आलू की जैविक खेती के लिए जलवायु तथा भूमि

आलू एक सब्जी है। वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से यह एक तना है। इसका उद्गम स्थान भारत में ठण्डे पहाड़ी प्रदेश एवं दक्षिण अमेरिका का पेरू (संदर्भ) है। यह गेहूं, धान तथा मक्का के बाद सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है। भारत में यह विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है। यह जमीन के नीचे पैदा होता है। आलू के उत्पादन में चीन और रूस के बाद भारत तीसरे स्थान पर है।

आलू की जैविक खेती के लिए जलवायु

आलू कि खेती ठन्डे मौसम में जहाँ पाले का प्रभाव नहीं होता है, सफलता पूर्वक कि जा सकती है| आलू के कंदों का निर्माण 20 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर सबसे अधिक होता है| जैसे जैसे तापक्रम में वृद्धि होती जाती है, वैसे ही कंदों का निर्माण में भी कमी होने लगती है तथा 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम होने पर कंदों का निर्माण रुक जाता है| पौधों की बढ़वार के लिए लम्बे दिनों कि अवस्था तथा कंद निर्माण के लिए छोटे दिनों कि अवस्था आवश्यक होती है| हमारे देश में विभिन्न भागों मे उचित जलवायु कि उपलब्धता अनुसार किसी न किसी भाग में पुरे साल आलू कि खेती होती है|

आलू की फसल के लि‍ए भूमि

आलू की फसल के लिए अच्छे निकास वाली, उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे उत्तम है। यद्यपि अच्छे प्रबंध द्वारा इसे विभिन्न प्रकार की भूमियों में भी उगाया जा सकता है। इस फसल के लिए मिट्टी का पी एच मान 6-7.5 तक उपर्युक्त होता है|एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 जुताईयां देसी हल से करनी चाहिए ताकि आलू की फसल के लिए अच्छे खेत बन सके। खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। खेत समतल होना चाहिए ताकि जल निकासी सही हो सके।

आलू की उन्नत किस्में

कुफरी-चंद्रमुखी, कुफरी-ज्योत, कुफरी-अशोका, कुफरी-पुखराज, कुफरी-लालिमा, कुफरी-अरुण, कुफरी-चिप्सोना, राजेंद्र आलू आदि प्रमुख किस्में है|

खेत की तैयारी

आलू के कंद मिटटी के अन्दर तैयार होते है इसलिए मिटटी का भुरभुरा होना नितांत आवश्यक है| पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करे दूसरी तथा तीसरी जुताई देशी हल या हेरों से करनी चाहिए| यदि खेत में ढेले हों तो पाटा चलाकर मिटटी को भुरभूरा बना लेना चाहिए| बुवाई के समय मिटटी में नमी का पर्याप्त होना अनिवार्य है| यदि खेत में नमी की कमी हो तो खेत में पलेवा करके बुवाई करना चाहिए|

आलू की फसल में खाद एवं उर्वरक

आलू की फसल के लिए 20-25 टन सड़ी हुई गोबर कि खाद का प्रयोग करें| 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर कि दर से ट्राईकोडर्मा गोबर कि खाद में मिला कर खेत में प्रयोग करें| खड़ी फसल में मिट्टी चढाने के समय वर्मी कम्पोस्ट डालने से फसल एवं उपज अच्छी प्राप्त होती है|

बीज का चुनाव

आलू की खेती में बीज का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है| क्योंकि आलू उत्पादन में कुल लागत का 40 से 50 प्रतिशत खर्च बीज पर आता हैं| इसलिए आलू का बीज ही उत्पादन का मूल आधार है| शुद्ध किस्म का, उपजाऊँ, कीट व रोग मुक्त, कटा, हरा या सड़ा न हो| स्वच्छ तथा सुडोल बीज ही प्रयोग में लाना चाहिए| आलू के बीज की मात्रा आलू की किस्म, आकार, बोने की दूरी तथा भूमि की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है|
अगेती फसल में पूरा आलू बोते हैं, टुकड़े नहीं काटे जाते, क्योंकि उस समय भूमि में नमी अधिक होती है, जिससे कटे टुकड़ों के सड़ने की सम्भावना रहती है| बड़े आलू को टुकड़ों में काट लेते हैं, एक टुकड़ें में कम-से-कम 2 से 3 आँखें रहनी चाहिये| कटे हुए टुकड़े देर से बोई जाने वाली फसल में प्रयोग करते हैं| क्योंकि उस समय इनके सड़ने की सम्भावना नहीं रहती है| इसके अलावा काटने से आलुओं की सृषुप्तावस्था समाप्त हो जाती है तथा अंकुरण शीघ्र होने लगता है|

बुआई का समय

पतझड़ वाली फसल- मध्य सितंबर – मध्य अक्तूबरबसंत वाली फसल- जनवरी – फरवरीमध्य पर्वतीय क्षेत्र (800-1600 मी.)- मध्य जनवरीऊंचे पर्वतीय क्षेत्र (1600-2400 मी.)- मार्च- अप्रैलबहुत ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र (2400 मी. से अधिक)- अप्रैल-मई शुरूपरन्तु भारत के मैदानी भागों में आलू रबी कि मुख्य फसल है। 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर आलू लगाने का उपर्युक्त समय होता है।

बीज की मात्रा तथा बिजाई का तरीका

आलू को 50-60 सें. मी. की दूरी में नालियों/खलियों में ढलान की विपरीत दिशा में बोना चाहिए तथा बिजाई के तुरन्त बाद मेढे बनानी चाहिए।आलू से आलू का अंतर 15-20 सें. मी. होना चाहिए। यदि आलु बीज का भार 30 ग्राम से कम न हो तो 20-25 क्विंटल/हैक्टेयर बीज पर्याप्त होगा।

आलू में खरपतवारों की रोकथाम

आलू की जैविक फसल के साथ उगे खरपतवार को नष्ट करने हेतु आलू की फसल में एक बार ही निंदाई गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है, जिसे बुआई के 20 से 30 दिन बाद कर देना चाहिये| गुड़ाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि भूमि के भीतर के तने बाहर न आ जायँ नहीं तो वे सूर्य की रोशनी से हरे हो जाते है| खरपतवार नियंत्रण के अन्य तरीके इस प्रकार है, जैसे-

  1. जुताई खरपतवारो के बीजों के अंकुरण में सहायक होती है, जिससे इनको यांत्रिक विधियों से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है|
  2. गर्मी की जुताई से बहुवर्षीय खरपतवारों की जड़ें बरोह कंद और प्रकंद आदि भूमि की सतह पर आ जाते हैं, जो सूर्य की तीव्र रोशनी से सूखकर मर जाते हैं|
  3. फसल-चक्र और अंतरवर्ती फसलों द्वारा खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है|
  4. हस्तचलित यंत्रो से निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है|

आलू की फसल में पौध संरक्षण

बिजाई के लिए स्वस्थ व रोग रहित बीज का प्रयोग करें।
प्रमाणित बीज ही प्रयोग में लाएं।रोगग्रस्त खेतों में फसल न लगाएं।
प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल करें, जैसे कि कुफरी-स्वर्ण, कुफरी-ज्योति आदि।
बिजाई के समय बीज के आलुओं को ट्राईकोडर्मा तथा बीजामृत से उपचार करें।
खेत में अच्छी तरह गली-सड़ी गोबर की खाद डालें तथाकच्ची खाद का प्रयोग न करें
आलु बीज को उपचारित करने के बाद रोगों का प्रकोप कम होता है फिर भी अगर फसल में रोग दिखाई दे तो जैविक फफूंद नाशी यूवेरिया बेसिना या फफूद (पेईसिलोमाइसिस लीलासीनस) का प्रयोग करें| कीटों के लिए नीम तेल का प्रयोग 5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए|

फसल की खुदाई

जब फसल पूरी तैयार हो जाए तो आलुओं की खुदाई करनी चाहिए। आलुओं के तैयार हो जाने पर उन्हें भूमि के अंदर देर तक नहीं रहने देना चाहिए। खुदाई के समय भूमि न सूखी न अधिक गीली होनी चाहिए। पौधों की शाखाओं का थोड़ा सूखने तथा रगड़ने पर आलू के छिलके का न निकलना फसल तैयार होने के संकेत देते हैं। आलू का निम्नलिखित विधि से श्रेणीकरण किया जा सकता है –

ए श्रेणी (बड़ा आकार)- 75 ग्राम से अधिक भार वाले
बी श्रेणी (मध्यम आकार)- 50-75 ग्राम भार वाले
सी श्रेणी (छोटा आकार)- 50 ग्राम से कम भार वाले
पैदावार
सामान्य किस्में: 20-25 टन/हैक्टेयर
संकर किस्में: 30-35 टन/हैक्टेयर

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