पूँजीवाद का प्रभाव एवं इसकी प्रतिक्रिया

पूंजीवाद (Capitalism) सामन्यत: उस आर्थिक प्रणाली या तंत्र को कहते हैं जिसमें उत्पादन के साधन पर निजी स्वामित्व होता है। इसे कभी कभी “व्यक्तिगत स्वामित्व” के पर्यायवाची के तौर पर भी प्रयुक्त किया जाता है यद्यपि यहाँ “व्यक्तिगत” का अर्थ किसी एक व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्तियों के समूह से भी। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सरकारी प्रणाली के अतिरिक्त अपनी तौर पर स्वामित्व वाले किसी भी आर्थिक तंत्र को पूंजीवादी तंत्र के नाम से जाना जा सकता है। दूसरे रूप में ये कहा जा सकता है कि पूंजीवादी तंत्र लाभ के लिए चलाया जाता है, जिसमें निवेश, वितरण, आय उत्पादन मूल्य, बाजार मूल्य इत्यादि का निर्धारण मुक्त बाजार में प्रतिस्पर्धा द्वारा निर्धारित होता है।
पूँजीवाद एक आर्थिक पद्धति है जिसमें पूँजी के निजी स्वामित्व, उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत नियंत्रण, स्वतंत्र औद्योगिक प्रतियोगिता और उपभोक्ता द्रव्यों के अनियंत्रित वितरण की व्यवस्था होती है। पूँजीवाद की कभी कोई निश्चित परिभाषा स्थिर नहीं हुई; देश, काल और नैतिक मूल्यों के अनुसार इसके भिन्न-भिन्न रूप बनते रहे हैं।

पूँजीवाद का प्रभाव एवं इसकी प्रतिक्रिया

औद्योगिक क्रांति के आरंभिक दिनों में इंग्लैंड में ऐडम स्मिथ का अहस्तक्षेप का सिद्धांत (Laissez-Faire) वैयक्तिक स्वतंत्रता और अनियंत्रित आर्थिक व्यवस्था का आधार बन गया। किंतु इस औद्योगिक परिवर्तन से उत्पन्न परिस्थितियों ने सरकार को उद्योगपतियों और श्रमिकों की समस्याओं में हस्तक्षेप करने को बाध्य कर दिया। इन्हीं दिनों समाजवाद (सोशलिज्म) शब्द का प्रयोग प्रथम बार हुआ (कोआपरेटिव मैगज़ीन, 1927)। इस स्थिति में तथाकथित स्वतंत्र उद्योग, 18 वीं सदी के उदारतावाद और आज के समाजवादी नियंत्रण का समन्वित रूप होगा। अमेरीकी पूँजीवाद, व्यापार में व्यक्तिगत आधिपत्य और राजकीय संचालन का मिश्रित रूप है। यद्यपि बहुक्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता उद्योग का मुख्य आधार है तथापि पिछले वर्षों वाणिज्य और श्रमिक संगठनों में एकाधिकारिक नियंत्रण की स्थिति द्रुत गति से बढ़ी है। संपत्ति और आय के अव्यवस्थित वितवरण से लोगों का सामाजिक स्तर बहुत नीचे गया है। कंपनी ट्रस्टीशिप और पब्लिक एजेंसी जैसे अनेक संगठनों ने प्रतिद्वंद्विता के सिद्धांत को विकृत कर दिया है।
राष्ट्रीयकरण की योजनाओं से नियंत्रण की मात्रा में वृद्धि हुई और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को जबर्दस्त धक्का लगा। प्रत्येक राष्ट्र के सम्मुख यह समस्या रहती है, कि वह अपनी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्थाएँ करे। व्यवस्था के निर्णय, उपलब्ध श्रमशक्ति और आर्थिक स्रोतों पर निर्भर करते हैं। राज्य प्रतिनिधियों और योजनाविदों के सम्मुख उत्पादन के रूप, मात्रा और तरीके आदि के प्रश्न रहते हैं। समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत इसके लिए सरकारों और सरकार द्वारा नियुक्त योजनासमितियों द्वारा निर्णय किए जाते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत एक व्यक्ति या समूह को अपने आर्थिक नियोजन का स्वतंत्र अधिकार रहता है।

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