह इंट्रोबैक्टीरिया के खिलाफ भी नहीं था। इस पहली सल्फोनामाइड दवा के विकास से प्रतिजैविक दवाओं के युग की शुरुआत हुई.
प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पादित प्रतिजैविक दवाओं की खोज सूक्ष्म जीवों के बीच एंटीबायोसिस के निरीक्षण पर पहले किये गये काम से प्रभावित थी। पाश्चर ने कहा ‘कि अगर हम कुछ बैक्टीरिया के बीच परस्पर विरोध की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं तो इससे ‘शायद चिकित्सा विज्ञान के लिए काफी उम्मीदें पैदा होंगी. पेनिसिलियम spp के बैक्टीरिया के परस्पर विरोध का सबसे पहला वर्णन जॉन टिंडान ने 1875 में इंग्लैंड में किया। हालांकि, उनके काम पर 1928 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा पेनिसिलिन की खोज किये जाने तक वैज्ञानिक समुदाय ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. यहां तक कि तब पेनिसिलिन की चिकित्सीय क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं था। उसके दस साल बाद, अर्नस्ट चेन और हावर्ड फ्लोरे ने बी. ब्रेविस द्वारा खोजे गये व जर्मिसिडिन नाम दिये गये एक अन्य प्राकृतिक प्रतिजैविक पदार्थ की खोज के बाद फ्लेमिंग के काम में रुचि ली. 1939 में, रेने डुबोस को जर्मिसिडिन को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान घाव और अल्सर के इलाज में प्रयोग की गयी पहली व्यावसायिक रूप से उत्पादित प्रतिजैविक दवा के रूप में कारगर साबित होने के रूप में अलग पहचान मिली. फ्लोरे और चैन ने पेनिसिलिन को शुद्ध करने में कामयाबी पाई. इस शुद्ध किये गये प्रतिजैविक ने जीवाणुओं की एक विस्तृत श्रृंखला के खिलाफ जीवाणुरोधी गतिविधि का प्रदर्शन किया। इसमें विषाक्तता भी कम थी और प्रतिकूल प्रभाव पैदा किये बिना इन्हें लिया जा सकता था। इसके अलावा, इसकी गतिविधि मवाद जैसे जैविक घटकों से अवरुद्ध नहीं होती थी, जैसा कि उस समय उपलब्ध सिंथेटिक प्रतिजैविक सल्फोनामाइड के प्रयोग से होता था। इतनी ताकतवर प्रतिजैविक की खोज अभूतपूर्व थी। पेनसिलिन के विकास ने समान क्षमताओं वाले प्रतिजैविक यौगिकों की खोज के प्रति नई रुचि पैदा की.[16] पेनिसिलिन की उनकी खोज के कारण अर्नस्ट चेन, हावर्ड फ्लोरे को 1945 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। फ्लोरे ने पूरी दृढता से और व्यवस्थित रूप से जीवाणुरोधी यौगिकों की खोज प्रारंभ करने का श्रेय डुबोस को दिया. इसी तरह की पद्धति की वजह से जर्मिसिडिन की खोज हुई, जिसने पेनिसिलिन में फ्लोरे की खोज को पुनर्जीवित किया।

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