स्थानीय पर्यावरणीय योजना

परिचय
औद्यौगीकरण बढ़ रहा है और साथ ही इन उद्योगों से पैदा होने वाले उत्सार्जनों और अपशिष्ट के कारण पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ रहा है। अपनी प्रकृति के कारण औद्योगिक प्रदूषण में पर्यावरण में अपरिवर्तनीय प्रतिक्रिया पैदा करने की क्षमता होती है और इसलिए यह संपोषणीय विकास के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। चूंकि पर्यावरण की वहनीय क्षमता असीमित नहीं है और कुछ क्षेत्र या इको प्रणालियां अन्यों की तुलना में प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति अधिक संवदेनशील है, अत: उद्योगों की अनियोजित और बेतरतीब अवस्थिति पर्यावरण के प्रति जोखिम को काफी बढ़ा सकती है।
पर्यावरण योजना
इस समय ऐसी योजनाएं जिनमें पर्यावरण घटक अन्तर्निर्मित हों और आसाधारण के भूमि उपयोग के संगत औद्योगिक जोन का प्रावधान हो, भारत में मौजूद नहीं हैं। इसलिए औद्योगिक उद्यमी अपनी सुविधा के अनुसार भूखंड क्रय करने के लिए बाध्य होता है और इसके बाद वह क्लीयरेंस के लिए आवेदन करता है। सामान्यत: औद्योगिक साइट भले ही वर्तमान में किसी उदिृष्टै/अधिसूचित औद्योगिक भू उपयोग में नहीं हो, भूमि उपयोग कन्वर्शन पर्यावरणीय पहलुओं और अन्य बातों जैसे कि बिजली, जलापूर्ति की उपलब्धता आदि सम्बंधी क्लीयरेंस के आधार पर किया जाता है। आदि किसी उद्योग को शुरू करने के लिए प्रस्ताववित स्थल को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और राज्य पर्यावरणीय समितियों या स्थल क्लीयरेंस समितियों द्वारा इसकी प्रदूषण संभावना और पर्यावरण पर इसके संभावित प्रभाव की समीक्षा करने के पश्चात पर्यावरणीय दृष्टि से अनुमोदित किया जाता है। तथापि, पर्यावरणीय दृष्टि से स्वीकृत उद्योग कुछ सीमा तक प्रदूषण पैदा करेगा क्योंकि प्रदूषकों के स्राव/उत्सर्जन की सह्य सीमा की निश्चित मात्रा तक अनुमति है।
ऐसी सह्य सीमा प्रौद्योगिकी और आर्थिक व्यवहार्यता बातों के आधार पर निर्धारित होती है। इसके अलावा, मानकों की पूर्ति के लिए किसी उद्योग में प्रदत्त उपयुक्त प्रदूषण नियंत्रण उपकरण अपनी वांछित कुशलता के अनुसार निष्पादन या प्रचालन नहीं कर सकते हैं जिसका अर्थ है कि प्रदूषण का अतिरिक्त जोखिम है। स्थल उपयुक्त या अनुपयुक्त साबित हो सकता है।
वर्तमान स्थल निकासी (क्लीयरेंस) प्रक्रियाओं में कतिपय परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) संचालित करने पर भी जोर दिया गया है। ईआईए प्रक्रिया सूक्ष्म मूल्यांकन बन जाती है क्योंकि वांछित परिणाम प्राप्तव करने के लिए रिपोर्टों में कई बार उपाय किए जाते हैं। ईआईए के परिणामस्व्रुप यदि कोई प्रभाव पाया भी जाता है तो प्रभावों को विनिर्माण प्रक्रिया या उपचार प्रौद्योगिकी बदलकर निष्प्र्भावी कर दिया जाता है। तथापि, बाद में उद्योग के लिए उन संशोधित प्रणालियों को प्रचालित करना व्य वहार्य नहीं हो सकता है। इसके अतिरिक्त ईआईए आसपास के मौजूदा भूमि उपयोग पर विचार करते हुए संचालित किया जाता है। उद्योग का भूमि उपयोग परिवर्तनों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है। यदि उद्योग के समीप कोई संवदेनशील भू उपयोग होता है तो प्रभाव देखा जा सकता है भले ही उद्योग अपेक्षित मानकों की पूर्ति कर रहा हो। इसके अलावा ईआईए खर्चीली होने के अलावा लम्बी प्रक्रिया है और साथ ही यह तीव्र और यथार्थपरक निर्णयकरण प्रक्रिया में एक बाधा साबित हो रही है। औद्योगिक स्थलों के आसपास भूमि उपयोग नियंत्रणों की कमी के कारण, प्रदूषण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र/उपयोग औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास विकसित हो जाते हैं। प्रभाव, जो मुख्यत: प्राप्तकर्त्ता पर्यावरण की दूरी पर निर्भर होते हैं, ऐसे अनियंत्रित भू उपयोग परिवर्तनों के कारण देखे जाते हैं; क्षेत्र-वार सामरिक ईआईए को अपनाना स्थल-विशिष्टी या परियोजना-विशिष्ट ईआईए की अपेक्षा उपयुक्तत माना जा रहा है।

औद्योगिक क्षेत्रों को परिभाषित नहीं करने की वर्तमान प्रथा में कई हानियां हैं, जैसे कि –
उद्यमी को अपने उद्योग की पर्यावरणीय दशाओं और परिणामों की कोई जानकारी नहीं होती है जो चुने गए स्थल पर निर्भर करती है। वह पर्यावरणीय रूप से अत्यधिक संवेदनशील स्थल में निवेश कर सकता है और परिणामस्वरूप उसे विनियमक प्राधिकारी से निकासी प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।
स्थालन की विशिष्टता के अनुसार, उद्योग को अनुमत मानकों की तुलना में अधिक कठोर मानकों को पूरा करने के लिए अधिक विस्तृत और महंगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण प्रदान करना पड़ सकता है ताकि स्थल की अत्यिधिक संवेदनशील से पैदा हुए प्रतिकूल प्रभावों से बचा जा सके।
उद्योग द्वारा प्रदत्त प्रदूषण नियंत्रण उपकरण नियंत्रण से परे कारकों के कारण कुशलता से और विश्वासनीयता से कार्य नहीं कर सकते हैं और इसलिए प्रदूषण का जोखिम है।
बिखरे औद्योगिक विकास के कारण, संयुक्त उपचार या निपटान सुविधाएं, जो एकल अलग-अलग उद्योगों द्वारा सुविधाएं प्रदान करने की तुलना में बहुत अधिक सस्तीं और प्रभावी हो सकती है, प्रदान नहीं की जा सकती।
बेतरतीब विकास के कारण परिप्रेक्ष्य के साथ प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रमों की योजना प्रभावी रूप से नहीं बनायी जा सकती। इसके अलावा अनियंत्रित विकास के कारण निर्णयकरण भी कठिन हो जाता है।
पर्यावरणीय पहलुओं पर बढ़ती जन जागरूकता और अलग-थलग अवस्थिति में निहित जोखिम के कारण उद्योग कठोर मानकों के साथ अनुपालन के लिए दबाव में होता है और विनिमानक प्राधिकारियों को तत्काल कार्रवाई शुरू करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
पर्यावरणीय आयोजना ऐसे जोखिम से प्रभाव को कम करने के लिए एक प्रमाणित माध्यम है तथापि इस देश में इस माध्यम का शायद ही उपयोग किया गया है। नये नियंत्रित उद्योगों और औद्योगिक क्षेत्र को समुचित स्थानों पर स्थापित करना एक सुदृढ़ प्रदूषण निवारक साधन है जो औद्योगिक विकास की पर्यावरणीय मजबूती सुनिश्चित करता है। यह स्थल या साइट ही है जो अंतत: निर्धारित करता है कि कौन सा जलाशय उद्योग द्वारा डिस्चा‍र्ज किए गए स्राव से प्रभावित हो सकता है, कौन सा एयर-शेड वायु प्रदूषकों द्वारा प्रभावित हो सकता है अथवा किन इकोप्रणालियों को नुकसान हो सकता है। इसलिए प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों को न्यूान करने के उद्देश्य से पर्यावरणीय मानदंडों पर आधारित स्थल चलन एक महत्वपूर्ण पूर्वशर्त है।
लम्बे समय तक पर्यावरण के क्षेत्र में विशेषज्ञ ‘पर्यावरण की वहनीय क्षमता’, ‘संपोषणीय विकास’, ‘प्राकृतिक संसाधन लेखाजो‍खा’ आदि के बारे में चर्चा करते रहे हैं ताकि समय रहते हुए हमारे पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए तंत्र का पता लगाया जा सके। देश में इस क्षेत्र के विभिन्न तकनीकी और वैज्ञानिक संगठनों और संस्थाओं द्वारा भी प्रयास किए जा रहे है। शामिल परिवर्त्योंक की बहुलता और जटिलता के कारण भारत जैसे विशाल देश में पर्यावरणीय आयोजना अपनी समग्रता में कोई सरल कार्य नहीं है। परंतु नियोजित विकास की आवश्यकता है।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चरणों में पर्यावरण आयोजना के साधन तैयार करने का निर्णय लिया है। सर्वाधिक तत्काल आवश्यकता उद्योगों का समुचित साइट निर्धारित करना है ताकि प्रदूषण के जोखिम को कम किया जा सके और पर्यावरण की सुरक्षा हो। उद्योग का स्थान निर्धारित करने के लिए स्थल सम्बंधी निकासी पर निर्णयकरण प्रक्रिया को सरल करने और उसे समर्थन प्रदान करने की भी आवश्यकता है। सीपीसीबी ने काफी पहले 1988 में पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्र के लिए औद्योगिक स्थल निर्धारण दिशानिर्देश तैयार किए है और बाद में इसी प्रकार के दिशानिर्देश भारत-जर्मन द्विपक्षीय कार्यक्रम के तहत 1992 में कर्नाटक के हासन जिले के लिए तैयार किए गए। इन अध्ययनों के परिणाम उत्साहवर्द्धक रहे है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कार्यक्रम संचालित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के परामर्श से पर्यावरणीय कारकों के आधार पर देश भर में जिला-वार ‘उद्योगों के स्थल निर्धारण के लिए जोनिंग (मंडलन) एटलस’ तैयार करने का निर्णय लिया।

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