नादेप कम्पोस्ट बनाने की विधि

कम्पोस्ट (Compost) एक प्रकार की खाद है जो जैविक पदार्थों के अपघटन एवं पुनःचक्रण से प्राप्त की जाती है। यह जैव कृषि का मुख्य घटक है। कम्पोस्ट बनाने का सबसे सरल तरीका है – नम जैव पदार्थों (जैसे पत्तियाँ, बचा-खुचा खाना आदि) का ढेर बनाकर कुछ काल तक प्रतीक्षा करना ताकि इसका विघटन हो जाय। विघटन में कुछ सप्ताह या महीने लगते हैं। उसके बाद वह ह्यूमस में बदल जाता है। कम्पोस्ट बनाने की आधुनिक विधि कई चरणों में पूर्ण होती है और प्रत्येक चरण में जल, वायु एवं कार्बन तथा नाइट्रोजन से समृद्ध पदार्थों को बड़े नपे-तुले ढंग से डाला जाता है।

नादेप कम्पोस्ट

कम्पोस्ट बनाने की यह विधि ग्राम पुसर, जिला यवतमाल, महाराष्ट्र के नारायण देवराव पण्ढ़री पांडे द्वारा विकसित की गई है। इसलिये इसे नादेप विधि (या अंग्रेजी में नाडेप) कहते हैं। नाडेप कम्पोस्ट विधि की विशेषता यह है, कि इस प्रक्रिया में जमीन पर टांका बनाया जाता है। इस विधि में कम से कम गोबर का उपयोग करके अधिक मात्रा में अच्छी खाद तैयार की जा सकती है। टांके को भरने के लिए गोबर, कचरा (बायोमास) और बारीक छनी हुई मिट्टी की आवश्यकता रहती है। जीवांश को 90 से 120 दिन पकाने में वायु संचार प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा उत्पादित की गई खाद में प्रमुख रूप से 0.1 से 1.5 नत्रजन, 0.5 से 0.9 स्फुर (फास्फोरस) एवं 1.2 से 1.4 प्रतिशत पोटाश के अलावा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाये जाते है।
खादों में मुख्य, गौ मल मूत्र काम में आए।
घास-फूस, फसल अवशेष सब खाद बनाए।
मिलकर के यह सभी, खाद जीवांश बनायें।

प्रकार
प्रमुखतः नाडेप तीन प्रकार के बनाये जाते हैं।

भू-नाडेप/कच्चे नाडेप

परम्परागत तरीके के विपरीत बिना गड्डा खोदे जमीन पर एक निश्चित आकार (12 फीट, 5 फीट 3 फीट अथवा 10 फीट 6 फीट 3 फीट) के अनुसार लेआउट देकर बनाया जाता है। इस प्रकार दिये गये लेआउट पर पक्के नाडेप की विधि के अनुसार टांका भरा जो।

इस प्रकार लगभग 5 से 6 फीट ऊंचाई तक टांका भर जाने पर एक आयताकार ढेर बनायें। इस आयताकार व व्यवस्थित ढेर को चारों ओर से गीली मिट्टी से लीप कर बंदकर दिया जावे। बंद करने के दूसरे अथवा तीसरे दिन जब गीली मिट्टी कुछ कड़ी हो जाये तब गोलाकार अथवा आयताकार टीन के डिब्बे से ढ़ेर की लम्बाई व चौड़ाई में 9-9 के अंतर पर 7-8 के गहरे छिद्र बनाए जावें। उक्त छिद्रों से हवा का आवागमन होता है, और आवश्यकता पड़ने पर पानी भी डाला जा सकता है, ताकि बायोमास में पर्याप्त नमी रहें और विघटन क्रिया अच्छी तरह से हो सके।

इस तरह से भरा बायोमास 3 से 4 माह के भीतर भली-भाँति पक जाता है तथा अच्छी तरह पकी हुई भुरभुरी, भूरे रंग की दुर्गन्ध रहित उत्तम गुणवत्ता की जैविक खाद तैयार हो जावेगी।

टटिया नादेप

टटिया नाडेप भू-नाडेप/कच्चे नाडेप की तरह ही होते हैं, किन्तु इसमें आयताकार व व्यवस्थित ढ़ेर को चारों ओर से गीली मिट्टी से लेप देने की जगह इसे बांस, बेशरम की लकड़ी आदि से टटिया बनाकर चारों ओर से बंद कर दिया जाता है। इसमें हवा का आवागमन स्वाभाविक रूप से छेद होने के कारण अपने आप ही होता रहता है।

पक्के नादेप

पक्के नाडेप ईंटों के द्वारा बनाये जाते हैं। नाडेप टांके का आकार 10 फीट लम्बा 6 फीट चौड़ा और 3 फीट ऊँचा अथवा 12 फीट लम्बा, 5 फीट चौड़ा और 3 फीट ऊँचा भी अनुशंसित है। उक्त आकार का एक लेआउट बनाकर ईंटों को जोड़कर टांका बनाया जावे। ईंटों को जोड़ते समय तीसरे, छठवें और नवें रद्दे में मधुमक्खी के छत्ते के समान 6-7 के ब्लाक/छेद छोड़ दिये जावे। जिससे टांके के अंदर रखे पदार्थ को बाह्य वायु मिलती रहें। इससे एक वर्ष में एक ही टांके से तीन बार खाद तैयार किया जा सकता है।

नादेप खाद बनाने की विधि

आवश्यक सामग्री
टांके को भरने के लिये निम्नानुसार सामग्री की आवश्यकता होगीः-
प्रक्षेत्र/खेतों पर उपलब्ध कचरा बायोमास – 1400 से 1600 किलो
गोबर – 100 से 120 किलो ( 8 से 10 टोकरी )
मिट्टी ( भुरभुरी, छनी हुई ) – 600 से 1800 किलो ( लगभग 120 टोकरी)
पानी – 1500 से 2000 लीटर (लगभग 8-10 ड्रम )
यदि बॉयोमास हरा एवं गीला है तब पानी की आवश्यकता कम रहेगी।

टांका भराई

प्रथम उपचार

प्रथम परत :

1. बायोमास कचरा आदि को 3-4 इंच के टुकड़ों में काट लें तथा इसे 6 इंच की मोटी तह में जमाएं।
2. इस वानस्पतिक कचरे को 4से 5 किलो गोबर का 100 से 125 लीटर पानी में घोल बनाकर अच्छी तरह से गीला करें।
3. इस गीली तह पर 50-60 किलो साफ छनी हुई मिट्टी फैलाकर डाले तथा थोड़ा गोबर का घोल छिड़क देवें।

द्वितीय परत :

प्रथम परत के अनुरूप क्रमवार द्वितीय परत डाली जावे।
टांके की दीवारों, फर्श को गोबर के घोल से तर करें तद्उपरान्त निम्नानुसार प्रक्रिया अपनाई जावे।
इसी क्रम में टांके को 10-12 परतों तक भरा जावें। सबसे उपरी परत को झोपड़ीनुमा आकार में भरकर गोबर मिट्टी से लीपकर सील कर दें।
1. इस पर दरार न पड़ने दें, दरार पड़ने पर इसे बार बार लीपते रहें।
2. 5-6 दिन बाद जाली के छेदों में से देखें, गरमी महसूस होगी।
3. 15-20 दिन में टांके की सामग्री सिकुड़कर टांके के 8-9 इंच अंदर धंस जावेगी।

द्वितीय उपचार

यथावत

(1) इसे फिर से वनस्पति कचरे की उपरोक्त विधि से 6-6 इंच की परत से टांके से दो ढाई फीट ऊपर तक भर दें और टांके को गोबर से लीप कर सील कर दें। जाली के छेदों से हाथ डालकर देखते रहें, सामग्री नम बनी रहे उसे सूखने न दें, जरूरत के अनुसार इन्हीं छेदों में पानी छींटते रहें।
75-90 दिन बाद जब खाद लगभग पक गई हो और तापमान सामान्य हो जावे तब टांके में सब्बल से जगह जगह 15-20 छेद करें। अब एक-एक किलो राइजोबियम जीवाणु,एजेटोबेक्टर जीवाणु और पी.एस.बी. एक-एक बाल्टी पानी में अलग-अलग घोल कर अलग-अलग छेदों में डालें। छेदों को फिर बंद कर दें। उचित यह होगा कि जिस फसल में उत्पादित खाद का उपयोग किया जाना है उसी फसल से संबंधित राइजोबियम कल्चर का उपयोग करें। खाद की गुणवत्ता बढ़ेगी। नत्रजन, स्फुर व पोटाश की मात्रा अधिक होगी और अधिक संख्या में जीवाणु भी होंगे।
(2) 110-120 दिन बाद खाद टांके से निकालें। खाद के ढेर को छांव में रखकर पत्तों से ढक दें। इस पर पानी का हल्का छिड़काव करें। ऊपरी अधपका 10-15 प्रतिशत कचरा अलग कर उसे नया टांका भरते समय काम में लावें।
(3) एक टांके से 2.5 से 2.7 टन खाद निकलती हैं, जो एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिये पर्याप्त होगी।

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