लोकतंत्र का मार्क्सवादी सिद्धान्त

आम धारणा के विपरीत लोकतंत्र के विचार को मार्क्स और पश्चवर्ती मार्क्सवादी विचारकों ने भी स्वीकार कर लिया है। इतना अवश्य है कि उनकी लोकतंत्र-संबधी अभिधारणा पाश्चात्य उदारवादी लोकतांत्रिक अभिधारणाओं से पूर्णतः भिन्न है। चूंकि मार्क्सवादियों का मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था में लोकतांत्रिक अधिकार सही अर्थ में आम जनता के पास न होकर सिर्फ साधन-संपन्न वर्ग के हाथ में होता है, इसलिए वे एक ऐसे लोकतंत्र की स्थापना चाहते हैं जो ‘जनता का लोकतंत्र‘ (पीपल्स डेमोक्रेसी) हो। मार्क्सवादी लोकतंत्र में उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व को खत्म करने और सर्वहारावर्ग द्वारा अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के पश्चात् समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना होती है।
मार्क्स उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र का आलोचक था क्योंकि उसके अनुसार पूंजीवादी लोकतंत्र का आधार एक ऐसी आर्थिक प्रणाली होती है जिसमें उत्पादन के साधन हमेशा पूंजीपति वर्ग के नियंत्रण में होते हैं। यही पूंजीपति वर्ग अपनी धन-शक्ति के बल पर राजनीतिक व्यवस्था की नियंत्रण में रखकर सरकार और राज्य-तंत्र को अपने अधीन रखता है। राज्य सत्ता, अधिकार और विशेषाधिकार पूर्णतः उसी वर्ग के पास होते हैं और श्रमिकवर्ग के पास सिर्फ नाम की स्वतंत्रता और अधिकार होते हैं। राज्य का अधिकारी वर्ग, न्यायालय और पुलिस बल भी तटस्थ न होकर प्रभुतासम्पन्न वर्ग के ही हित साधक होते हैं। इसलिए, लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली का रूप अख्तियार कर लेता है जो शासक वर्ग की सत्ता और विशेषाधिकार को बढ़ावा देने और उच्च वर्ग के हितों को साधने के काम आता है।
इसके बावजूद, मार्क्स और एंगेल्स ने यह स्वीकार किया है कि संपन्न पूंजीपति वर्ग द्वरा नियंत्रित उदारवादी बुर्जुआ लोकतंत्र भी किसी हद तक अपने नागरिकों को वास्तविक अधिकार देने के ऐतिहासिक दावे कर सकता है और श्रमिक वर्ग इसका इस्तेमाल अपने को संगठित कर सर्वहारा की क्रांति के लिए कर सकते हैं। उदारवादी लोकतंत्रों में आम मताधिकार का उपयोग सर्वहारावर्ग की क्रांतिकारी आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में किया जा सकता है। मार्क्सवादी यह अवश्य मानते हैं कि कुछ स्थितियों में हिंसक क्रांतिकारी आन्दोलन की आवश्यकता नहीं हो सकती है लेकिन ऐसी स्थितियों की संभावना अत्यल्प है। अगर समाजवादी क्रांति के लक्ष्य को पूरा करने के लिए संसदीय मार्ग अपनाया भी जाता है तो यह अन्य प्रकार के संघर्षों में एक अतिरिक्त सहायक उपकरण ही हो सकता है।
मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार वास्तविक लोकतंत्र सर्वहारा के अधिनायकवाद को कायम करने के लिए सर्वहारावर्ग की क्रांति के पश्चात ही संभव है क्योंकि उदारवादी बुजुआर् लोकतंत्र का आदर्श प्रतिभागिता का हो सकता है, लेकिन यथार्थ में साधनहीन श्रमिक वर्ग की सहभागिता उसमें नहीं हो पाती। अपनी रचना ‘द क्रिटिक ऑफ द गोथा प्रोग्राम‘ (गोथा कार्यक्रम की समीक्षा- 1875) में मार्क्स और एंगेल्स ने अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा था ‘पूंजीवादी और साम्यवादी समाज के बीच में ही एक का दूसरे में रूपांतरण की अवधि निहित होती है। इसी से मेल खाती एक राजनीतिक संक्रमण की अवधि भी होती है जिसमें राज्य सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद और साम्यवाद में भेद किया है। वे इसे एक मध्यवर्ती काल मानते हैं। इसकी परिणति साम्यवादी समाज की स्थापना में होती है। यह समझना जरूरी है कि कार्ल मार्क्स और एंगेंल्स ने अधिनायकवाद पद का प्रयोग किस अर्थ में किया है। उनकी दृष्टि में प्रत्येक राज्य शासक सामाजिक वर्ग का अधिनायकवाद रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में यह वर्ग संपन्न औद्योगिक और व्यापारी बुर्जुआ का था जबकि उनकी अपनी अवधारणा वाला राज्य क्रांति के तुरंत बाद सर्वहारा के नियंत्रण वाला राज्य होगा और तब समाजवादी पुननिर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी जिसका अंत एक वर्गहीन समाज की स्थापना में होगा। इसलिए, उनकी दृष्टि में लोकतंत्र और सर्वहारा अधिनायकवाद एक ही साथ चलेंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि पूंजीवादी व्यवस्था में उदारवादी लोकतंत्र व्यवहार्यतः लोकतंत्र भी और उद्योगपतियों एवं व्यापारिक घरानों के बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकवादी शासक भी। इसीलिए, मार्क्स और एंगेल्स का कहना था कि क्रांति और श्रमिक वर्ग के आधिपत्य के पश्चात् की प्रणाली ‘जनता के लोकतंत्र‘ की प्रणाली होगी। जनता से उनका तात्पर्य मुठ्ठीभर संपन्न बुर्जुआ के स्थान पर जनसामान्य की विशाल आबादी से था। मार्क्स द्वारा प्रतिपादित ‘जनता का लोकतंत्र‘ की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैंः

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