तुर्क साम्राज्य का इतिहास भाग – 2

विद्रोह और पुनरुत्थान (1566-1683)
पिछली शताब्दी का असरदार सैनिक और नौकरशाही का तंत्र कमज़ोर सुल्तानों के एक दीर्घ दौर के कारण दवाब में आ गया। धार्मिक और बौद्धिक रूढ़िवादिता की वजह से नवीन विचार दब गए जिससे उस्मानी लोग सैनिक प्रौद्योगिकी के मामले में यूरोपियो से पिछड़ गए। पर इस सब के बावजूद, साम्राज्य एक प्रमुख विस्तारवादी शक्ति बना रहा। विस्तार का ये दौर 1683 में वियना की लड़ाई तक बना रहा जिसके बाद यूरोप में उस्मानी साम्राज्य के विस्तार का दौर समाप्त हो गया।
पश्चिमी यूरोप के प्रदेशों ने नए समुद्री व्यपारिक मार्गो की खोज कर ली जिससे वो उस्मानी व्यापार के एकाधिकार से बच गए। 1448 में पुर्तगालियों ने केप ऑफ गुड होप की खोज की। इसी के साथ हिन्द महासागर में चलने वाले उस्मानी और पुर्तगालियों के नौसनिक युद्धों के दौर का प्रारंभ हो गया। ये युद्ध पूरी सोलहवीं शताब्दी में चलते रहे। उधर नयी दुनिया से स्पेनी चाँदी की बाढ़ आ जाने से उस्मानी मुद्रा गिर गयी और मुद्रास्फीति अनियंत्रित रूप से बढ़ गयी।
इवान चतुर्थ (1533-1584) ने ततर खानैत की कीमत पर रुसी जारशाही को वोल्गा और कैस्पियन के क्षेत्रों में फलाया। 1581 में क्रिमीआ के खान देव्लेट प्रथम जीरेय ने उस्मानियो की मदद से मास्को को जला कर ख़ाक कर दिया। अगले साल उसने फिर हमला किया पर मोलोदी की लड़ाई में उसे वापस धकेल दिया गया। क्रिमीआइ खानैत ने पूर्वी यूरोप पर हमला कर गुलाम बनाने का दौर जारी रखा और सत्रवहीं सदी के अंत तक पूर्वी यूरोप की एक प्रमुख शक्ति बना रहा।
दक्षिणी यूरोप में स्पेन के फिलिप द्वितीय के नेतृत्व में एक कैथोलिक गठबंधन ने 1571 की लेपैंटो की लड़ाई में उस्मानी बेड़े के ऊपर विजय प्राप्त की। यह हार उस्मानियो के अजय होनी की छवि को एक शुरुआती (प्रतीकात्मक ही सही) झटका था। उस्मानियो को जहाजों के मुकाबले अनुभवी लोगो का ज्यादा नुकसान हुआ था। जहाजों का नुकसान फटाफट पूरा कर लिया गया। उस्मानी नौसेना जल्दी उबरी और 1573 में उसने वेनिस को एक शांति समझौते के लिए राज़ी कर लिया। इस समझौते से उस्मानियो को उत्तरी अफ्रीका में विस्तार करने और संगठित होने का मौका मिल गया।
दूसरी तरफ हैब्सबर्ग के मोर्चे पर चीजें स्थिर हो रही थी। ऐसा हैब्सबर्ग की रक्षा प्रणाली के मजबूत होने से उत्पन्न हुए गतिरोध की वजह से था। हैब्सबर्ग ऑस्ट्रिया से चलने वाली लम्बी लड़ाई (1593-1606) की वजह से आग्नेयास्त्रों से लैस बड़ी पैदल सेना की जरुरत महसूस हुई। इस वजह से सेना में भर्ती के नियमों में छूट दी गयी। इसने टुकड़ियों में अनुशासनहीनता और निरंकुशता की समस्या उत्पन्न कर दी जो कभी पूरी तरह हल नहीं हो पाई। माहिर निशानेबाजों (सेकबन) की भी भर्ती की गयी और बाद में जब सैन्यविघटन हुआ तो वो जेलाली की दंगो (1595-1610) में लूटमार में शामिल हो गए। इससे सोलहवीं सदी की अंत में और सत्रहवीं सदी के अंत में अनातोलिया में व्यापक अराजकता का ख़तरा पैदा हो गया। 1600 तक साम्राज्य की जनसँख्या तीन करोड़ तक पहुँच गयी जिससे जमीन की कमी होने से सरकार पर दवाब और बढ़ गया।
अपने दीर्घ शासनकाल में मुराद चतुर्थ (1612-1640) ने केंद्रीय सत्ता को फिर स्थापित किया और 1635 में येरेवन और 1639 में बगदाद को सफाविदों से जीत लिया। महिलायों की सल्तनत (1648-1656) एक ऐसा समय था जब युवा सुल्तानों की माओं ने अपने बेटों की और से हुकूमत की। इस समय की सबसे प्रसिद्ध महिला कोसिम सुल्तान और उसकी बहू तुर्हन हतिस थी। उनकी दुश्मनी का अंत 1651 में कोसिम की हत्या से हुआ। कोप्रुलू के दौर के दौरान साम्राज्य का प्रभावी नियंत्रण कोप्रुलू परिवार से आने वाले प्रधान वजीरों के हाथ में रहा। कोप्रुलू परिवार के वजीरों ने नयी सैनिक सफलताएँ हासिल की जिसमे शामिल है ट्रान्सिल्व्हेनिया पर दुबारा अधिकार स्थापित करना, 1669 में क्रीट पर विजय और पोलिश दक्षिणी यूक्रेन में विस्तार (जिसके साथ 1676 में खोत्यं और कमियानेट्स-पोदिल्स्क्यी के गढ़ और पोदोलिया का क्षेत्र उस्मानी नियंत्रण में आ गया)।
पुनः अधिकार स्थापित करने के इस दौर का बड़ा विनाशकारी अंत हुआ जब महान तुर्की युद्ध (1683-1699) के दौरान मई 1683 में प्रधान वजीर कारा मुस्तफा पाशा ने एक विशाल सेना लेकर वियना की घेराबंदी की। आखिरी हमले में देरी की वजह से वियना की लड़ाई में हैब्सबर्ग, जर्मनी और पोलैंड की सयुंक्त सेनायों ने उस्मानी सेना को रोंद डाला। इस सयुंक्त सेना की अगुवाई पोलैंड का राजा जॉन तृतीय कर रहा था। पवित्र संघ के गठबंधन ने वियना में मिली जीत का फायदा उठाया और इसका समापन कर्लोवित्ज़ की संधि (26 जनवरी 1699) के साथ हुआ जिसने महान तुर्की युद्ध का अंत कर दिया। उस्मानियों ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों का नियंत्रण खो दिया (कुछ का हमेशा के लिए)। मुस्तफा द्वितीय (1695-1703) ने 1695-1696 में हंगरी में हैब्सबर्ग के विरुद्ध जवाबी हमला किया पर 11 सितम्बर 1697 को वो जेंता की लड़ाई में विनाशकारी रूप से हार गया।

ठहराव और दोषनिवृत्ति (1683-1827)
इस अवधि के दौरान रूसी विस्तार एक बड़े और बढ़ते खतरे को प्रस्तुत कर रहा था। तदनुसार, स्वीडन के राजा चार्ल्स बारहवें को 1709 में पोल्टावा की लड़ाई (1700-1721 के महान उत्तरी युद्ध का हिस्सा।) में रूस द्वारा हार के बाद ओटोमन साम्राज्य में एक सहयोगी के रूप में स्वागत किया गया। चार्ल्स बारहवें ने रूस पर युद्ध की घोषणा करने को तुर्क सुल्तान अहमद तृतीय को राजी कर लिया, जिसके परिणत 1710-1711 की पृथ नदी अभियान में तुर्को की जीत हुई। 1716-1718 के ऑस्ट्रो-तुर्की युद्ध के बाद पैसरोविच की संधि ने बनत, सर्बिया और “लिटिल वलाकिया” (ऑल्टेनिआ) को ऑस्ट्रिया को देने की पुष्टि की। इस संधि से ये पता चला कि उस्मानी साम्राज्य बचाव की मुद्रा में है और यूरोप में इसके द्वारा कोई भी आक्रामकता पेश करने की संभावना नहीं है।

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