भारतीय राजनय का इतिहास भाग – 3

कामन्दकीय तथा शुक्रनीतिसार
राज्य और शासन के सम्बन्ध में लिये गये कौटिल्य के अर्थशास्त्रा के पश्चात् कामन्दकीय तथा शुक्रनीतिसार का महत्वपूर्ण स्थान है। कामन्दक के नीतिसार में विष्णुदत्त (चाणक्य) की प्रशंसा प्रमाणित करती है कि लेखक के विचार चाणक्य से प्रभावित थे। कामन्दक का नीतिसार कौटिल्य की भांति ही राजाओं को शिक्षा हेतु लिखा गया है। इसमें राजा की शिक्षा, राज्य के विभिन्न अंगों, युद्ध कला, राज्य की सुरक्षा और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों आदि का विवरण है। कामन्दक राजा को सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्थान देता है। उसने राजा के गुणों और दुर्गणों का वर्णन किया है। कामन्दक ने षाड्गुण्य सिद्धान्त और साम, दान, भेद और दण्ड आदि उपायों के प्रयोग का परामर्श दिया है। उसके अनुसार उसी व्यक्ति का दूत नियुक्त किया जाना चाहिये जो चतुर, बुद्धिमान, परिश्रमी और तर्क के आधार पर कार्य करने वाला हो। दूत का मूल कार्य परदेश का ज्ञान प्राप्त कर राजा को सूचित करना है। वह दूत को राजा की आँखें मानता है। इसीलिये कामन्दक दूतों से रहित राजा को अंधे मनुष्य के समान मानता है। वह गुप्तचरों को भी दूत कहता है।
शुक्राचार्य द्वारा शुक्र नीतिसार में राजा को सफल और समर्थ बनाने के परामर्शों का उल्लेख है। इसके चौथे अध्याय में राजा, शत्रु, शासन-कला आदि का वर्णन है। शुक्र ने मंत्री को राजा की आंख, मित्र को कान, कोष को मुख, सेना को मन, दुर्ग को हाथ और राष्ट्र को पैर माना है। शुक्र के अनुसार सम्पूर्ण राज्य व्यवस्था में राजा का महत्व राज्य के सभी अंगों से बढ़कर है। कौटिल्य की भांति शुक्र ने भी राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है तथा शत्रु, मित्र, मध्यम और उदासीन राजाओं का उल्लेख किया है। राज्य की रक्षा के लिये दुर्ग व्यवस्था पर बल दिया गया है। शुक्र के अनुसार दूत भी राजाओं के मंत्रियों में से एक होता है। वही व्यक्ति दूत बनने योग्य है जो अच्छी स्मृति वाला, देशकाल का ज्ञाता, योग्य, कुशल और निर्भीक हो।
अन्य ग्रन्थ
किरातार्जुनीयम् में दूत को राजा का नेत्र माना गया है तथा उसे परामर्श दिया गया है कि उसे राजा को धोखा नही देना चाहिये। संधि को भंग करने के लिये राजा संधि में दोष बता सकता है। ऐसी सन्धि भंग करने वाला राजा दोषी नहीं है। विवेक और शांति राजा के गुण बताये गये हैं। राजा को क्रोध, अहंकार और मद को त्यागना चाहिये।
द्रविड़ साहित्य में तिरुवल्लुवर के ग्रंथ ‘कुराल’ में राजदूतों पर एक पूरा अध्याय लिखा गया है। एक आदर्श राजदूत को उच्च वंशज, मृदुल स्वभाव वाला तथा सुसंकृत होना चाहिये। एक अन्य स्थान पर आदर्श राजदूत में आकर्षक व्यक्तित्व होने की अपेक्षा की गई है। अपने स्वामी के प्रति दृढ़ निष्ठा तथा विदेशी राजा के प्रति शिष्ठाता उसके आचार का अभिन्न अंग माना गया है। कुराल में शत्रु के विरुद्ध सधियों पर बल दिया गया है। शक्तिहीन राज्यों को चाहिये कि वे अपने पड़ोसी शक्तिशाली राज्यों के साथ संधि कर मित्रता बनाये रखें। तमिल विदेश नीति और राजनय का आधार यथार्थता ही था।
सोमदेव की पुस्तक ‘नीतिवाक्यामृत’ राजनयिक ज्ञान का भण्डार है। वह राजा को ‘परमदेव’ मानता है। राज्य की रक्षा और उचित न्याय का वितरण उसका कर्तव्य है। इसने राजा की दिनचर्या का वर्णन किया है। सोमदेव दूतों को, शुक्र की भांति मंत्रियों की श्रेणी में रखता है। दूतों की योग्यता का वर्णन करते हुए सोमदेव उनसे अपेक्षा करता है कि उन्हेंं वाक्पटु, कुलीन, प्रतिभा सम्पन्न, दक्ष और बुद्धिमान होना चाहिये। उसने भी तीन प्रकार के दूतों का वर्णन किया है। निस्सृटार्थ, परिमितार्थ और शासनहार। वह प्रथम श्रेणी के दूतों को ही केवल संधि करने का अधिकार देता है। दूत का कर्तव्य है कि वह पर-राज्य में फूट डाल असंतुष्ट वर्ग को अपने राज्य के पक्ष में करे तथा योग्य गुप्तचरी से शत्रु-पक्ष की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर अपने स्वामी को सूचित करे। सोमदेव की ‘नीतिवाक्यामृत’ परामर्श देती है कि दूत चाहे चांडाल ही क्यों न हो, अथवा वह कैसा भी गलत कार्य ही क्यों न करे, वह अवध्य है। ‘नीतिप्रकाशिका’ में महाकाव्यों की भांति दूत की अवध्यता के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है।
चंडेश्वर ने भी दूत के वध का निषेध किया है। हर्षवर्धन ने चीनी यात्री ह्यूनसांग को दूत के बराबर मानकर उसकी वापिसी पर उसकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की थी। ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ की कहानियां भी राजाओं को राज्यशिल्प में प्रशिक्षित करने के लिए ही रची गईं थीं। ये कहानियां उस समय के भारत की राजनीतिक तथा राजनयिक परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करती हैं। हितोपदेश सोलह प्रकार की संधियों का वर्णन करता है। यह पवित्र पूजा स्थानों को गुप्तचरी का केन्द्र के रूप में उपयोग का भी परामर्श देता है। पंचतन्त्र भी गुप्तचरी का समर्थक है। ‘मुद्राराक्षस’ में राजाओं व मंत्रियों के पात्रों के माध्यम से कही गईं बातें राजनय से परिपूर्ण हैं। मिथिला राजा के मंत्री ने अपनी रचना ‘राजनीति रत्नाकर’ में राज की ब्रह्मनीति का आधार मण्डल सिद्धान्त बताया है। यह भी षाड्गुण्य सिद्धान्त और साम, दान, भेद और दण्ड के उपायों के प्रयोग का परामर्श देता है।

इस प्रकार वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र, जातक, राजतरंगिणी आदि कृतियों में राजनय का विशद् वर्णन किया गया है। मनु, याज्ञवल्लय, कौटिल्य, कामन्दक, शुक्र आदि राजशास्त्रियों ने विस्तार से राजा, मंत्री, सभा, परिषद्, अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों, सेना, दूत, दुर्ग आदि का वर्णन किया है। इनके द्वारा दिये गये परामर्श का निष्ठापूर्वक पालन किसी भी राजा को सशक्त बनाने में सहायक हो सकता है। राजनय के सम्बन्ध में जो नियम आधुनिक काल में वियना कांग्रेस द्वारा स्वीकृत किये गये हैं वे भारत में हजारों वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुके थे। राजनय की दृष्टि से मौर्यकाल राजनय का स्वर्णकाल था। राजनय पर लिखने वाला कौटिल्य इस काल का प्रथम तथा प्रमुख विद्वान था। इसी की नीति की क्रियान्विति के फलस्वरूप मौर्य साम्राज्य वैभव एवं सम्पन्नता के उच्च शिखर पर पहुंच सका था। कालान्तर में जब कौटिल्य के व्यावहारिक सिद्धान्त की अवहेलना की जाने लगी तो राजवंश क्षीण हो गये, केन्द्र शक्तिहीन बन गया और लगभग ई0 सन् 700 के बाद हिन्दू गणतन्त्र छिन्न-भिन्न हो गया।

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