खेती संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव

खेतों की अंतिम जुताई और फसल की बुआई लाइन में ढाल को काटते हुए होनी चाहिए।
भू-क्षरण को रोकने के लिए ढलुआ जमीन पर मेढ़ बनाकर खेती करें।
ऊपरी जमीन पर मिटटी की गहराई कम होने पर खेती न करें। ऐसी जमीनों में फलदार वृक्ष या अन्य पेड़ लगायें।
खेत परती न छोड़ें। जुताई हो जाने से वर्षा-जल का बहाव रुकेगा और मिटटी की जलधारणा शक्ति बढ़ेगी।
खरपतवार नियंत्रण के लिए भी अच्छी जुताई और कतार में बुआई आवश्यक है।
वर्षा जल को छोटे-छोटे तालाबों में संचित कर खेती में व्यवहार करें।
दलहनी या तेलहनी फसल अधिक लगायें। इसमें पटवन की कम आवश्यकता होती है और सीमित जल से अधिक जमीन में दोहरी फसल ली जा सकती है।
समुचित उपज के लिए जलछाजन को एक इकाई मानकर करें।
निचली जमीनों में कच्चा कुआँ की मदद से गर्मी में सब्जी की अच्छी खेती की जा सकती है या फिर अधिक आमदनी देने वाली दूसरी फसल ली जा सकती है।
अच्छी जुताई के लिए पशुचालित बिरसा रिजर हल एवं मोल्ड-बोर्ड हल का उपयोग करें।
खेत में पहली जुताई मोल्ड बोर्ड हल से ही करें। इस हल से मिटटी पलट जाएंगी एवं हानिकारक कीड़े ऊपर आ जाएंगे।
कम लागत पर अच्छी खेती के लिए छोटे-छोटे कृषि यंत्रों का व्यवहार करें।
फसल कटाई के लिए छोटा रीपर उपलब्ध हैं, जो 3.5 अश्वशक्ति ईंजन से चलता है। इससे प्रति दिन करीब
हेक्टेयर धान एवं गेहूँ की कटाई कर सकते हैं।
पकी फसल को समय पर काट लें। अधिक दिनों तक खेत में छोड़ देने पर दाने झड़ने लगेंगे। दौनी के लिए छोटे यंत्र उपलब्ध हैं। इसे उपयोग कर किसान खर्च कम कर सकते है।
ओसौनी और भण्डारण वैज्ञानिक विधि से करें। प्राथमिक प्रसंस्करण के बाद ही उपज बाजार में बेचें ताकि अधिक लाभ प्राप्त हो।

Leave a Comment