भारतीय राजनय का इतिहास भाग – 2

दूत के संकटकालीन कार्य
कौटिल्य संकटकालीन स्थिति में दूत से अपेक्षा करता है कि उसे पर-राज्य के असन्तुष्ट वर्ग को अपनी ओर मिलाने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये। यदि उसके शान्तिकालीन सभी प्रयास असफल रहें और शत्रु राजा आक्रमण की तैयारी में लग जाये तो अन्तिम शस्त्र के रूप में जनता को राजा के विरुद्ध भड़का कर राज्य में फूट, मतभेद और क्रान्ति करवाने का प्रयत्न करना चाहिये। शत्रु के मध्य वैमनस्य और झगड़ों के बीज बोने के लिये गुप्तचरों का खुला प्रयोग करना चाहिये। कौटिल्य के अनुसार दूतों का कार्य उच्चाधिकारियों को प्रलोभन देकर एक-एक करके राज्य को छोड़ देने के लिए उकसाना भी है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अपने गुप्तचरों को वैद्य, व्यापारी, ज्योतिषी, तीर्थयात्री, शिकारी, राजा के सेवक, रसोइयों तथा साधु आदि के रूप में भेजना, उसका प्रमुख कार्य है। वेश्याओं और नर्तकियों से भी बहुधा गुप्तचरों का काम लिया जाता था। कभी-कभी राजमहल में स्त्रियां, तांबूल या छत्र-वाहिकाओं का पद भी प्राप्त कर लेती थी ताकि उन्हें राजा के समीप रहकर राज्य की अंतरंग गतिविधियों का भेद निरन्तर मिलता रहे। दूत को पर-राज्य के जेल तथा थल मार्गों एवं दुर्गों आदि की शक्ति से भी अवगत रहना चाहिये। सेनाओं के ठहरने योग्य भूमि, रास्तों का ज्ञान, दुर्ग और शस्त्रों आदि की सूचना अपने राजा के पास निरन्तर भेजते रहना चाहिये, जिससे कि इस सूचना का संकट काल में उपयोग किया जा सके। इन सब कार्यों के करने के लिये कौटिल्य गुप्तचरों के उपयोग का परामर्श देता है। आलतेकर के शब्दों में दूत का कार्य विदेशों में राज पुरुषों से जान-पहचान करके उस देश की वास्तविक राजनीति की जानकारी प्राप्त करना था। राज्य की सामान्य स्थिति का ज्ञान प्राप्त करना, उसके जन, बल और अन्य साधनों का ठीक-ठीक अनुमान कर अपने गुप्तचरों के माध्यम से गूढ़ लेख द्वारा अपनी सरकार को भेजना था। कौटिल्य ने दूत की अबध्यता का पूर्ण समर्थन किया है। उसका मत था कि दूत चाहे कैसी ही अप्रिय बात कहे अथवा किसी भी जाति का हो, वह प्रत्येक अवस्था में अवध्य है। कौटिल्य, ब्राह्मण दूत का तो किसी भी परिस्थिति में वध स्वीकार नहीं करता है। शत्रु राजा के नाराज होने पर दूत को राजा को याद दिला देना चाहिये के वे जो कुछ अप्रिय सन्देश दे रहे हैं वह उनके राजा का है। दूत राजा का प्रतिनिधि होता है, अतः अप्रिय सन्देश को देते तथा अपने कर्तव्य की पूर्ति करते हुए राजदूत को सजा नहीं मिलनी चाहिये। इस प्रकार इस काल में राजदूत की स्थिति पवित्र एवं निर्दोष संदेशवाहक की थी।
मौर्य राजनीति व्यवस्था में गुप्तचरों का खुला उपयोग होता था। कौटिल्य ने इस व्यवस्था को और भी अधिक निपुण बनाकर उसे राज्य व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बना दिया था। उसने आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही क्षेत्रों में गुप्तचरों का उपयोग प्रस्तावित किया था। इस तथ्य के अनेक प्रमाण हैं कि इनका जाल सम्पूर्ण साम्राज्य तथा पड़ोसी देशों में बिछा हुआ था। कौटिल्य ने बताया है कि गुप्तचरों को कापालिक, भिक्षु, व्यापारी आदि के रूप में विदेशों में रहकर सूचनायें प्राप्त करनी चाहिये। ये फूट डालने और विद्राह को भड़काने का भी कार्य करते थे।
संधियों का आधार मण्डल सिद्धान्त को, अर्थात् अपने पड़ोसी के साथ शत्रुता तथा पड़ोसी के पड़ोसी के साथ मित्रता का व्यवहार अपेक्षित था। कौटिल्य ने राज्यशिल्प के अन्तर्गत छः प्रकार की नीतियों का उल्लेख किया है, संधि (शांति), विग्रह (युद्ध), यान (शत्रु के विरुद्ध अभियान), संश्रय (मैत्री) और द्वैधीभाव (छल-कपट, एक के साथ युद्ध व दूसरे के साथ सन्धि)। कौटिल्य ने इन नीतियों में संधि का सर्वप्रथम उल्लेख करके उसके महत्व को दर्शाया है। वह प्रत्येक मान्य संधि को महत्वपूर्ण तथा अनुल्लंघनीय मानता था। वह संधि की पवित्रता हेतु शपथ की प्रक्रिया को आवश्यक समझता था। कौटिल्य ने पन्द्रह प्रकार की संधियों का वर्णन किया है। संधि की व्याख्या करते हुए उसने लिखा है कि संधि वह है जो राजाओं को पारस्परिक विश्वास में बाँधती है। अथवा संधि राजाओं के पारस्परिक विश्वास की प्रेरक है। सरल भाषा में, दो राज्यों के मध्य मैत्री समबन्ध स्थापित होने का नाम संधि है। कौटिल्य की कूटनीति के प्रमुख अंग के रूप में संधि का उपयोग किया जाता था। कौटिल्य, संधि द्वारा शांति सम्बन्ध बनाये रखने का समर्थक था। इस दृष्टि से वह संधि की ऐसी लचीली शर्तों के पक्ष में था जो शांति स्थापना के उद्देश्य प्राप्ति के साथ-साथ शत्रु राजा को निर्बल और स्वयं को शक्तिशाली बनाने में सहायक हों। कौटिल्य का मत था कि एक राजनीतिज्ञ को यथार्थवादी होना चाहिये न कि स्वप्नलोक में विचरने वाला। वह संधि को सुविधाजनक मानता है। उसके अनुसार उन्हें तभी तक मानना चाहिये जब तक वे अपने राज्य के हित में हों, तत्पश्चात राजनयिक व्यवहार का विकास उनका उल्लंघन माननीय है। कौटिल्य हारे हुए राजा का अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए सन्धि उल्लंघन की छूट देता है। इस प्रकार कौटिल्य संधि के क्षेत्र में दो प्रकार के व्यवहार को बताता है- सुरक्षा सन्धियां अपरिवर्तनीय होती हैं और अन्य संधियां उल्लंघनीय। कौटिल्य का नैतिकता का मापदण्ड असाधारण है।

कौटिल्य पक्का भौतिकवादी था। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये वह नैतिकता के त्याग को सही मानता था। वह नैतिकता और धर्म को उद्देश्य प्राप्ति में सहायक मानता था। उसका अन्तिम उद्देश्य राष्ट्रीय हित था। उन अराजक परिस्थितियों में, जिनमें उसने अर्थशास्त्र के माध्यम से राजा को परामर्श दिया है शान्ति, सुरक्षा, स्वतन्त्रता और सार्वभौमिकता की रक्षा केवल शक्ति और युक्ति से ही सम्भव थी। उल्लेखनीय है कि अपने को नष्ट होने से बचाना ही सर्वोच्च धर्म है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनाये जाने योग्य नियम कौटिल्य की राजनय की एक बहुत बड़ी देन है। राजनयिक नियमों के निर्माण में उसके समक्ष एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय हित तथा राजतन्त्र का सशक्त बनाना था। नैतिकता का त्याग और धर्मनिरपेक्षता का मार्ग इसी उद्देश्य से प्रेरित था। इसी में कौटिल्य की महानता थी। अन्त में कहा जा सकता है कि कौटिल्य वह प्रथम विचारक था जिसने राजनय का सांगोपांग विवेचन व विश्लेषण किया। राजनय के सम्बन्ध में इससे पूर्व जो विचार हमें प्राप्त होते हैं, उनमें कौटिल्य जैसी क्रमबद्धता, सुव्यवस्था और वैज्ञानिक दृष्टि प्राप्त नहीं होती। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राजनय सम्बन्धी विचारों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत में राजनय का सम्पूर्णतः विवेचन करने वाला सर्वप्रथम व्यक्ति कौटिल्य ही है।

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