भारतीय दण्ड संहिता भाग -2

अध्याय 4

साधारण अपवाद
धारा 76 विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा 77 न्यायिकत: कार्य करने हेतु न्यायाधीश का कार्य
धारा 78 न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य
धारा 79 विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा 80 विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना
धारा 81 कार्य जिससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, किन्तु जो आपराधिक आशय के बिना और अन्य अपहानि के निवारण के लिये किया गया है
धारा 82 सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य
धारा 83 सात वर्ष से ऊपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य
धारा 84 विकृतिचित्त व्यक्ति का कार्य
धारा 85 ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरूद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुंचने में असमर्थ है
धारा 86 किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या ज्ञान का होना अपेक्षित है
धारा 87 सम्मति से किया गया कार्य जिसमें मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय हो और न उसकी सम्भव्यता का ज्ञान हो
धारा 88 किसी व्यक्ति के फायदे के लिये सम्मति से सदभवनापूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है
धारा 89 संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिये सद्भावनापूर्वक किया गया कार्य
धारा 90 सम्मति
उन्मत्त व्यक्ति की सम्मति
शिशु की सम्मति
धारा 91 एसे कार्यों का अपवर्णन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वतः अपराध है
धारा 92 सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य
धारा 93 सदभावनापूर्वक दी गयी संसूचना
धारा 94 वह कार्य जिसको करने के लिये कोई ब्यक्ति धमकियों द्धारा विवश किया गया है
धारा 95 तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य
निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में
धारा 96 निजी प्रतिरक्षा में दी गयी बातें
धारा 97 शरीर तथा सम्पत्ति पर निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
धारा 98 ऐसे ब्यक्ति का कार्य के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृत आदि हो
धारा 99 कार्य, जिनके विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार
धारा 100 शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है
धारा 101 कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है
धारा 102 शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा 103 कब सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है
धारा 104 ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का कब होता है
धारा 105 सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा 106 घातक हमले के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा के अधिकार जबकि निर्दोश व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है

अध्याय 5

दुष्प्रेरण के विषय में
धारा 107 किसी बात का दुष्प्रेरण
धारा 108 दुष्प्रेरक
धारा 108 क भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण
धारा 109 दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए और जहां तक कि उसके दण्ड के लिये कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है
धारा 110 दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है
धारा 111 दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है
धारा 112 दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिये और किये गये कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है
धारा 113 दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक दवारा आशयित से भिन्न हो
धारा 114 अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति
धारा 115 मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण यदि अपराध नहीं किया जाता यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है
धारा 116 कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण अदि अपराध न किया जाए यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो
धारा 117 लोक साधारण दवारा या दस से अधिक व्यक्तियों दवारा अपराध किये जाने का दुष्प्रेरण
धारा 118 मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना यदि अपराध कर दिया जाए – यदि अपराध नहीं किया जाए
धारा 119 किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक दवारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है
यदि अपराध कर दिया जाय
यदि अपराध मृत्यु, आदि से दण्डनीय है
यदि अपराध नहीं किया जाय
धारा 120 कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए – यदि अपराध नहीं किया जाए

अध्याय 5 क

आपराधिक षडयन्त्र
धारा 120 क आपराधिक षडयंत्र की परिभाषा
धारा 120 ख आपराधिक षडयंत्र का दण्ड

अध्याय 6

राज्य के विरूद्ध अपराधों के विषय में
धारा 121 भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना
धारा 121 क धारा 121 दवारा दण्डनीय अपराधों को करने का षडयंत्र
धारा 122 भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना
धारा 123 युद्ध करने की परिकल्पना को सुनकर बनाने के आशय से छुपाना
धारा 124 किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोपित करने के आशय से राट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना
धारा 124 क राजद्रोह
धारा 125 भारत सरकार से मैत्री सम्बंध रखने वाली किसी एशियाई शक्ति के विरूद्ध युद्ध करना
धारा 126 भारत सरकार के साथ शान्ति का संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूटपाट करना
धारा 127 धारा 125 व 126 में वर्णित युद्ध या लूटपाट दवारा ली गयी सम्पत्ति प्राप्त करना
धारा 128 लोक सेवक का स्व ईच्छा राजकैदी या युद्धकैदी को निकल भागने देना
धारा 129 उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना
धारा 130 ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना

अध्याय 7

सेना, नौसेना और वायुसेना से सम्बन्धित अपराधें के विषय में
धारा 131 विद्रोह का दुष्प्रेरण का किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना
धारा 132 विद्रोह का दुष्प्रेरण, यदि उसके परिणामस्वरूप विद्रोह हो जाए।
धारा 133 सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारी, जब कि वह अधिकारी अपने पद-निष्पादन में हो, पर हमले का दुष्प्रेरण।
धारा 134 हमले का दुष्प्रेरण जिसके परिणामस्वरूप हमला किया जाए।
धारा 135 सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा परित्याग का दुष्प्रेरण।
धारा 136 अभित्याजक को संश्रय देना
धारा 137 मास्टर की उपेक्षा से किसी वाणिज्यिक जलयान पर छुपा हुआ अभित्याजक
धारा 138 सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण।
धारा 138 क पूर्वोक्त धाराओं का भारतीय सामुद्रिक सेवा को लागू होना
धारा 139 कुछ अधिनियमों के अध्यधीन व्यक्ति।
धारा 140 सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली पोशाक पहनना या प्रतीक चिह्न धारण करना।

अध्याय 8

सार्वजनिक शान्ति के विरुद्ध अपराध
धारा 141 विधिविरुद्ध जनसमूह।
धारा 142 विधिविरुद्ध जनसमूह का सदस्य होना।
धारा 143 गैरकानूनी जनसमूह का सदस्य होने के नाते दंड
धारा 144 घातक आयुध से सज्जित होकर विधिविरुद्ध जनसमूह में सम्मिलित होना।
धारा 145 किसी विधिविरुद्ध जनसमूह, जिसे बिखर जाने का समादेश दिया गया है, में जानबूझकर शामिल होना या बने रहना।
धारा 146 उपद्रव करना
धारा 147 बल्वा करने के लिए दण्ड
धारा 148 घातक आयुध से सज्जित होकर उपद्रव करना।
धारा 149 विधिविरुद्ध जनसमूह का हर सदस्य, समान लक्ष्य का अभियोजन करने में किए गए अपराध का दोषी।
धारा 150 विधिविरुद्ध जनसमूह में सम्मिलित करने के लिए व्यक्तियों का भाड़े पर लेना या भाड़े पर लेने के लिए बढ़ावा देना।
धारा 151 पांच या अधिक व्यक्तियों के जनसमूह जिसे बिखर जाने का समादेश दिए जाने के पश्चात् जानबूझकर शामिल होना या बने रहना
धारा 152 लोक सेवक के उपद्रव / दंगे आदि को दबाने के प्रयास में हमला करना या बाधा डालना।
धारा 153 उपद्रव कराने के आशय से बेहूदगी से प्रकोपित करना
धारा 153 क धर्म, मूलवंश, भाषा, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द्र बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना।
धारा 153 ख राष्ट्रीय अखण्डता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, प्राख्यान
धारा 154 उस भूमि का स्वामी या अधिवासी, जिस पर गैरकानूनी जनसमूह एकत्रित हो
धारा 155 व्यक्ति जिसके फायदे के लिए उपद्रव किया गया हो का दायित्व
धारा 156 उस स्वामी या अधिवासी के अभिकर्ता का दायित्व, जिसके फायदे के लिए उपद्रव किया जाता है
धारा 157 विधिविरुद्ध जनसमूह के लिए भाड़े पर लाए गए व्यक्तियों को संश्रय देना।
धारा 158 विधिविरुद्ध जमाव या बल्वे में भाग लेने के लिए भाड़े पर जाना
धारा 159 दंगा
धारा 160 उपद्रव करने के लिए दण्ड।

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