आपेक्षिकता सिद्धांत का परिचय

आपेक्षिकता सिद्धांत अथवा सापेक्षिकता का सिद्धांत (अंग्रेज़ी: थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी), या केवल आपेक्षिकता, आधुनिक भौतिकी का एक बुनियादी सिद्धांत है जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन ने विकसित किया और जिसके दो बड़े अंग हैं – विशिष्ट आपेक्षिकता (स्पेशल रिलेटिविटी) और सामान्य आपेक्षिकता (जनॅरल रिलेटिविटी)। फिर भी कई बार आपेक्षिकता या रिलेटिविटी शब्द को गैलीलियन इन्वैरियन्स के संदर्भ में भी प्रयोग किया जाता है। थ्योरी ऑफ् रिलेटिविटी नामक इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले सन 1906 में मैक्स प्लैंक ने किया था। यह अंग्रेज़ी शब्द समूह “रिलेटिव थ्योरी” (जर्मन : Relativtheorie) से लिया गया था जिसमें यह बताया गया है कि कैसे यह सिद्धांत प्रिंसिपल ऑफ रिलेटिविटी का प्रयोग करता है। इसी पेपर के चर्चा संभाग में अल्फ्रेड बुकरर ने प्रथम बार “थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी” (जर्मन : Relativitätstheorie) का प्रयोग किया था।

परिचय

आपेक्षिकता सिद्धांत (रिलेटिविटी थ्योरी ) संक्षेप में यह है कि ‘निरपेक्ष’ गति तथा ‘निरपेक्ष’ त्वरण का अस्तित्व असंभव है, अर्थात् ‘निरपेक्ष गति’ एवं ‘निरपेक्ष त्वरण’ शब्द वस्तुत: निरर्थक हैं। यदि ‘निरपेक्ष गति’ का अर्थ होता तो वह अन्य पिण्डो की चर्चा किए बिना ही निश्चित हो सकती। परन्तु सब प्रकार से चेष्टा करने पर भी किसी पिण्ड की ‘निरपेक्ष’ गति का पता निश्चित रूप से प्रयोग द्वारा प्रमाणित नहीं हो सका है और अब तो आपेक्षिकता सिद्धांत बताता है कि ऐसा निश्चित करना असंभव है। आपेक्षिकता सिद्धांत से भौतिकी में एक नए दृष्टिकोण का प्रारंभ हुआ। आपेक्षिकता सिद्धांत के आने से भौतिकी के कतिपय पुराने सिद्धांतों का दृढ़ स्थान डिग गया और अनेक मौलिक कल्पनाओं के विषय में सूक्ष्म विचार करने की आवश्यकता दिखाई देने लगी। विज्ञान में सिद्धांत का कार्य प्राय: ज्ञात फलों को व्यवस्थित रूप से सूत्रित करना होता है और उसके बाद उस सिद्धांत से नए फलों का अनुमान करके प्रयोग द्वारा उन फलों की परीक्षा की जाती है। आपेक्षिकता सिद्धांत इन दोनों कार्यों में सफल रहा है।
19वीं शताब्दी के अंत तक भौतिकी का विकास न्यूटन प्रणीत सिद्धांतों के अनुसार हो रहा था। प्रत्येक नए आविष्कार अथवा प्रायोगिक फल को इन सिद्धांतों के दृष्टिकोण से देखा जाता था और आवश्यक नई परिकल्पनाएँ बनाई जाती थीं। इनमें सर्वव्यापी ईथर का एक विशिष्ट स्थान था। ईथर के अस्तित्व की कल्पना करने के दो प्रमुख कारण थे। प्रथम तो विद्युतचुम्बकीय तरंगों के कंपन का एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रसरण होने के लिए ईथर जैसे माध्यम की आवश्यकता थी। द्वितीय, याँत्रिकी में न्यूटन के गति विषयक समीकरणों के लिए, और जिस पार्श्वभूमि पर ये समीकरण आधारित थे उसके लिए भी, एक प्रामाणिक निर्देशांक(स्टैंडर्ड ऑफ रेफ़रेंस) की आवश्यकता थी। प्रयोगों के फलों का यथार्थ आकलन होने के लिए ईथर पर विशिष्ट गुणधर्मों का आरोपण किया जाता था। ईथर सर्वव्यापी समझा जाता था और संपूर्ण दिशाओं में तथा पिंडों में भी उसका अस्तित्व माना जाता था। इस स्थिर ईथर में पिंड बिना प्रतिरोध के भ्रमण कर सकते हैं, ऐसी कल्पना थी। इन गुणों के कारण ईथर को निरपेक्ष मानक समझने में कोई बाधा नहीं थी। प्रकाश की गति 3×108 मी. प्रति सेकेंड है, यह ज्ञात हुआ था और प्रकाश की तरंगें ‘स्थिर’ ईथर के सापेक्ष इस गति से विकीरित होती हैं, ऐसी कल्पना थी। याँत्रिकी में वेग, त्वरण, बल इत्यादि के लिए भी ईथर निरपेक्ष मानक समझा जाता था।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ईथर का अस्तित्व तथा उसके गुणधर्म स्थापित करने के अनेक प्रयत्न प्रयोग द्वारा किए गए। इनमें माइकेलसनमॉर्ले का प्रयोग विशेष महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय है। पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा ईथर के सापेक्ष जिस गति से करती है उस गति का यथार्थ मापन करना इस प्रयोग का उद्देश्य था। किंतु यह प्रयत्न असफल रहा और प्रयोग के फल से यह अनुमान निकाला गया कि ईथर के सापेक्ष पृथ्वी की गति शून्य है। इसका यह भी अर्थ हुआ कि ईथर की कल्पना असत्य है, अर्थात् ईथर का अस्तित्व ही नहीं है। यदि ईथर ही नहीं है तो निरपेक्ष मानक का भी अस्तित्व नहीं हो सकता। अत: गति केवल सापेक्ष ही हो सकती है। भौतिकी में सामान्यत: गति का मापन करने के लिए अथवा फल व्यक्त करने के लिए किसी भी एक पद्धति का निर्देश (रेफ़रेंस) देकर कार्य किया जाता है। किंतु इन निर्देशक पद्धतियों में कोई भी पद्धति ‘विशिष्टतापूर्ण’ नहीं हो सकती, क्योंकि यदि ऐसा होता तो उस ‘विशिष्टतापूर्ण’ निर्देशक पद्धति को हम विश्रांति का मानक समझ सकते। अनेक प्रयोगों से ऐसा ही फल प्राप्त हुआ।
इन प्रयोगों के फलों से केवल भौतिकी में ही नहीं, बल्कि विज्ञान तथा दर्शन में भी गंभीर अशांति उत्पन्न हुई। २०वीं शताब्दी के प्रारंभ में (1904 में) प्रसिद्ध फ्रेंच गणितज्ञ एच. पॉइन्कारे ने आपेक्षिकता का प्रनियम प्रस्तुत किया। इनके अनुसार भौतिकी के नियम ऐसे स्वरूप में व्यक्त होने चाहिए कि वे किसी भी प्रेक्षक (देखनेवाले) के लिए वास्तविक हों। इसका अर्थ यह है कि भौतिकी के नियम प्रेक्षक की गति के ऊपर अवलंबित न रहें। इस प्रनियम से दिक् (स्पेस) तथा काल (टाइम) की प्रचलित धारणाओं पर नया प्रकाश पड़ा। इस विषय में आइंस्टाइन की विचारधारा, यद्यपि वह क्रांतिकारक थी, प्रयोगों के फलों को समझाने में अधिक सफल रही। आइंस्टाइन ने गति, त्वरण, दिक्, काल इत्यादि मौलिक शब्दों का और उनसे संयुक्त प्रचलित धारणाओं का विशेष विश्लेषण किया। इस विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि न्यूटन के सिद्धांतों पर आधारित तथा प्रतिष्ठित भौतिकी में त्रुटियाँ हैं।
आइंस्टीन प्रणीत आपेक्षिकता सिद्धांत के दो विभाग हैं :
(१) विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धांत, और
(२) सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत।
विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धांत में भौतिकी के नियम इस स्वरूप में व्यक्त होते हैं कि वे किसी भी अत्वरित प्रेक्षक के लिए समान होंगे। सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत में भौतिकी के नियम इस प्रकार व्यक्त होते हैं कि वे प्रेक्षक की गति से स्वतंत्र या अबाधित होंगे। विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धांत का विकास 1905 में हुआ और सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत का विकास 1915 में हुआ।

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