भारतीय राजनय का इतिहास भाग – 1

प्राचीन भारत की यह स्थिति थी कि वह एक छत्र शासक के अन्तर्गत न रहकर विभिन्न छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित रहा था तथापि राजनय के उद्भव और विकास की दृष्टि से यह स्थिति अपना विशिष्ट मूल्य रखती है। यह स्थिति उस समय और भी बढ़ी जब इन राज्यों में मित्रता और एकता न रहकर आपसी कलह और मतभेद बढ़ते रहे। बाद में कुछ बड़े साम्राज्य भी अस्तित्व में आये। इनके बीच पारस्परिक सम्बन्ध थे। एक-दूसरे के साथ शांति, व्यापार, सम्मेलन और सूचना लाने ले जाने आदि कार्यों की पूर्ति के लिये राजा दूतों का उपयोग करते थे। साम, दान, भेद और दण्ड की नीति, षाडगुण्य नीति और मण्डल सिद्धान्त आदि इस बात के प्रमाण हैं कि इस समय तक राज्यों के बाह्य सम्बन्ध विकसित हो चुके थे। दूत इस समय राजा को युद्ध और संधियों की सहायता से अपने प्रभाव की वृद्धि करने में सहायता देते थे।
भारत में राजनय का प्रयोग अति प्राचीन काल से चलता चला आ रहा है। वैदिक काल के राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में हमारा ज्ञान सीमित है। महाकाव्य तथा पौराणिक गाथाओं में राजनयिक गतिविधियों के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। प्राचीन भारतीय राजनयिक विचार का केन्द्र बिन्दु राजा होता था, अतः प्रायः सभी राजनीतिक विचारकों- कौटिल्य, मनु, अश्वघोष, बृहस्पति, भीष्म, विशाखदत्त आदि ने राजाओं के कर्तव्यों का वर्णन किया है। स्मृति में तो राजा के जीवन तथा उसका दिनचर्या के नियमों तक का भी वर्णन मिलता है। राजशास्त्र, नृपशास्त्र, राजविद्या, क्षत्रिय विद्या, दंड नीति, नीति शास्त्र तथा राजधर्म आदि शास्त्र, राज्य तथा राजा के सम्बन्ध में बोध कराते हैं। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, कामन्दक नीति शास्त्र, शुक्रनीति, आदि में राजनय से सम्बन्धित उपलब्ध विशेष विवरण आज के राजनीतिक सन्दर्भ में भी उपयोगी हैं। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद राजा को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जासूसी, चालाकी, छल-कपट और धोखा आदि के प्रयोग का परामर्श देते हैं। ऋग्वेद में सरमा, इन्द्र की दूती बनकर, पाणियों के पास जाती है। पौराणिक गाथाओं में नारद का दूत के रूप में कार्य करने का वर्णन है। यूनानी पृथ्वी के देवता ‘हर्मेस’ की भांति नारद वाक चाटुकारिता व चातुर्य के लिये प्रसिद्ध थे। वे स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य एक-दूसरे राजाओं को सूचना लेने व देने का कार्य करते थे। वे एक चतुर राजदूत थे। इस प्रकार पुरातन काल से ही भारतीय राजनय का विशिष्ट स्थान रहा है।

प्राचीन गर्न्थों में राजनय
प्राचीन भारत में विभिन्न धर्म ग्रन्थों में राजनय से सम्बन्धित उपलब्ध सामग्री का वर्णन इस प्रकार है :-
मनुस्मृति
मानव धर्म पर लिखित मनुस्मृति, भारत की एक ऐसी अति प्राचीनतम कृति है, जिसमें राजदूतों तथा उनके कार्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु के द्वारा दिये गये नियमों में पड़ोसी देशों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए राजदूत की नियुक्ति का प्रावधान था। वह राजदूत को बहुत ही महत्व देता था। राजा को केवल ऐसे व्यक्ति को ही राजदूत नियुक्त करना चाहिये जो सभी विषयों का ज्ञाता हो, जो दूसरों के मुख पर आये भावों को पढ़ सके तथा जो सत्यवादी, गुणी और उच्च वंश का हो। मनु उस व्यक्ति के लिये राजदूत की नियुक्ति पर बल देते हैं जो सब शास्त्रों का विद्वान हो, अच्च्छे व्यक्तित्व वाला हो, धूम्रपान व मद्यपान से दूर रहता हो तथा जो चतुर और श्रेष्ठ कुल का हो।
मनु के अनुसार,
राजा को राजदूत नियुक्त कर देना चाहिये, सेना को सेनापति पर आश्रित रहना चाहिये, प्रजा पर नियंत्राण सेना पर निर्भर करता है, राज्य की सरकार राजा पर, शांति और युद्ध राजदूत पर।
मनु का मत है कि एक योग्य व चतुर राजदूत मित्र राज्यों में मतभेद तथा शत्रु राज्यों के बीच मित्रता स्थापित करने में सफल होता है। मनु राजा को युद्ध के प्रयोग का परामर्श, युद्ध की अनिवार्यता तथा विजय की सुनिश्चितता की स्थिति में एक अन्तिम शस्त्र के रूप में ही देते हैं। चूंकि युद्ध का परिणाम अनिश्चित होता है, अतः मनु राजा को परामर्श देते हैं कि उसे मित्र, शत्रु अथवा तटस्थ राज्य को कभी भी अपने से अधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहिये। राज्य की रक्षा तथा शत्रु का विनाश राज्य का प्रमुख कर्तव्य है। शत्रु से युद्ध करना राजा का धर्म है। वह उसे शत्रु के सर्वनाश के लिये बगुले की भांति व्यवहार का परामर्श देते हैं। इसके अतिरिक्त राजा को शेर की भांति शक्तिशाली और लोमड़ी की भांति चालाक होना चाहिये। मनु ने राज्यों की विदेश नीति के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। मनु का मौलिक सिद्धान्त षाड्गुण्य मंत्र है, जिसमें वह राजा को संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय गुणों को ग्रहण करने का परामर्श देता है। इसी के माध्यम से राजा सूचनायें एकत्रित करता था। मनु के मत में दूत के तीन प्रमुख कार्य थे- पर राजा के साथ युद्ध अथवा शांति की घोषणा करना, संधियां करना और विदेशों में रहकर कार्य करना। राजदूत को अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपना ज्ञानवर्धन करना चाहिये तथा विरोधी पक्ष के लोभी व्यक्तियों व अधिकारियों को भ्रष्ट करने का निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिये। प्रलोभन और भेंट देकर सूचना प्राप्ति का मनु परामर्श देते हैं। वास्तव में प्राचीन काल में गुप्तचर व गुप्तचरी का विरोध न करके, उसके उपयोग पर बल दिया गया था।
याज्ञवल्क्य स्मृति
याज्ञवल्क्य स्मृति में राज्य और प्रजा की रक्षा, राजा का प्रमुख कर्त्तव्य माना गया है। अतः युद्ध करना राजा का धर्म है। राजा को इस स्थिति को ध्यान में रखकर ही अपनी नीति अपनानी चाहिये तथा साम, दान, भेद और दण्ड सभी उपायों का प्रयोग कर सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये। याज्ञवल्क्य स्मृति के एक श्लोक में राजा के गुण संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वधीभाव बताये गये हैं, अर्थात् राजा को आवश्यकता तथा परिस्थिति अनुसार अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मित्रता, शत्रुता, आक्रमण, उपेक्षा, संरक्षण अथवा फूट डालने का प्रयत्न करना चाहिये।

रामायण तथा महाभारत
विश्व साहित्य के प्राचीनतम महाकाव्यों की तुलना में रामायण व महाभारत उत्कृष्ट कृति हैं। इनमें राजनय की उपयोगिता व उन्मुक्तियों से सम्बन्धित उदाहरण मिलते है।महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में राम ने लंका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के पूर्व अंगद ने नीति के अनुसार समझौते का पूर्ण प्रयास किया था। रावण द्वारा हनुमान के लंका दहन के कारण प्राणदण्ड के आदेश देने पर रावण के भाई विभीषण ने व्यवधान डालते हुए कहा था कि शास्त्रानुसार दूत का वध नीति विरोधी है, उसे दण्डित नहीं किया जा सकता, चाहे वह कैसा ही अपराध क्यों न करे। विभीषण को अपने पक्ष में करना तथा रावण के दरबार में गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर लेना, कुशल राजनयिक योग्यता का परिचायक है। शुक राक्षस द्वारा राम की सेना का भेद पता लगाने के लिये आने पर उसे पकड़ लिया गया, परन्तु राम ने उसे छोड़ दिया क्योंकि शुक ने अपने को रावण का दूत घोषित कर दिया था। इस प्रकार इस काल में दूत भेजने की प्रथा थी तथा इनका मुख्य कार्य सन्देशों का लाना, ले जाना तथा जासूसी करना था। अयोध्या काण्ड में राजा दशरथ राम को परामर्श देते हैं कि राजा को दूतों के माध्यम से सत्य का पता लगाने का प्रयत्न करना चाहिये। तुलसीदास ने रामचरित मानस में साम, दान, भेद और दण्ड चारों उपायों का वर्णन किया है।
महाभारत हमारे प्राचीन राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन का एक प्रमुख साधन है। रामायण की भांति महाभारत भी नीतिशास्त्र की ऐसी पुस्तक थी जिसका अध्ययन कर राजा स्वयं के राज्य के हितों की रक्षा के लिये कार्य कर सकता था। गीता को विद्वानों ने नीतिशास्त्र, नीति मीमांसा, कर्तव्य शास्त्र आदि अनेक नाम दिये हैं। गीता के उपदेश राजनीति के उच्चतम आदर्श के रूप में देखे जाते हैं। इस समय तक राजनय विकसित हो चुका था। महाभारत में दूतों का वर्णन मिलता है। शासन की सफलता के लिए दूतों और गुप्तचरों की आवश्यकता पर इसमें बल दिया गया है। दूत केवल वही व्यक्ति नियुक्त हो सकता था जो कुलीन वंश का, प्रिय वचन कहने वाला, अच्छी स्मृति वाला और यथोक्तवादी हो। शांतिपर्व में वर्णित है कि दूतों के माध्यम से राज्य को अपने शत्रु और मित्र दोनों ही पक्षों के अभिलाषित विषय का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। संजन ने विभिन्न अवसरों पर दूत का कार्य किया था। पांडवों की ओर से श्रीकृष्ण एक विशेष दूत बनकर कौरवों के राजा दुर्योधन के दरबार में दोनों पक्षों के मध्य समझौता कराने गये थे, जिससे कि भविष्य में संग्राम न हो। द्रोपदी द्वारा ऐसे असम्भव कार्य के औचित्य के सम्बन्ध में पूछने पर श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया वह राजनय से परिपूर्ण था। श्रीकृष्ण का मत था कि भले ही वे युद्ध को टालने में असफल रहे, परन्तु वे विश्व को दिखा देंगे कि वे न्यायोचित हैं तथा कौरव अन्याय कर रहे हैं। इसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा था कि-
मैं तुम्हारी बात को कौरवों के दरबार में अच्छी प्रकार से रखूंगा और प्राणप्रण से यह चेष्टा करूंगा कि वे तुम्हारी मांग को स्वीकार कर लें। यदि मेरे सारे प्रयत्न असफल हो जायेंगे और युद्ध अवश्यम्भावी होगा, तो हम संसार को दिखायेंगे कि कैसे हम उचित नीति का पालन कर रहे हैं और वे अनुचित नीति का, जिससे विश्व हम दोनों के साथ अन्याय नही कर सके।
इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने कहा था कि “धष्तराष्ट्रं के समक्ष मैं न केवल अपने परन्तु कौरवों के हितों की भी रक्षा करूंगा।”
युद्धनीति एवं राजनीति के कृष्ण एक महान ज्ञाता थे। धर्मराज युधिष्ठिर व अर्जुन को दिये गये नीति प्रवचन, कृष्ण के योग्य एवं आदर्श राजदूत होने के द्योतक हैं। भीष्म पितामह ने दूत की योग्यताओं का वर्णन किया है। उनके अनुसार वह पुरुष जो दक्ष, प्रिय भाषी, यथोक्तवादी और अच्छी स्मृति वाला हो वही दूत नियुक्त किया जा सकता है। राजा को किसी भी परिस्थिति में दूत का वध नहीं करचा चाहिये।”दूत को मारने वाला मंत्रियों सहित नरकगामी होगा।” भीष्म पितामह द्वारा अन्तिम क्षणों में दिये गये वचन राजा तथा राजनय पर अच्छा प्रकाश डालते हैं। महाभारत में उच्च साध्य की प्राप्ति में सभी प्रकार के साधनों के उपयोग का समर्थन है। शांतिपर्व राजनय और युद्ध व शान्ति के परामर्श से भरा पड़ा है। वनपर्व में विजय प्राप्ति हेतु सभी साधन मान्य बताये गये हैं। क्षत्रिय धर्म नैतिकता के ऊपर तथा परे है।
ये दोनो महाकाव्य शासन, राजनय, युद्ध और शांति पर लिखे गये महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। इस प्रकार रामायण और महाभारत काल में राजनय का संस्थागत स्वरूप उभर आया था। रामचन्द्र दिक्षितार के अनुसार राजनय इस समय पूर्ण विकसित हो चुका था।

मौर्यकाल
मौर्य काल भारतीय राजनय का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। इस काल में दूतों को भेजने की प्रथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का एक भाग बन चुकी थी। अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध भी विकसित हो चुके थे। दूतों का स्थायी व अस्थायी रूप से आदान-प्रदान होता था। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में मैगस्थनीज और समुद्रगुप्त के दरबार में सिंहल राजा के दूत आये थे। इसी प्रकार भारत की ओर से चीन व रोम को दूत भेजे गये थे। इन दूतों का कार्य मूलरूप से व्यापारिक सुविधायें प्राप्त करना था। राजतरंगिणी में भी विदेशों में दूतों की नियुक्ति का वर्णन है। मैगस्थनीज की पुस्तक ‘इण्डिका’ में मौर्यकालीन भारत की राजनीतिक दशाओं का वर्णन है। बिन्दुसार के राज्य काल में सीरिया के राजा एन्टीयोकस (Antiochus) ने डायमेकस (Deimachos) नामक व्यक्ति को तथा मिस्र के राजा टोलेमी ने डायोनिसियस (Dionysius) को अपने दूत के रूप में भेजा था। सम्राट अशोक ने लंका, मिस्र, सीरिया, मैसीडोन आदि देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित किये थे तथा अपने पुत्र महेन्द्र व पुत्री संघमित्रा को धर्मदूत के रूप में लंका भेजा था। मौर्य शासकों तथा पुलकेशिन द्वितीय के फारस के राजा खुसरो परवेज (Khusro Parwiz) के साथ तथा हर्षवर्धन के चीन के साथ सम्बन्ध थे। राजदूतों के आदान-प्रदान की व्यवस्था पूर्णतः स्थापित हो चुकी थी। इस प्रकार राजनय को राज्य शिल्प का ही एक भाग माना जाता था। राजनय अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का मूल आधार था।
भारतीय राजशास्त्र के चार प्रसिद्ध आधारभूत सिद्धान्त साम, दान, भेद और दण्ड राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों को, प्राचीनकाल की भाँति आज भी निर्धारित करते हैं। इन्हें नीतिशास्त्र में ‘चतुर्पद’ कहा गया है। साम का अर्थ मित्रता तथा अनुनय है। राजनय के इस नियम के अन्तर्गत विपक्षी राजा को वाणीचातुर्य तथा राजनयिक कुशलता अर्थात् तर्क और विनम्रता से मित्र बनाये रखा जाता था। विजिगीषु राजा को इस नीति का पालन करना चाहिये। यदि साम की नीति सफल हो जाये परन्तु फिर भी उसका पूर्ण परिणाम नहीं निकले तो कौटिल्य दान की नीति के पालन का परामर्श देता है। दान का अर्थ है देना। दान सिद्धान्त के अन्तर्गत शत्रुपक्ष को अपनी ओर मिलाने के लिए लोभ और लालच देता है। राजनय में कुछ दिये बगैर प्राप्त नहीं होता है। अतः यदि राज्य को कुछ प्राप्त करना है तो उसे कुछ देना भी पड़ेगा। साम व दान अर्थात् अनुनय और समझौते में असफल रहने पर भेद अथवा फूट डालने का प्रयत्न किया जा सकता है। शत्रु पक्ष में फूट डालकर उसे दुर्बल बना अपना प्रभाव बढाना राजा का परम कर्तव्य होता था। कौटिल्य के अनुसार भेद डालने के कार्य के अन्तर्गत पड़ौसी राज्यों को उत्तेजित करना अथवा प्रतिष्ठित नागरिकों और अधिकारियों को विद्रोह के लिये प्रेरित करना था। उपर्युक्त तीन उपायों की असफलता के पश्चात् ही चौथे उपाय अर्थात् दण्ड के उपयोग का परामर्श मिलता है। मनु भी यथासम्भव अन्तिम अस्त्र के रूप में ही उसके प्रयोग की छूट देते हैं। मनु के अनुसार साम, दान और भेद इनमें से एक अथवा तीनों के साथ प्रयोग द्वारा शत्रु पर विजय प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये, युद्ध से नहीं। इन तीनों उपायों के द्वारा जब सिद्धि प्राप्त न हो तब दण्ड का आश्रय लेना उचित होगा। प्राचीन भारतीय इतिहास में उपलब्ध अनेक उदाहरण इस बात को प्रमाणित करते हैं। सभी युगों में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये दण्ड की व्यवस्था रही है। दण्ड का अर्थ राजनयिक युद्ध के रूप में भी था। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काल से ही साम, दान, भेद और दण्ड का प्रयोग होता चला आ रहा है। आधुनिक युग इसका अपवाद नहीं है।
कौटिल्य और अर्थशास्त्र
राजनय के क्षेत्र में कौटिल्य का महान् योगदान है। वास्तव में कौटिल्य और राजनय पर्यायवाची हैं। कौटिल्य अरस्तू का समकालीन था। इसका वास्तविक नाम विष्णुगुप्त था। इतिहास में वह चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध है। चाणक्य, चन्द्रगुप्त मौर्य का राजगुरु तथा परामर्शदाता था। चाणक्य ने 326 ई0 पू0 में सिकन्दर के आक्रमण से उत्पन्न आन्तरिक अराजकता तथा हिन्दू व्यवस्था के विघटन की स्थिति में मौर्यवंश के प्रथक सम्राट चन्द्रगुप्त के पथ प्रदर्शन के लिये ‘नरेन्द्र हेतु’ एक प्रसिद्ध पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की थी। इस पुस्तक की रचना में कौटिल्य का मूल उद्देश्य सश्क्त राजतन्त्र के माध्यम से भारत का राजनीतिक एकीकरण करना था। ये अपने ढंग की एक ऐसी अनोखी पुस्तक है जिसे भारत की राजनीति शास्त्र की प्रथम पुस्तक कहा जा सकता है। इसमें राजनीति का विवेचन स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में दिया गया है। राज्य व्यवस्था के संचालन हेतु कौटिल्य द्वारा प्रस्तुत परामर्श के आधार पर ही मौर्य शासक एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो सके थे। इसी की सहायता से चन्द्रगुप्त चक्रवर्ती सम्राट बना। राज्य शास्त्र के साहित्य में इस विशिष्ट, अद्वितीय तथा अपूर्व ग्रन्थ का महत्व चिरन्तन है। इसमें उच्च कोटि की शासन व्यवस्था, सरकार, राजा तथा नीतिशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों के गूढ़ अध्ययन के साथ-साथ प्रथम खण्ड के सोलहवें अध्याय में राजनय व राजदूतों के कार्यों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसका सातवां खण्ड विदेश नीति, संधियों और राष्ट्रीय हितों की रक्षार्थ विषयों से सम्बन्धित है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। प्रथम, किसी भी देश की नीति के गुणों का मूल्यांकन उनके द्वारा सम्पादित कार्यों के परिणामों के आधार पर किया जा सकता है। उत्तम इच्छाओं के गलत परिणाम खराब नीति के द्योतक हैं। द्वितीय, राजनीति की प्रेरणा तथा उनके परिणाम दोनों ही चूंकि मानव द्वारा निर्मित हैं अतः परिकलनीय है।

कौटिल्य ने प्रथम बार भारत को व्यवस्थित और स्थापित राजनय के नियमों को भेंट की। निश्चय ही प्राचीन भारत, राजनयिक व्यवस्था में परिपक्व था। इसके द्वारा दिये गये नियम, साधारण परिवर्तन के पश्चात् आज भी लागू किये जा सकते हैं, हालांकि इनका निर्माण आज से हजारों वर्ष पूर्व किया गया था। कौटिल्य वर्तमान अर्थव्यवस्थाअें का संस्थापक था। उसने राज्य के सम्बन्धों को राष्ट्रोंं के मध्य ‘शक्ति संघर्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया था। कौटिल्य का उद्देश्य सुदृढ़ और शक्तिशाली राज्य की स्थापना करता था। अतः उसने राजा को परामर्श दिया कि वह अपनी भौतिक शक्ति की वृद्धि करे, और इस ओर निरन्तर यत्नशील रहे। चन्द्रगुप्त मौर्य तथा समुद्रगुप्त की नीतियों में यथार्थवाद का प्रकट अंश पाया जाता है। अपनी यथार्थवादी नीतियों के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त साम्राज्य स्थापित करने तथा उस समय को राजनीति को स्थायित्व प्रदान करने में सफल रहा। अपनी यथार्थवादी नीतियों के आधार पर ही कौटिल्य मार्गेनथो के यथार्थवादी स्कूल की स्थापना करने वालों का पितामह तथा बिस्मार्क इसका योग्य शिष्य माना जा सकता है।
कौटिल्य शासन की सम्पूर्ण शक्ति राजा मेंं केन्दि्रत करना चाहता था। अतः उसके विचार का मूल केन्द्र बिन्दु राजा ही था। कौटिल्य राजा से कछुए की भांति अपनी धन-सम्पदा और स्रोतों को शत्रु से छिपाकर रखने की अपेक्षा करता था, जिससे कि शत्रु पक्ष उसकी शक्ति का सही अनुमान नहीं लगा सके। उसने राजा को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। उसकी यह मान्यता थी कि राजा के गुण और दोषों पर ही राज्य की उन्नति और पतन निर्भर है। कौटिल्य का, जो कि एक सशक्त भारत के निर्माण का इच्छुक था, चन्द्रगुप्त मौर्य की भांति यह विश्वास था कि ऐसा चतुर उपायों- साम, दान, भेद और दण्ड द्वारा ही सम्भव है। क्योंकि अर राज्य की व्यवस्था व समस्यायें अलग होती हैं अतः राज्य अपनी पृथक् स्थितियों के अनुरूप निर्दिष्ट चतुर्विधाओं में से एकाधिक का उपयोग कर सकता है। कौटिल्य के राजनय का उद्देश्य विजिगीषु राज्य को विजय प्राप्त कराने, राजनयिक व्यवहार का विकास तथा उसे स्थायी बनाने में सहायता देना भी था। कौटिल्य द्वारा राजनय के उपयोग के सात तत्व थे- स्वामी, आमात्य, जनपद्, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र। कौटिल्य ने इस सभी का विस्तृत वर्णन किया है। स्वामी अर्थात् राजा इन सबका केन्द्र था। इसके पद के अपने अधिकार और उत्तरदायित्व थे। कौटिल्य राजा तथा राज्य को शक्तिशाली एवं सुरक्षित बनाये रखने के लिये राजा के जीवन की सुरक्षा को महत्व देता है। राजा का दुर्ग चहारदीवारी और चारों ओर खाई से पूर्ण रक्षित होना चाहिये। घोषाल के शब्दों में “राजा को व्यक्तिगत सुरक्षा राज्य की सुरक्षा की कुंजी है।” अर्थशास्त्र भी राजा को अपने राज्य की सुरक्षा तथा प्रभुसत्ता को बनाये रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने का परामर्श देता है।
भारतीय राजनय के इतिहास में कौटिल्य की माण्डलिक व्यवस्था यथार्थवाद की द्योतक है। वैदेशिक नीति का संचालन षाड्गुण्य सिद्धान्त के अनुसार चलता था। कौटिल्य के अनुसार-विदेश नीति का मूल उद्देश्य राजा द्वारा सर्वोच्च शक्ति प्राप्त कर अपने शत्रु को उससे वंचित करना होता है। राजा को ऐसी नीति अपनानी चाहिये जिससे उसके स्वयं के हित का संवर्धन तथा शत्रु को हानि हो। यदि पड़ोसी राज्य दुर्बल हो अथवा उसकी सैनिक शक्ति क्षीण हो तो राजा को आवश्यकतानुसार उसकी सहायता कर, उसकी प्रशंसा कर, उसके साथ स्थायी अथवा अस्थायी सन्धि कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति करनी चाहिये। पड़ोसी राज्य के साथ मित्रता अथवा स्थायी मैत्री सम्बन्धों को बनाने के लिए कौटिल्य ने इन राज्यों की कन्याओें के साथ वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना पर भी बल दिया है। उसके अनुसार शक्तिशाली राजा की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपनी सीमा पर एक कमजोर शत्रु भी हानिकारक होता है। कौटिल्य ने शत्रु की विशेष परिभाषा दी है- शत्रु वह देश है जो अपने देश की सीमा पर हो और मित्र वह है जो तुम्हारे देश की सीमा पर स्थित राज्य की सीमा पर हो। कौटिल्य का मत था कि सीमा पर स्थित शक्तिशाली देश भविष्य का सम्भावित शत्रु है। यह राजनय का कर्तव्य है कि वह इसकी शत्रुता को समाप्त करे, क्योंकि सीमा पर स्थायी शत्रु की उपस्थिति देश के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है।

शक्तिशाली राज्य के सम्बन्ध में कौटिल्य का परामर्श था कि उसके प्रति अस्थायी काल के लिये ‘उपेक्षा’ की नीति का प्रयोग करना चाहिये। मध्यान्तर के इसकाल में राजा को शत्रु पक्ष को दुर्बल करने के लिए गुप्तचरों के सहयोग से उनमें मतभेद पैदा करना चाहिये। इस बीच शक्तिशाली राज्यों के निजी संघर्षों, संधियों अथवा गुटों के प्रति तटस्थता की नीति अपनानी चाहिये अथवा शक्तिशाली राज्य का समर्थन करना चाहिये। कोटिल्य का मत था कि यदि सम्भव हो तो दुर्बल अथवा आश्रयहीन शत्रु को आत्मसात कर, अपनी शक्ति का निरन्तर विकास करना चाहिये। इस प्रकार कौटिल्य राजा को शक्ति संतुलन की नीति को अपनाकर अपनी सुरक्षा और अपना मान तथा धन बढ़ाने का परामर्श देता है। उल्लेखनीय है कि कौटिल्य द्वारा वर्णित राजनय आदर्शों से प्रेरित न होकर केवल ठोस और वास्तविक परिणामों को दृष्टि में रखता था। यही कारण है कि कौटिल्य राजा को शत्रु पक्ष के प्रति ‘उपेक्षा’ के साथ-साथ ‘माया’ व ‘इन्द्रजाल’ अर्थात् जासूसी के उपयोग का भी परामर्श देता है। इसके अतिरिक्त, कौटिल्य राजा को राजनीति के सम्बन्ध में दो और महत्वपूर्ण परामर्श देता है। प्रथम, देश की नीति पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित एवं जनकल्याणकारी होनी चाहिये। द्वितीय, उस नीति में समयानुकूल परिवर्तन करते रहना चाहिये जिससे शत्रु पक्ष को लाभ न पहुंचे।

कौटिल्य राजा को जहां तक सम्भव हो सके शान्ति का मार्ग अपनाने का परामर्श देता है। जब शान्ति और युद्ध से समान लाभ की आशा हो तो शान्ति की नीति अधिक लाभप्रद होगी, क्योंकि युद्ध में सदैव ही शक्ति व धन का अपव्यय होता है। इसी प्रकार जब तटस्थता और युद्ध से समान लाभ हो, तटस्थ नीति ही अधिक लाभप्रद व सन्तोषप्रद होगी। कौटिल्य का यह विचार था कि शान्तिपूर्ण उपायों की असफलता की स्थिति में प्रत्येक राज्य युद्ध को एक विकल्प के रूप में अपने समक्ष रखता है। पणिक्कर के शब्दों में वास्तव में जब सभी प्रयत्न असफल हो गये हों, तथा सभी परिस्थितियां शस्त्रों के प्रयोग के लिए अनुकूल हों, तभी युद्ध की नीति के रूप में जारी रखना विचारणीय है। प्राचीन भारत में युद्ध को यथासम्भव टालने की नीति का अनुकरण किया जाता था। उदाहरणार्थ चन्द्रगुप्त जैसे शक्तिशाली राजा ने सेल्युकस जैसे दुर्बल पड़ोसी राजा के साथ भी आक्रामक नीति का पालन नहीं किया था। कौटिल्य ने युद्ध तीन प्रकार के बताये हैं- प्रकाश युद्ध, कूट युद्ध और तृष्णी युद्ध। राज्य की प्रतिरक्षा के लिये कौटिल्य ने दुर्ग विधान का महत्व प्रदर्शित किया है। बल अथवा सेना सप्तांग राज्य का प्रधान शस्त्र था।
कौटिल्य राज्य की सुरक्षा तथा समृद्धि के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये नैतिकता को गौण मानता था। कौटिल्य के धोखे, छल कपट, हिंसा और युद्ध के पीछे उसका यथार्थ, तीव्र बुद्धि और राष्ट्र-प्रेम झलकता था। इस सबके बावजूद, कौटिल्य राजा को धर्म-विरोधी व अत्याचारी नहीं होने देता है। वह राज्य को स्वेच्छाचारी बनने देता है, परन्तु राजा को हर हालत में धर्म शास्त्रों और नीतिशास्त्रों के स्थापित सिद्धान्तों के अनुसार चलने का ही परामर्श देता है। वह गुप्तचर सेना के उपयोग को राज्य की रक्षार्थ आवयक समझता था। वह असंतुष्ट तत्वों, देशद्रोहियों तथा विदेशी शत्रुओं के साथ व्यवहार में नैतिकता के त्याग का परामर्श देता है। कौटिल्य शासन कला तथा राजा व राज्य के हित में अनैतिक कार्य तथा शत्रु व अपराधियों को धोखे से मरवा डालने को भी न्यायोचित ठहराता है। एक यथार्थवादी होने के नाते कौटिल्य ने राज्य के हित के आगे नैतिक मूल्यों को महत्व नहीं दिया था। वह यह भली-भांति समझता था कि नैतिकता के आधार पर राज्य नहीं टिक सकते हैं। विदेशियों से लड़ने के लिये धर्म के उपयोग का वह समर्थक था। वह मन्दिरों अथवा देवताओं की मूर्ति में शस्त्र छिपाकर रखने का समर्थक था, पूजा पर आये राजा का वध किया जा सकता था, एक शक्तिहीन राजा द्वारा शक्तिशाली राजा के विरुद्ध गुप्त षड्यन्त्रों और हत्याओं के उपयोग का वह समर्थक था। उसकी दृष्टि में शत्रु पर विजय प्राप्ति के लिये नैतिकता और धर्म वांछनीय था। वह नैतिकता को, सैद्धान्तिक दृष्टि से मूल्यवान मानते हुये भी, व्यावहारिक दृष्टि से उसके अनुपयोगी होने के कारण, त्याज्य मानता है।

दूत के शान्तिकालीन कार्य
इनके अर्न्तगत दूत का कर्तव्य है कि वह अपने राजा के सन्देश को मूल रूप से पर-राजा के समक्ष रखे। कौटिल्य के अनुसार अप्रिय सन्देश को सुनकर दूत के वध हेतु शस्त्र उठा लेने पर भी दूत को अपने राजा का सन्देश यथोक्त ही कहना चाहिये। दूत का प्रथम कर्तव्य अपने राजा के सन्देश को पर-राज्य के राजाओं के समीप ले जाना और उनको उनके समक्ष यथोक्त प्रस्तुत करना है। कौटिल्य के अनुसार दूत को समय और परिस्थिति के अनुसार कार्य करना चाहिये, जैसे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्य दूतों व जनपदों से मित्रता, शत्रु पक्ष में विभेद, चापलूसी अथवा घूस आदि सभी साधनों का प्रयोग करना चाहिये। पर-राज्य में अपने राजा के सम्मान में कुल का गौरव, उसके ऐश्वर्य, त्याग, सम्पन्नता, सौष्ठव, अक्षुद्रता, सज्जनता, शत्रु को सन्तापित करने को क्षमता आदि का प्रभाव वहां की जनता पर डालते रहना चाहिये। साथ ही वहां के कोष, शक्ति आदि को भी सामर्थ्य तथा शत्रु की दुर्बलताओं, उनके सैनिक ठिकानों, सैनिक योग्यताओं, दुर्गों, सुरक्षा व्यवस्था, सड़कों, नदी-नालों आदि का विस्तार से वर्णन कर, अपने देश की व्यवस्था से तुलना कर अपने स्वामी को योग्य परामर्श देते रहना चाहिये। उसका कार्य संधि करना, मित्रता बढ़ाना, विदेशी गुप्तचरों को गतिविधियों का पता लगाना और इस सब की सूचना अपने राज्य तक पहुंचाना भी था।

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