उत्परिवर्तन का परिचय और कारण

जीन डी एन ए के न्यूक्लियोटाइडओं का ऐसा अनुक्रम है, जिसमें सन्निहित कूटबद्ध सूचनाओं से अंततः प्रोटीन के संश्लेषण का कार्य संपन्न होता है। यह अनुवांशिकता के बुनियादी और कार्यक्षम घटक होते हैं। यह यूनानी भाषा के शब्द जीनस से बना है। क्रोमोसोम पर स्थित डी.एन.ए. (D.N.A.) की बनी अति सूक्ष्म रचनाएं जो अनुवांशिक लक्षणें का धारण एंव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरण करती हैं, उन्हें जीन (gene) कहते हैं।
जीन आनुवांशिकता की मूलभूत शारीरिक इकाई है। यानि इसी में हमारी आनुवांशिक विशेषताओं की जानकारी होती है जैसे हमारे बालों का रंग कैसा होगा, आंखों का रंग क्या होगा या हमें कौन सी बीमारियां हो सकती हैं। और यह जानकारी, कोशिकाओं के केन्द्र में मौजूद जिस तत्व में रहती है उसे डीऐनए कहते हैं। जब किसी जीन के डीऐनए में कोई स्थाई परिवर्तन होता है तो उसे उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) कहा जाता है। यह कोशिकाओं के विभाजन के समय किसी दोष के कारण पैदा हो सकता है या फिर पराबैंगनी विकिरण की वजह से या रासायनिक तत्व या वायरस से भी हो सकता है।
प्रकृति के परिवर्तन में आण्विक डीएनए म्यूटेशन हो सकता है या नहीं कर सकते मापने में परिवर्तन के परिणामस्वरूप एक जावक जीव की उपस्थिति या कार्य है।

परिचय

जीवन की इकाई कोशिका है और कोशिकाओं का समुच्चय जीवित शरीरी या प्राणी कहा जाता है। कल्पना कीजिए, इस सृष्टि में यदि एक ही आकार के जीव होते, एक ही ऋतु होती और रात अथवा दिन में से कोई एक ही रहा करता तो कैसा लगता। एक ही प्रकार का भोजन, एक ही प्रकार का कार्य, एक ही प्रकार के परिवेश का निवास ऊब उत्पन्न कर देता है इसीलिए हम उसमें किंचित् परिवर्तन करते रहते हैं। प्रकृति भी एकरसता से ऊबकर परिवर्तन करती रहती है। जंतुजगत् की विविधता पर हम दृष्टिपात करें तो पाएँगे कि, उदाहरण के लिए, बिल्ली जाति के जंतुओं में ही कितना भेद है : बिल्ली, शेर, चीता, सिंह, सभी इसी वर्ग के जंतु हैं। इसी प्रकार, कुत्तों में देशी, शिकारी, बुलडाग, झबरा, आदि कई नस्ल दिखलाई देते हैं।
इस विविधता के मूल कारण का ज्ञान सभी को नहीं होता और सबसे बड़ी बात तो यह है कि कौतूहलवश भी कोई इस भेद को जानना नही चाहता। हमें यह वैविध्य इतना सहज और सामान्य प्रतीत होता है कि हमारा ध्यान इस ओर कभी नहीं जाता। किंतु, यदि हम इस वैविध्य के कारण की मीमांसा करें तो सचमुच हमें चकित हो जाना पड़ेगा। इस वैविध्य का मूल कारण उत्परिवर्तन है।
उत्परिवर्तन की परिभाषा अनेक प्रकार से दी गई है, किंतु सभी का निष्कर्ष यही है कि यह एक प्रकार का आनुवंशिक परिवर्तन (hereditary change) है। कोशिकाविज्ञान (cytology) के विद्यार्थी यह जानते हैं कि कोशिकाओं के केंद्रक में गुणसूत्र (chromosomes) एक नियत युग्मसंख्या (no. of pairs) में पाए जाते हैं। इन सूत्रों पर निश्चित दूरियों और स्थानों (loci) पर मटर की फलियों की भाँति जीन्स (genes) लिपटे रहते हैं। जीवरासायनिक दृष्टि से जीन्स न्यूक्लीइक अम्ल (nucleic acids) होते हैं। इनकी एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि ये, कोशिका विभाजन (cell divisions) के समय, स्वत: आत्मप्रतिकृत (self replicated) हो जाते हैं।
डीआक्सीरिबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) के वाट्सन-क्रिक माडेलों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जब जब डी-एन-ए-की दुहरी कुंडलिनी (double helix) प्रतिलिपित होती है तब तब मूल संरचना की हूबहू अनुकृति (replica) तैयार होती जाती है। इस प्रक्रिया में बिरले ही अंतर पड़ता है। किंतु भूल तो सभी से होती है–प्रकृति भी इससे अछूती नहीं है। प्रतिलिपिकरण के समय, कभी कभी, न्यूक्लिओटाइडों के संयोजन में दोष उत्पन्न हो जाता है। यह दोष दुर्घटनावश ही होता है; इसी को उत्परिवर्तन की संज्ञा प्रदान की गई है।
गोल्डस्मिट् ने उत्परिवर्तन की परिभाषा देते हुए बतलाया है कि उत्परिवर्तन वह साधन (means) है, जिसके द्वारा नए आनुवंशिक टाइप (hereditary types) उत्पन्न होते हैं। डॉ॰जान्स्की और उनके सहयोगियों के मतानुसार उत्परिवर्तन नवीन किस्मों या नस्लों की उत्पत्ति करनेवाले पथभ्रष्ट बिन्दु (point of departure) है।
उद्विकास (Evolution) के अनेक प्रमाणों में उत्परिवर्तन को भी एक प्रमाण माना जाता है। इस संबंध में हालैंड के वनस्पतिशास्त्री, ह्यगो डीविज्र (De Vries) का नाम संमानपूर्वक लिया जाता है। इन्होंने ईनोथेरा लैमाकिएना (eenothera lamarckiana) नामक एक पौधे पर कई प्रकार के प्रयोग किए थे। इस पौधे में प्रतिवर्ष कई प्रकार के स्पीशीज़ होते जाते थे, जिन्हें उन्होंने पाँच समूहों में वर्गीकृत किया और अपने प्रयोगों के परिणामों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले–

  1. नवीन स्पीशीज़ की उत्पत्ति क्रमिक न होकर तात्कालिक एक-ब-एक होती है;
  2. आरंभ में ये स्पीशीज़ अपने माता पिता की ही भाँति स्थिर होते हैं।
  3. एक ही समय में सामान्य तौर पर एक साथ एक जैसे बहुत से स्पीशीज़ उत्पन्न होते हैं।
  4. उत्परिवर्तनों की कोई निश्चित दिशा नहीं होती, वे किसी भी रूप में विकसित हो सकते हैं।
  5. उत्परिवर्तन बीच बीच में कई बार हो सकता है।
    इसी प्रकार के प्रयोग बीडिल एवं टैटम नामक दो अमरीकन जीव वैज्ञानिकों ने न्यूरोस्पोरा (neurospora) नामक फफूँदी (mold) पर किए थे। उन्होंने इस रोग के बीजाणु (spores) को एक्स अथवा अल्ट्रावायलेट किरणों द्वारा अभिकर्मित (treatment) करके उनके बढ़ने की गति की जाँच की। उन्होंने पाया कि कल्चर मीडियम में इस प्रकार के अभिकर्मित बीजाणु बढ़ नहीं पा रहे हैं, अत: उन्होंने कुछ एमिनोएसिडों को मिला दिया। इसके फलस्वरूप वे ही पौधे पुन: वृद्धि को प्राप्त होने लगे। अत: उनका मत था कि विकिरण के कारण बीजाणुओं की सामान्य उत्पादन क्षमता पर आघात पहुँचता है और यह दोष अगली पीढ़ियों में भी वर्तमान रहता है। इसी प्रकार के आकस्मिक आनुवंशिक परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहा जाता है।
    सजीव प्राणियों के सभी प्रकार के आकार, आकृति, रासायनिक संरचना, रोग आदि गुणों (characters) का उत्परिवर्तन हो सकता है। इसी आधार पर उत्परिवर्तनों की कई कोटियाँ बना ली गई हैं, जैसे जीन उत्परिवर्तन, गुणसूत्र उत्परिवर्तन आदि। उत्परिवर्तन को तात्कालिक अथवा आकस्मिक आनुवंशिक परिवर्तन कहा गया है। यह परिवर्तन दोषयुक्त ही हो, यह कोई आवश्यक नहीं है। सभी उत्परिवर्तन दूषित या हानिकारक नहीं होते। इनसे लाभ भी होता है और इस प्राकृतिक दोष का लाभ उठाया भी जाता रहा है। इस पर हम यथास्थान पुन: विचार करेंगे।

उत्परिवर्तन की घटनाएँ विरल अथवा यदा-कदा होती हैं। ड्रोसोफिला (drosophila) नामक कदली मक्खी (fruit fly) के अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि इस प्रकार का उत्परिवर्तन कई लाख सामान्य स्पीशीज़ में से किसी एक में बहुत ही नगण्य रूप में परिलक्षित होता है। आल्टेनवर्ग ने रेस के घोड़ों की आधुनिक तीव्र गति का कारण क्रमिक आरोपित उत्परिवर्तन बतलाया है। यह या ऐसा परिवर्तन सदा लाभप्रद ही हो (आल्टेन वर्ग के मतानुसार), ऐसा नहीं कह सकते। बहुत से उदाहरणों में, इस उत्परिवर्तन के कारण घोड़ों की गति में न्यूनता भी आ सकती है। अत: निष्कर्ष यही निकलता है कि उत्परिवर्तन “मनमाना परिवर्तन” (random change) होता है। यहाँ डार्विन का “प्राकृतिक वरण का सिद्धांत” (theory of natural selection) अथवा “योग्यतम का जीवन” (survival of the fittest) लागू होता है, जिसके अनुसार इस आकस्मिक परिवर्तन को सह सकनेवाले जीव जीवित रह पाते हैं, अन्यथा निर्बलों की मृत्यु हो जाती है। मैंडेल ने मटर की फलियों पर जो प्रयोग किए थे, उनके परिणामों का कारण यही उत्परिवर्तन बतलाया जाता है।
उत्परिवर्तन कब होगा, यह कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता। कोशिकाविभाजन के उपरांत वर्धन (development) की किसी भी अवस्था या चरण (stage) में उत्परिवर्तन की घटना घट सकती है। यदि उत्परिवर्तन किसी एक ही बीजाणु (gamete) या युग्मक में होता है तो भावी संतति में से केवल एक में यह परिलक्षित होगा। उत्परिवर्तित पीढ़ी में से आधी संतति में उत्परिवर्तन के लक्षण वर्तमान होंगे और शेष आधा इनसे अप्रभावित रहेगा। उत्परिवर्तन के लक्षणों से युक्त संततियों की भावी पीढ़ियों में भी वे ही लक्षण दिखलाई देते रहेंगे। काय कोशिकाओं (somatic or body cells) में उत्परिवर्तन हो जाने पर उसे पहचान पाना दुष्कर कार्य होता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि वह सर्वथा अदृश्य हो जाता है और उसपर किसी भी दृष्टि भी नहीं जा पाती। किंतु जनन कोशिकाओं (germ or reproduction cells) में हुए उत्परिवर्तन जनांकिकीय (genetically) दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं।

उत्परिवर्तन के कारण

उत्परिवर्तन क्यों होते हैं, इसका संतोषजनक उतर जीव वैज्ञानिकों के पास उपलब्ध नहीं है। हाँ, इन लोगों ने कुछ ऐसी विधियाँ निकाली हैं, जिनके द्वारा कृत्रिम या आरोपित ढंग से उत्परिवर्तन किए जा सकते हैं। आरोपित उत्परिवर्तन सर्वदा बाहरी कारणों से ही हो सकता है, जिन्हें हम नीचे दी गई कोटियों में वर्गीकृत कर सकते हैं:–

  1. तापक्रम-जननकोशिकाओं में सहनबिंदु तक तापक्रम में वृद्धि कर दी जाए तो उत्परिवर्तन की गति बढ़ जाएगी।
  2. रसायन-सरसों के तेल का धुआँ, फार्मैल्डिहाइड पेराक्साइड, नाइट्रस अम्ल आदि का प्रयोग करने पर उत्परिवर्तन दर में वृद्धि हो सकती है।
  3. विकिरण-एक्सकिरण, गामा, बीटा, अल्ट्रावायलेट किरणों आदि के प्रयोग से भी उत्परिवर्तन दर में वृद्धि हो जाती है। स्वर्गीय प्रोफेसर एच.जे.मुलर ने इस कारक पर अनेक अद्भुत अनुसंधान किए हैं।
  4. वायुमंडल में असाधारण रूप से परिवर्तन करके उत्परिवर्तन दर में वृद्धि बढाई जा सकती है

उत्परिवर्तन के प्रकार

जीन-विनिमय के समय कुछ दुर्घटनाएँ हो सकती हैं। इन दुर्घटनाओं को हम तीन समूहों में विभाजित कर सकते हैं:–
न्यूक्लीओटाइड का अतिरिक्त संयोग,
न्यूक्लीओटाइड का वियोग (deletion) तथा
न्यूक्लीओटाइड का स्थानांतरण।
इनमें से प्रथम दो प्रकार के परिवर्तन गंभीर माने गए हैं, जिनसे कोशिका की मृत्यु तक हो सकती है। तीसरे प्रकार का परिवर्तन इतना गंभीर नहीं होता। आनुवंशिकी वैज्ञानिकों ने उत्परिवर्तन के निम्नलिखित भेद बतलाए हैं:–

  1. जीन या बिंदु उत्परिवर्तन
  2. आरोपित उत्परिवर्तन

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