ऊतिकीय विधियाँ, आइए जाने

ऊतकों के सम्यक्‌ अध्ययन के लिए यह आवश्यक है कि सूक्ष्मदर्शक यंत्र तक उन्हें लाने के पूर्व उनको विशेष पद्धतियों द्वारा उपचार (treatment) किया जाए। ऊतक का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए यह अनिवार्य है कि वह अति पतला हो। जीवित ऊतक के विभिन्न भागों में बहुत समानताएँ पाई जाती हैं। अत: उसका ठीक ठीक अध्ययन संभव नहीं होता। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए सर्वप्रथम ऊतक को 4 से 8 माइक्रॉन तक विच्छेदित कर लिया जाता है। इस कार्य के लिए ‘माइक्रोटोम’ यंत्र का प्रयोग किया जाता है। जीवित ऊतक का इतना सूक्ष्म विच्छेद तब तक संभव नहीं होता, जब तक वह कड़ा न हो। अत: ऊतक को कड़ा करने के लिए उसे विशेष प्रकार के रसायनों के घोल में स्थायीकृत (fix) किया जाता है। स्थायीकरण के उपरांत इस ऊतक को अलकोहलों के विभिन्न घोलों, अभिरंजकों (stains) तथा अन्य रसायनों में उपचार (treat) करके निर्जल कर लिया जाता है। अंत में इसे विशेष ताप पर पहले से ही गलाकर तैयार रखा जाता है, डाल दिया जाता है। कुछ समय बाद मोम के साथ ही ऊतक के टुकड़ों को चतुर्भुजाकार (rectangular) साँचे में डाल दिया जाता है। जब मोम जमकर कड़ा हो जाता है, तो उसके छोटे छोटे टुकड़े काट लिए जाते हैं। अंत में इन टुकड़ों को माइक्रोटोम के विशेष भाग में जमाकर उसमें एक अति धारदार चाकू (razor) से विशेष मोटाई के अनेक सेक्शन काट लिए जाते हैं। इन सेक्शनों को काँच की पट्टियों पर रखकर अध्ययन के लिए रख लिया जाता है। काँच की पट्टियों को हीटिंग प्लेट पर रखकर उनका मोम गला लिया जाता है और ऊतक का सेक्शन काँच की पट्टी पर जम जाता है। इन सेक्शनों से लदी काँच की पट्टियों को विशेष रसायनों तथा अल्कोहल के घोलों में निर्जल कर लिया जाता है। फिर इसे डाइलीन या सेडार उड आयल में भिगो दिया जाता है। अब यह सेक्शन सूक्ष्म अध्ययन के लिए तैयार हो गया।
इन सेक्शनों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए भाँति-भाँति के माइक्रॉस्कोपों (जैसे, फ़ेज़ कन्ट्रास्ट, इलेक्ट्रॉन आदि) का प्रयोग किया जाता है। आजकल ऊतकों का अध्ययन करने के लिए इस प्रकार के माइक्रॉस्कोपों का अत्यधिक प्रयोग होने लगा है। इस सूक्ष्म अध्ययन के लिए ऊतिकीरसायन (histochemestry) और विकिरण स्वचित्रण (radioau ography) विधियों का प्रयोग किया जाने लगा है।
ऊतिकीरसायन के अंतर्गत ऊतकों के विभिन्न भागों की रासायनिक संरचना का अध्ययन होता है। विकिरण स्वचित्रण विधि में जीवित जतु के विशेष ऊतक में विशेष प्रकार के रेडियोआइसोटोपों का प्रवेश कराया जाता है। इस प्रकार से उपचारीकृत ऊतकों को जंतुशरीर से बाहर निकालकर सेक्शन बना लिए जाते हैं। इन सेक्शनों को डार्क रूम में ले जाकर फोटोग्राफी के विशेष रसायनों द्वारा अनुलेपित कर लेते हैं, या फिल्म के नीचे रखकर मजबूती से बाँध देते हैं। कुछ समय बाद इन्हें अँधेरे कक्ष (dark room) से बाहर निकालकर स्थायीकृत कर लिया जाता है। तत्पश्चात्‌ इन्हें प्रकाश में लाकर इनका अध्ययन किया जाता है।
ऊतकों का अध्ययन उनकी सूक्ष्म संरचना का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अत: ऊतकी की संरचना का संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक है।

ऊतकों की संरचना (structure of tissues)

ऊतकों की संरचना में तीन प्रकार के मुख्य घटक दिखलाई देते हैं : कोशिकाएँ, मैट्रिक्स तथा तरल द्रव्य।

कोशिकाएँ (cells)

ऊतकों की इकाई कोशिका होती है। कोशिकाएँ सजीव होती हैं तथा वे सभी कार्य करती हैं, जिन्हें सजीव प्राणी करते हैं। इनका आकार अतिसूक्ष्म तथा आकृति गोलाकार, अंडाकार, स्तंभाकार, रोमकयुक्त, कशाभिकायुक्त, बहुभुजीय आदि प्रकार की होती है। ये जेली जैसी एक वस्तु द्वारा आवृत्त होती हैं। इस आवरण को कोशिकावरण (cell membrane) या कोशिका-झिल्ली कहते हैं। इसे कभी-कभी जीव-द्रव्य-कला (plasma membrane) भी कहा जाता है। इसके भीतर निम्नलिखित संरचनाएँ पाई जाती हैं:-
(1) केंद्रक एवं केंद्रिका
(2) जीवद्रव्य
(3) गोल्गी सम्मिश्र या यंत्र
(4) कणाभ सूत्र
(5) अंतर्प्रद्रव्य जालिका
(6) गुणसूत्र (पितृसूत्र) एवं जीन
(7) राइबोसोम तथा सेन्ट्रोसोम
(8) लवक

मैट्रिक्स (matrix)

मैट्रिक्स या आधात्री को इंटर्सेल्यूलर (intercellular) या ग्राउंड सब्स्टैंस (ground substance) भी कहा जाता है। जैसा नाम से ही स्पष्ट है, यह कोशिकाओं के मध्य भाग में स्थित होकर उन्हें परस्पर जोड़ने का कार्य करती है। ये सजीव तथा निर्जीव दोनों प्रकार की होती हैं। साधारणतया आधातृ संयोजक ऊतकों (connective tissues) में पाई जाती हैं। यह तंतु या रेशों द्वारा बनी होती है, जो तीन प्रकार के होते हैं : कॉलाजनी (collagenous), जालीदार (reticluar) तथा एलास्टिक (elastic)। यह सजातीय या समांगी (homogenous) पदार्थ होता है जो तरल अथवा जिलेटिन जैसी स्थित में रहता है। यह उपकला (epithelium), कोशिकाओं (capillaries) तथा छोटी-छोटी शिराओं (veins) के नीचे जमी रहती है। इसमें म्यूकोपोलीसैक्केराइड अम्ल (mucopolysaccharide acids) पाए जाते हैं। आधात्री कोमल (soft) तथा दृढ़ (firm) दोनों प्रकार की होती है।

तरल पदार्थ

ऊतकों में तरल पदार्थ भी होते हैं, जिनमें रक्त और लसीका (lymph) मुख्य हैं। ये दोनों आशयों (vesicles) अथवा नलिकाओं (tubules) से होकर प्रवाहित होते हैं। ऊतक तरल (tissue fluid) कोशिकाओं को तर रखता है। अधातु के ही कारण शरीर का स्वरूप (Form) बना रहता है। जंतु का शरीर वस्तुत: और कुछ नहीं, अपितु अंत: कोशिकीय पदार्थ अथवा आधातृ का महल मात्र है, जिसमें अनेक रंग रूप और आकार प्रकार की अरबों कोशिकाओं की ईटें चुनी होती हैं। ये कोशिकाएँ अपने उत्पादों का आदान प्रदान करती हुई अपना जीवन व्यतीत करती रहती हैं।
ऊतक विज्ञान शरीर के अंगतंत्रों की भी सम्यक्‌ जानकारी देता है। अंगतंत्रों की सरंचना, रासायनिक प्रकृति एवं कार्यविधियों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ऊतक विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है।

 

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