भारतीय जनतंत्र में शिक्षा के उद्देश्य की जानकारी

भारतीय जनतंत्र को सफल बनाने के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भारत की राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों की चर्चा की है –
(1) जनतांत्रिक नागरिकता का विकास- भारतवर्ष एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है।इसे सफल बनाने के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को सच्चा, इमानदार तथा कर्मठ नागरिक बनाना परम आवश्यक है।चूँकि आज के बालक कल के नागरिक बनेंगे, इसीलिए प्रत्येक बालक में जनतांत्रिक नागरिकता का विकास करना भारतीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य है।वस्तुस्थिति यह है कि जनतंत्र में नागरिकता एक प्रकार की चुनौती होती है।इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रत्येक बालक में उसकी प्रकृति के अनुसार ऐसे बौद्धिक, सामाजिक, तथा नैतिक गुणों को विकसित करना परम आवशयक है जिनके आधार पर वह नागरिक के रूप में देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा तथा सांस्कृतिक सभी समस्याओं के विषय में स्पष्ट रूप से चिन्तन करके अपना निजी निर्णय ले सके और उन्हें सुलझा सके।इन सभी शक्तियों को विकसित करने के लिए बालकों का बौद्धिक विकास होना चाहिये।बौद्धिक विकास के हो जाने से वे सत्य-असत्य तथा वास्तवकिता एवं प्रचार में अन्तर समझते हुए अन्ध-विश्वासों तथा निरर्थक परम्पराओं का उचित विश्लेषण करके अपने जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं को आसानी से सुलझा सकेंगे।चूँकि स्पष्ट चिन्तन का भाषण देने तथा लेखन की स्पष्टता से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, इसलिए प्रत्येक बालक को शिक्षा के द्वारा इस योग्य बनाना परम आवश्यक है कि वह अपने भाषणों तथा लेखों के द्वारा अपने विचारों तो स्पष्ट करते हुए जनमत प्राप्त कर सकें।
(2) कुशल जीवन यापन कला की दीक्षा – कुशल जीवन यापन की कला में दीक्षित करना भारतीय शिक्षा का दूसरा उद्देश्य है।कोई भी व्यक्ति एकान्त में रहकर न तो जीवन यापन ही कर सकता है और न ही पूर्णरूपेण विकसित हो सकता है।व्यक्ति तथा समाज दोनों के विकास के लिए यह आवशयक है कि व्यक्ति सह-अस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए व्यवहारिक अनुभवों द्वारा सहयोग के महत्त्व का मुल्यांकन करना सीखे।अत: सफल सामुदायिक जीवन व्यतीत करने के लिए बालकों में सहयोग , सहनशीलता सामाजिक चेतना तथा अनुशासन आदि सामाजिक गुणों का विकास किया जाना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक एक-दूसरे के विचारों का आदर करते हुए घुलमिल कर रहना सीख जाये |
(3) व्यवसायिक कुशलता की उन्नति – जनतंत्र की सफ़लत कुशल व्यवसायिओं तथा आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न नागरिकों पर निर्भर करती है।अत: भारतीय शिक्षा का तीसरा उद्देश्य बालकों में व्यवसायिक कुशलता के लये व्यवसायिक प्रशिक्षण परम आवश्यक है।अत: बालकों के मन में आरम्भ से ही श्रम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करनी चाहिये, हस्तकला के कार्य पर बल देना चाहिये तथा पाठ्यक्रम में विभिन्न व्यवसायों को सम्मिलित करना चाहिये जिससे प्रत्येक बालक अपनी रूचि के अनुसार उस व्यवसाय को चुन कर उसमें उचित प्रशिक्षण प्राप्त कर सके जिसे वह अपने आगामी जीवन में अपनाना चाहें।इससे हमें विभिन्न व्यवसायों के लिए कुशल कारीगर भी प्राप्त हो सकेंगे तथा औधोगिक प्रगति के कारण देश की धनधान्य से परिपूर्ण हो जायेगा |
(4) व्यक्तित्व का विकास – जनतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति बालक को सृष्टि की अमूल्य एवं पवित्र निधि समझा जाता है।अत: भारतीय शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का विकास करना है।इस उद्देश्य के अनुसार बालकों को क्रियात्मक कार्यों को करने के लिये प्रेरित करना चाहिये जिससे उनमें सहित्यिक, कलात्मक तथा सांस्कृतिक आदि विभिन्न प्रकार की रुचियों का निर्माण हो जाये।रुचियों के विकसित हो जाने से बालकों को आत्माभिव्यक्ति, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सम्पति की प्राप्ति, अवकाश काल के सदुपयोग करने की योग्यता तथा चहुंमुखी विकास में सहायता मिलेगी।इस दृष्टि से बालकों के विकास हेतु उन्हें रचनात्मक क्रियाओं में भाग लेने के लिए अधिक से अधिक अवसर प्रदान किये जाने चाहिये |
(5) नेतृत्व के लिए शिक्षा – जनतंत्र सफल बनाने के लिए योग्य, कुशलता एवं अनुभवी नेताओं की आवश्यकता होती है।अत: नेतृत्व की शिक्षा प्रदान करना भारतीय शिक्षा का पांचवां महत्वूर्ण उद्देश्य हैं।इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बालकों में उचित शिक्षा द्वारा अनुशासन, सहनशीलता, त्याग सामाजिक समस्याओं की समझदारी तथा नागरिक एवं व्यावहारिक कुशलता को विकसित, करना चाहिये जिससे यही बालक बड़े होकर नागरिक के रूप में देश के राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक तथा सांस्कृतिक आदि दभी क्षेत्रों में सफल नेतृत्व कर सकें |

जनतंत्र तथा पाठ्यक्रम

जनतंत्र राज्य में पाठ्यक्रम की रचना जनतंत्रीय आदर्शों एवं मूल्यों को प्राप्त करने के लिए जाती है।अत: जनतंत्रीय पाठ्यक्रम के अन्तर्गत उन विषयों को मुख्य स्थान दिया जाता है जिसके अध्ययन से बालकों में उत्तम मनोवृतियाँ, उत्तम आभ्यास तथा योग्यता एवं सूझ-बूझ विकसित हो जायें और वे सच्चे नागरिक बनकर सफल जीवन व्यतीत कर सकें।इस दृष्टि से जनतंत्रीय पाठ्यक्रम निम्नलिखित सिधान्तों पर आधारित होता है –
(1) बहुमुखी – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम बहुमुखी होता है।इसके अन्तर्गत स्कूल का सम्पूर्ण कार्यक्रम –कक्षा के कार्य-कलाप, सहगामी क्रियायें, खेल-कूद एवं परीक्षा आदि सभी आ जाते हैं।इस प्रकार जनतंत्रीय पाठ्यक्रम अत्यंत विस्तृत होता है |
(2) सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम की रचना करते समय सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखा जाता है जिससे बालकों में सामाजिक भावना विकसित हो जाये।इस दृष्टि से जनतंत्रीय पाठ्यक्रम में सामाजिक संगठन तथा सभाओं आदि को मुख्य स्थान दिया जाता है |
(3) लचीलापन – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम लचीला होता है।इसमें कुछ आवश्यक विषय तो बुनियादी पाठ्यक्रम के रूप में प्रत्येक बालक को अनिवार्य रूप से अध्ययन करने होते हैं।शेष विषयों को व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर प्रत्येक बालक को अपनी-अपनी रुचियों, योग्यताओं तथा आवश्यकताओं के अनुसार ऐच्छिक रूप से अध्ययन करने की स्वतंत्रता होती है |
(4) स्थानीय आवश्यकताओं पर बल – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम का निर्माण स्थानीय आवश्यकताओं एवं साधनों के आधार पर किया जाता है।इस पाठ्यक्रम में समय, स्थान तथा प्रगति एवं आवश्यकतानुसार परिवर्तन भी किये जा सकते हैं |
(5) व्यवसायिक आवशयकताओं की व्यवस्था – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम व्यवसायिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है |
(6) क्रिया पर बल – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम बालकों की वृधि को विकसित करने के लिए क्रिया के सिधान्त पर बल देता है।इस दृष्टि से इस पाठ्यक्रम में शिक्षा द्वारा बालकों के मस्तिष्क में बने बनाये पूर्ण विचारों, अभिवृतियों तथा निष्कर्षों को बलपूर्वक थोपने की अपेक्षा ऐसी क्रियाओं पर बल दिया जाता है जिनमें भाग लेने से सभी बालक अपने निजी अनुभवों द्वारा किसी निष्कर्ष पर आ सकें |
(7) अवकाश काल की क्रियाओं को स्थान – जनतंत्रीय पाठ्यक्रम में ऐसी क्रियाओं को भी सम्मिलित किया जाता है जिनमें भाग लेते हुए अवकास कला का सदुपयोग किया जा सके |

जनतंत्र तथा शिक्षण पद्धतियाँ
जनतंत्र के आदर्शों, मूल्यों तथा भावनाओं का शिक्षण-पद्धतियों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।चूँकि जनतंत्र में बालक को सृष्टि की अमूल्य निधि समझते हुए उसके यक्तित्व का आदर किया जाता है, इसलिए जनतंत्रीय समाज में समस्त शिक्षण –पद्धतियाँ पर प्रकाश डाल रहे हैं –
(1) जनतंत्र का मूल सिधान्त क्रियाशीलता है।अत: जनतंत्रीय समाज में पुराने ढंग से पढ़ाने वाली निष्क्रिय शिक्षण-पद्धतियों की अपेक्षा सक्रिय शिक्षण-पद्धतियों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है |
(2) स्वतंत्रता जनतंत्र की आत्मा है।अत: जनतंत्रीय शिक्षण-पद्धतियाँ बालकों को स्वयं अपने अनुभवों द्वारा सीखने की स्वतंत्रता प्रदान करती है।मान्टेसरी-पद्धति, योजना पद्धति, डाल्टन-पद्धति, हरिसटिक पद्धति तथा प्रयोगशाल पद्धति एवं प्रयोगात्मक-पद्धति आदि प्रमुख जनतंत्रीय शिक्षण-पद्धतियां हैं।इन सभी शिक्षण पद्धतियों में बालक को स्वयं क्रिया के द्वारा ज्ञान को खोजने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।प्रत्येक बालक को ज्ञान प्राप्त करते समय शिक्षक से प्रशन पूछने तथा तर्क एवं आलोचना करने की स्वतंत्रता होती है।उक्त सभी शिक्षण पद्धतियों का प्रयोग करते समय शिक्षक बालकों को ज्ञान के विस्तृत क्षेत्र में अन्वेषण करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देता है तथा आवश्यकता पड़ने पर मित्र एवं पर्थ प्रदर्शक के रूप में समुचित सहयता देते हुए मार्ग दर्शन भी करता रहता है।इस प्रकार जनतंत्रीय शिक्षण पद्धतियों वस्तविक जीवन के अनुभवों द्वारा बालकों में विभिन्न समस्याओं को सुलझाने की योग्ताया विकसति करती हैं जिसमें वे आगे चलकर सच्चे नागरिक बन सकें |
(3) जनतंत्रीय शिक्षण पद्धतियों के द्वारा बालकों की बुद्धि को पूर्णरूपेण विकसित किया जाता है।बालकों को जो भी कार्य डे जाते हैं वे न अधिक सरल होते हैं और न अधिक कठिन।दूसरे शब्दों में, ये कार्य न तो इतने सरल ही होते हैं कि बालकों को सोचने-विचारने की आवशयकता अवश्य पड़ती है।इससे बालकों में सोचने-विचारने तथा निर्णय लेने की शक्तियाँ विकसति होती है जो आगे चलकर उन्हें नागरिक के रूप में विभिन्न प्रकार की राजनीतिक , आर्थिक तथा सांस्कृतिक एवं सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में सहायता प्रदान करती है |

Leave a Comment