श्वसन तंत्र के प्रमुख रोग

खाद्य पदार्थो के ऑक्सीकरण को ही श्वसन कहते हे l स्वशन एक जेव रासायनिक प्रक्रिया हे जिसके फलस्वरूप उर्जा एवं कार्बन डाय ओक्साइड का निर्माण होता हे l उर्जा को रासायनिक उर्जा ATP के रूप में संग्रहित कर लिया जाता हे जबकि कार्बन डाय ओक्साइड को वातावरण में मुक्त कर दिया जाता है।
1.श्वसन के तीन मुख्य भाग हे
2.उपरी श्वसन = नाक, मुख, ग्रसनी व कंठ
3.निचला श्वसन = श्वासनली, स्वशनी व फेफड़े
मांस पेशिया

मुख्य अंग
नाक
नासिका प्रथम श्वसन अंग हे जो दो नासाछिद्रों से शुरू होकर नासगुहा से होता हुवा नासाग्रसनी में खुलता है l नासछिद्रो से वायु नासगुहा में प्रवेश करती हे एवं नासगुहा में उपस्थित रोम व सर्पिलाकार अस्थियो द्वारा वायु को शुद्ध किया जाता हे l नासागुहा में वायु गर्म एवं नम होती है l नासगुहा से वायु को नासाग्रसनी में छोड़ा जाता है l
मुख
मुख द्वितीयक स्वशन अंग हे जो मुखगुहा से शुरू होकर मुखग्रसनी में खुलता है l मुख से ली गई स्वास नाक से ली गई स्वास जितनी शुद्ध नहीं होती है l
ग्रसनी
स्वासनाल एवं ग्रसनाल के मिलने वाले स्थान पर एक छोटी से चिमनीनुमा सरचना को ग्रसनी कहते है l ग्रसनी तीन भागो में विभक्त रहती हे जो नासाग्रसनी, मुखग्रसनी व कंठग्रसनी है l नासिका से आने वाली वायु नसाग्रसनी में प्रवेश कर कंठग्रसनी से स्वासनली में जाती हे जबकि मुख से आने वाली वायु मुखग्रसनी में प्रवेश कर कंठग्रसनी से स्वासनली में जाती हे l
कंठ
कंठ, कंठग्रसनी एवं स्वासनली को जोड़ने वाली एक छोटी से त्रिभुजाकार कमरे के सामान की सरचना होती है l अवटू, द्र्विकाब. मुद्रिका एवं एपिग्लोटिस जेसी नो उपस्थिया मिलकर कंठ का निर्माण करती हे l कंठ में स्वर रज्जू उपस्तिथ होते हे जिसके कारण गले से विभिन्न प्रकार की आवाजे निकलती हे l एपिग्लोटिस उपास्थि भोजन को स्वासनाली में जाने से रोकती है l
स्वांसनली
स्वासनली 12 cm लम्बी एक नली होती हे जो कंठ से लेकर वक्षगुहा तक फेली रहती हे जिसको c आकार की उपस्थिया सहारा प्रधान करती है l स्वासनली में उपस्थित उपकला श्लेष्मा का निर्माण करती हे जो वायु को शुद्ध कर फेफड़ो तक पहुचाता है l यह वक्षगुहा में पहुचकर दायी व बायीं दो शाखाओ में विभक्त हो जाती हे जिसे प्राथमिक श्वसनी कहते है जो आगे चलकर अपनी तरफ के फेफड़े में मिल जाती है l
फुफ्फुस
हमारी छाती में दो फुफ्फुस (फेफड़े) होते हैं – दायां और बायां। दायां फेफड़ा बाएं से एक इंच छोटा, पर कुछ अधिक चौड़ा होता है। दाएं फेफड़े का औसत भार 23 औंस और बाएं का 19 औंस होता है। पुरुषों के फेफड़े स्त्रियों के फुफ्फुसों से कुछ भारी होते हैं।

फुफ्फुस चिकने और कोमल होते हैं। इनके भीतर अत्यंत सूक्ष्म अनन्त कोष्ठ होते हैं जिनको ‘वायु कोष्ठ’ (Air cells) कहते हैं। इन वायु कोष्ठों में वायु भरी होती है। फेफड़े युवावस्था में मटियाला और वृद्धावस्था में गहरे रंग का स्याही मायल हो जाता है। ये भीतर से स्पंज-समान होते हैं।

फेफड़े के कार्य
दोनों फुफ्फुसों के मध्य में हृदय स्थित रहता है। प्रत्येक फुफ्फुस को एक झिल्ली घेरे रहती है ताकि फूलते और सिकुड़ते वक्त फुफ्फुस बिना किसी रगड़ के कार्य कर सकें। इस झिल्ली में विकार उत्पन्न होने पर इसमें शोथ हो जाता है जिसे प्लूरिसी नामक रोग होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों में शोथ होता है तो इसे श्वसनिका शोथ होना कहते हैं। जब फुफ्फुसों से क्षय होता है तब उसे यक्ष्मा या क्षय रोग, तपेदिक, टी.बी. होना कहते हैं।

फुफ्फुसों के नीचे एक बड़ी झिल्ली होती है जिसे उर: प्राचीर कहते हैं जो फुफ्फुसों और उदर के बीच में होती है। सांस लेने पर यह झिल्ली नीचे की तरफ फैलती है जिससे सांस अन्दर भरने पर पेट फूलता है और बाहर निकलने पर वापिस बैठता है।

फेफड़ों का मुख्य काम शरीर के अन्दर वायु खींचकर ऑक्सीजन उपलब्ध कराना तथा इन कोशिकाओं की गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाईऑक्साइड नामक वर्ज्य गैस को बाहर फेंकना है। यह फेफड़ों द्वारा किया जाने वाला फुफ्फुसीय वायु संचार कार्य है जो फेफड़ों को शुद्ध और सशक्त रखता है। यदि वायुमण्डल प्रदूषित हो तो फेफड़ों में दूषित वायु पहुंचने से फेफड़े शुद्ध न रह सकेंगे और विकारग्रस्त हो जाएंगे।

श्वास-क्रिया दो खण्डों में होती है। जब सांस अन्दर आती है तब इसे पूरक कहते हैं। जब यह श्वास बाहर हो जाती है तब इसे रेचक कहते हैं। प्राणायाम विधि में इस सांस को भीतर या बाहर रोका जाता है। सांस रोकने को कुम्भक कहा जाता है। भीतर सांस रोकना आंतरिक कुम्भक और बाहर सांस रोक देना बाह्य कुम्भक कहलाता है। प्राणायाम ‘अष्टांग योग’ के आठ अंगों में एक अंग है। प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से फेफड़े शुद्ध और शक्तिशाली बने रहते हैं। फुफ्फुस में अनेक सीमांत श्वसनियां होती हैं जिनके कई छोटे-छोटे खण्ड होते हैं जो वायु मार्ग बनाते हैं। इन्हें उलूखल कोशिका कहते हैं। इनमें जो बारीक-बारीक नलिकाएं होती हैं वे अनेक कोशिकाओं और झिल्लीदार थैलियों के जाल से घिरी होती हैं। यह जाल बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य करता है क्योंकि यहीं पर फुफ्फुसीय धमनी से ऑक्सीजन विहीन रक्त आता है और ऑक्सीजनयुक्त होकर वापस फुफ्फुसीय शिराओं में प्रविष्ठ होकर शरीर में लौट जाता है। इस प्रक्रिया से रक्त शुद्धी होती रहती है। यहीं वह स्थान है जहां उलूखल कोशिकाओं में उपस्थित वायु तथा वाहिकाओं में उपस्थित रक्त के बीच गैसों का आदान-प्रदान होता है जिसके लिए सांस का आना-जाना होता है।

श्वसन क्रिया
सांस लेने को ‘श्वास’ और सांस छोड़ने को ‘प्रश्वास’ कहते हैं। इस ‘श्वास-प्रश्वास क्रिया’ को ही ‘श्वसन क्रिया’ (Respiration) कहते हैं।

श्वास-गति (Breathing Rate)

साधारणत: स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में 16 से 20 बार तक सांस लेता है। भिन्न-भिन्न आयु में सांस संख्या निम्नानुसार होती है-

आयु – संख्या प्रति मिनट

दो महीने से दो साल तक 35 प्रति मिनट

दो साल से छ: साल तक 23 प्रति मिनट

छ: साल से बारह साल तक 20 प्रति मिनट

बारह साल से पन्द्रह साल तक 18 प्रति मिनट

पन्द्रह साल से इक्कीस साल तक 16 से 18 प्रति मिनट

श्वसन तंत्र के रोग

उपर्युक्त श्वास-गति व्यायाम और क्रोध आदि से बढ़ जाया करती है किन्तु सोते समय या आराम करते समय यह श्वास-गति कम हो जाती है। कई रोगों में जैसे न्यूमोनिया, दमा, क्षयरोग, मलेरिया, पीलिया, दिल और गुर्दों के रोगों में भी श्वास-गति बढ़ जाती है। इसी प्रकार ज्यादा अफीम खाने से, मस्तिष्क में चोट लगने के बाद तथा मस्तिष्क के कुछ रोगों में यही श्वास गति कम हो जाया करती है।

श्वसन तंत्र के रोगों में फेफड़ों के रोग, श्वासनली के रोग सहित इस तंत्र के अन्य रोग शामिल हैं। श्वसन तंत्र के रोगों में स्वयंसीमित सर्दी-जुकाम से लेकर जीवाणुजन्य न्यूमोनिया जैसे घातक रोग हैं।
सूखी खांसी
खांसी आवाज करती हुई विस्फोटक नि:श्वसन होती है जो बन्द कंठ द्वार के विरुद्ध निकलती है। इसका उद्देश्य श्वांस-प्रणाली तथा श्वसन-वृक्ष से नि:स्राव या फंसा हुआ कोई बाहरी पदार्थ को निकाल फेंकना होती है। यह स्वत: होनेवाली एक परावर्तक क्रिया के रूप में होती है या स्वेच्छा से की जाती है। खांसी श्वसन व्याधियों का सबसे सामान्य लक्षण है। खांसी होने के निम्नलिखित कारण है-

(क) शोथज स्थितियां

1. वायु मार्ग की शोथज स्थितियां- फेरिन्जाइटिस, टांसिलाइटिस श्वसन-यंत्र शोथ, श्वसन-प्रणाली शोथ, श्वसनी शोथ एवं श्वसनिका शोथ,

2.फुफ्फुसों की शोथज स्थितियां-न्यूमोनिया एवं ब्रोंकोन्यूमोनिया, फुफ्फुस-विद्रधि, यक्ष्मा, फुफ्फुसों के फंगस रोग।

(ख) यान्त्रिक कारण

  1. धूम्रपान करने के कारण, धुंआ, धूल या क्षोभकारी गैसों के सूंघने के कारण हुए क्षोभ एवं फुफ्फुस धूलिमयता के कारण,
  2. वायु-मार्ग पर किसी अबुर्द, ग्रेन्यूलोमा, महादमनी एन्यूरिज्म या मीडियास्टिनम में स्थित किसी पिण्ड द्वारा पड़ रहे दबाव के कारण,
  3. श्वसन वृक्ष के अन्दर कोई बाहरी वस्तु फंस जाने के कारण,
  4. श्वसनी-नलिकाओं की संकीर्णता, श्वसनी दमा, तीव्र या पुराना श्वसनी शोथ तथा
  5. पुराना अन्तराली तन्तुमयता।

(ग) ताप उत्तेजना ठंडी या गर्म हवा का झाँका लगना या मौसम में अचानक परिवर्तन होने के कारण भी खांसी या तो सूखी होती है या गीली अर्थात् बलगम के साथ होती है। साधारणत: ऐसी खाँसी ऊपरी वायु मार्ग फेरिंग्स, स्वर यंत्र, श्वास प्रणाली या श्वसनी में हुए क्षोभ के कारण होती है। इसके कई विशिष्ठ प्रकार हैं:

  1. धातु ध्वनि खांसी: ऐसी खांसी फैरिंग्स में धूम्रपान से उत्पन्न प्रणाली शोथ या बड़े श्वसनियों में ब्रोंकाइटिस के प्रथम स्टेज में क्षोथ होने के कारण होती है।
  2. कर्कश खांसी: ऐसी खांसी घांटी में कोई विक्षति होने के कारण होती है।
  3. घर्घर के साथ खांसी: ऐसी खांसी प्रश्वसन के दौरान आवाज करती हुई प्रश्वसनी कष्ठ-श्वास अर्थात् घर्घर के साथ होती है। ऐसी खांसी स्वरयंत्र में डिफ्थीरिया होने के कारण भी होती है।
  4. कूकर-खांसी: ऐसी खांसी छोटी-छोटी तीखी नि:श्वसनी मौकों के बाद एक लम्बी, आवाज करती हुई प्रश्वसनी ‘हूप’ के साथ होती है। ऐसी खांसी कूकर खांसी में होती है।
  5. गो-खांसी: इसमें कोई विस्फोटक आवाज नहीं होती। इस खांसी की आवाज कुत्ते के रोने या गाय की डकार जैसी होती है। ऐसी खांसी स्वर-यंत्र रोगग्रस्त में होती है।
  6. हल्की, आधी दबी हुई कष्टदायी खांसी: ऐसी खांसी शुष्क प्लूरिसी में होती है।

गीली खांसी
गीली खांसी ऐसी खांसी है जिसके होने से बलगम निकलता है जो श्लेष्माभ, सपूय या श्लेष्म-पूयी होती है। श्लेष्माभ बलगम श्लेष्मा का बना होता है जो श्वसनी ग्रंथियों द्वारा सृजित होता है। यह गाढ़ा, लस्सेदार, उजले रंग का होता है। ऐसा बलगम तीव्र श्वसनीर, शोथ में, न्यूमोनिया के प्रथम चरण में अथवा यक्ष्मा की प्रारम्भिक अवस्था में निकलता है। सपूय बलगम गाढ़ा या पतला पूय का बना होता है तथा पीला या हरा-पीला रंग का होता है। इस प्रकार का बलगम पुराना श्वसनी शोथ में, पुराना संक्रमी दमा में, श्वसनी-विस्फार, न्यूमोनिया की देर वाले अवस्था में फुफ्फुस विद्रधि या यक्ष्मा के बढ़े हुए स्वरूप में मिलता है।

श्लेष्म पूयी बलगम हल्के पीले रंग का होता है। ऐसा बलगम सपूय बलगम वाली व्याधियों (जैसा ऊपर बताया गया है) की प्राथमिक अवस्थाओं में निकलता है।

दुर्गंध करता हुआ बलगम फुफ्फुस विद्रधि, फुफ्फुसी गैंग्रीन तथा श्वसनी विस्फार की स्थितियों में निकलता है। रक्त में सना बलगम रक्तनिष्ठीवन का परिचायक होता है। फनिल, गुलाबी रंग का बलगम फुफ्फुसी शोथ से निकलता है। हरा रंग का बलगम फुफ्फुसी गैंग्रीन में निकलता है। काला बलगम कोयला-खदानी फुफ्फुस धूलिमयता में निकलता है। लोहे पर लगे जंग के रंग का बलगम विघटिक न्यूमोनिया में, कत्थे के रंग का या बादामी रंग की चटनी जैसा बलगम फुफ्फुसी अभीबी रुग्णता में अथवा ऐसे यकृत अमीबी विद्रधि में जो फटकर किसी श्वसनी से सम्पर्क स्थापित कर लिया हो, मिलता है। सुनहला बलगम ऐस्बेटॉस रुग्णता से निकलता है।

कुक्कुर खाँसी

कूकर कास या कूकर खांसी या काली खांसी जीवाणु का संक्रमण होता है जो कि आरंभ में नाक और गला को प्रभावित करता है। यह प्रायः 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। इस बीमारी का नामकरण इस आधार पर किया गया है कि इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति सांस लेते समय भौंकने जैसी आवाज करता है। यह बोर्डेटेल्ला परट्यूसिया कहलाने वाले जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु व्यक्तियों के बीच श्वसन क्रिया से निष्कासित जीवाणु से फैलती है। यह तब होता है जब संक्रमण युक्त व्यक्ति खांसते या छींकते हैं। यह संक्रमण युक्त व्यक्तियों के शारीरिक द्रवों से संपर्क होने से भी फैलता है जैसे नाक का पानी गिरना।

लक्षण
जीवाणु संक्रमण के आरंभ से 7 से 17 दिनों के बाद इसके लक्षण विकसित हो पाते हैं।
जिनमें लक्षण विकसित हो जाते हैं, वे अधिकांश में 2 वर्ष की आयु से कम होते हैं।
ये लक्षण लगभग 6 सप्ताह तक रहते हैं और ये 3 चरणों में विभाजित होते हैं –

चरण-1
इन लक्षणों में छींकना, आंखों से पानी आना, नाक बहना, भूख कम होना, ऊर्जा का ह्रास होना और रात के समय खांसना शामिल है।

चरण-2
इन लक्षणों में लगातार खांसते रहना और इसके बाद भौंकने जैसी आवाज आना तब जबकि बीमार व्यक्ति सांस लेने का प्रयास करता है, आदि शामिल है।

चरण -3
इसके अंतर्गत सुधार की प्रक्रिया आती है जबकि खांसना न तो लगातार होता है और न गंभीर। यह स्तर 4 सप्ताह से प्रायः आरंभ होता है। यह कुकर खांसी कम आयु के रोगियों को होती है जिनकी खांसी 2 सप्ताह तक रहती है।

परिचय
कुकुर खांसी बच्चों में होने वाली एक संक्रामक तथा खतरनाक बीमारी है। मुख्यत: श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है जो विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के देशों के लिए अत्यन्त चिन्ता का विषय है। भारत जैसे विकासशील देश में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर 587 बच्चे प्रत्येक वर्ष इस बीमारी से ग्रसित होते हैं। इससे बच्चों में मृत्युदर 4.15 प्रतिशत है जो कि कुकुर खांसी के रोगियों का 10 प्रतिशत, एक वर्ष के भीतर मरने वाले बच्चों का आधा भाग है।

यह बीमारी बोर्डटेल परट्यूसिस नामक सूक्ष्मजीवी से होती है। संक्रमण की सार्वधिक बीमारियां पांच वर्ष से कम उम्र में होती हैं जोकि नर बच्चों की अपेक्षा मादा बच्चों में अधिक होती है। छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में इस बीमारी से मृत्यु-दर अधिक होती है, हालांकि यह बीमारी साल के किसी भी माह में हो सकती है, किन्तु जाड़ा तथा वर्षा की ऋतु में इसकी संभावना सार्वाधिक होती है। अब प्रश्न उठता है कि यह बीमारी एक बच्चे से दूसरे बच्चे में किस प्रकार संक्रमित होती है ? इस बीमारी से ग्रसित बच्चों की नाक बहती है, छींक आती है और वह खांसता है। नाक बहने के क्रम में जो तरल पदार्थ निकलता है, इसी के द्वारा बीमारी फैलती है। खांसी या छींक के दौरान नाक, मुंह तथा सांस छोड़ने के क्रम में जीवाणु आसपास तथा वातावरण में फैल जाता है, जो दूसरे बच्चों में संक्रमित होने का कारण बनता है। यह बीमारी मुख्यत: बच्चों की प्रारंभिक अवस्था में, जब उनके माता-पिता को उनकी बीमारी का पता नहीं चलता, खेल के मैदान में, एक बिछावन पर सोने और एक ही बर्तन में खाने-पीने के क्रम में फैलती है।

ऐसी बात नहीं है कि रोग के कीटाणुओं के संक्रमण (बीमार बच्चे से स्वथ्य बच्चे में) के तुरंत बाद बीमारी हो जाती है। रोगाणुओं के आक्रमण के पश्चात लक्षण दिखाई पड़ने में एक से दो सप्ताह का समय लग जाता है। सर्वप्रथम जीवाणु श्वसन तंत्र की भीतरी सतह के संपर्क में आकर सतह पर चिपक जाता है, जहां उचित माध्यम पाकर वृद्धि करने लगता है। उसके बाद सतह पर घाव बनता है। फलस्वरूप स्थान फूल जाता है। फिर त्वचा पर नेक्रोसिस की क्रिया होती है। नेक्रोसिस (रक्त प्रवाह की कमी की वजह से त्वचा का क्षय) के कारण अन्य बैक्टीरिया आक्रमण कर त्वचा में तेजी से वृद्धि करना शुरू कर देते है।

इतनी प्रक्रिया पूरी होने में एक-दो सप्ताह का समय लग जाता है। उसके बाद रोग अपना लक्षण दिखाना शुरू करता है, जो तीन भागों में प्रकट होता है। शुरू में बच्चे के खांसी होती है तथा नाक से पानी बहता है। फिर धीरे-धीरे खांसी से बच्चे को विशेष परेशानी नहीं होती, किन्तु धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती है क्योंकि श्वसन-तंत्र को प्रभावित करने की प्रक्रिया लगातार बढ़ती जाती है। जैसे-जैसे श्वसन-तंत्र प्रभावित होता है खांसी और खांसने की गति बढ़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है कि खांसी की वजह से रोगी रात को सो नहीं पाता है। पहले जो केवल जागृतावस्था में खांसी होती थी अब वह नींद में भी होने लगती है, जिससे बच्चा खांसते-खांसते उठ जाता है।

यह स्थिति दो से चार सप्ताह तक बनी रहती है। उसके बाद अपना उग्र और भयंकर रूप धारण कर लेती है। अब पहले की अपेक्षा और जल्दी-जल्दी खांसी का दौरा पड़ने लगता है। इस दौरान एक ऐसा स्थिति आ जाती है कि बच्चे को सांस लेने तक में कठिनाई होने लगती है। उसके बाद सांस लेने के क्रम में एक विशेष प्रकार की आवाज निकलने लगती है, जैसे-किसी कुत्ते के रोने की आवाज। यह आवाज श्वसन-तंत्र में संक्रमण तथा ग्लाटिस के खुलने की वजह से होती है, किन्तु वह हूप-हूप आवाज हमेशा नहीं होती है। उसके बाद खांसी के साथ गाढ़े रंग का बलगम (कफ) निकलता है। एक बात और कि जब खांसी अपना वीभत्स रूप दिखा रही होती है तो ठीक उसके बाद उल्टी होती है और खाया-पीया सब बाहर निकल जाता है। खांसी के दौरान जीभ का बार-बार मुंह से बाहर आने के क्रम में उस पर दांत पड़ने से घाव हो जाने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। बार-बार खांसने की वजह से चेहरा लाल हो जाता है। बच्चा चिन्तित रहने लगता है। कई बार तो अत्यधिक उदासीन अपने आप में भौंचक्का, किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में कुछ समझ नहीं पाता कि आखिर मुझे कौन-सी सजा दी जा रही है। मानसिक तनाव की वजह से पूरे शरीर से पसीना छूटने लगता है, भोजन से विरक्ति होने लगती है। वह भोजन करना नहीं चाहता।

रोकथाम
सभी शिशुओं के लिए कुकर खांसी का टीका लगवाना आवश्यक है। यह टीकाकरण प्रायः डीटीपी संयुक्त रूप में डिप्थेरिया, टिटनेस और कुकर खांसी (परट्यूरसिस) दिया जाता है। पहले वाला संक्रमण और टीकाकरण जिंदगीभर असंक्रमीकरण की गारंटी नहीं देता है। तथापि 6 वर्ष की आयु के बाद वर्धक टीकाकरण की सिफारिश नहीं की जाती है जब तक कि संक्रमण न हुआ हो।

इलाज क्या है ?
इस बीमारी के इलाज के लिए एन्टीबायोटिक्स का प्रयोग किया जाता है जो इसके दौरे की भयानकता को कम कर देता है। यदि रोग की पहचान प्रारम्भिक अवस्था में हो जाए तो एन्टीबायोटिक्स का प्रयोग काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इरिथ्रोमाइसिन या एम्पीसिलिन का प्रयोग सात से दस दिनों तक किया जाता है। आजकल क्लोरम्फेनिकोल का व्यवहार अत्यधिक किया जाता है क्योंकि यह दवा अत्यधिक सस्ती है। घबराहट दूर करने के लिए भी इनकी गोलियां दी जा सकती हैं। श्वसन-नलियों की सिकुड़न को कम करने के लिए ब्रोंकोडायलेटर दिया जाता है। कफ सिरप भी कफ को निकालने के लिए दिया जाता है।

Leave a Comment